अलग-अलग अपराधों में उम्रकैद की सजा लगातार नहीं चल सकती, एक मामले में छूट से दूसरे की सजा खत्म नहीं होगी: सुप्रीम कोर्ट

  • अलग-अलग अपराधों में उम्रकैद की सजा लगातार नहीं चल सकती, एक मामले में छूट से दूसरे की सजा खत्म नहीं होगी: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि अलग-अलग अपराधों में दी गई उम्रकैद की सजाएं लगातार यानी एक के बाद एक नहीं चल सकतीं। हालांकि, दोनों सजाओं को इस तरह एक-दूसरे के ऊपर लागू किया जा सकता है कि एक अपराध में सजा में छूट या उसे कम किए जाने से दूसरे अपराध की उम्रकैद अपने आप समाप्त न हो।

    जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की बेंच ने 2016 में संविधान पीठ द्वारा दिए गए मुथुरामलिंगम एवं अन्य बनाम राज्य फैसले पर भरोसा करते हुए यह टिप्पणी की।

    कोर्ट ने निर्देश दिया कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 के तहत हत्या के अपराध में दी गई उम्रकैद और धारा 376 के साथ धारा 342 के तहत अपराधों में दी गई उम्रकैद को एक-दूसरे के ऊपर लागू किया जाएगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सक्षम प्राधिकारी की ओर से किसी एक अपराध में सजा में छूट या उसे कम किए जाने का फैसला दूसरे अपराध में दी गई सजा को स्वतः समाप्त न कर दे।

    इस मामले में आरोपी को रेप और हत्या के अलग-अलग अपराधों के लिए दो उम्रकैद की सजाएं सुनाई गई थीं। निचली अदालत ने दोनों सजाओं को लगातार चलाने का आदेश दिया था, यानी एक सजा पूरी होने के बाद दूसरी सजा शुरू होनी थी।

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने आरोपी की दोषसिद्धि और सजा बरकरार रखी थी। इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

    अपील पर आंशिक रूप से सुनवाई स्वीकार करते हुए जस्टिस विश्वनाथन द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने एक ही आरोपी को लगातार दो उम्रकैद की सजाएं भुगतने का निर्देश देकर गलती की। ऐसा करना संभव नहीं है, क्योंकि किसी व्यक्ति का जीवन एक ही होता है।

    सुप्रीम कोर्ट ने मुथुरामलिंगम फैसले का हवाला देते हुए कहा कि किसी अपराधी को दो बार उम्रकैद भुगतने का निर्देश देना असंगत और अतार्किक होगा, क्योंकि यह इस तथ्य की अनदेखी करता है कि अन्य जीवों की तरह इंसान के पास भी जीने के लिए केवल एक ही जीवन होता है।

    इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने अपील आंशिक रूप से स्वीकार की और फैसले का वह हिस्सा रद्द कर दिया, जिसमें उम्रकैद की सजाओं को लगातार चलाने का निर्देश दिया गया था। फैसले के बाकी हिस्से में हस्तक्षेप नहीं किया गया।

    कोर्ट के फैसले का अर्थ यह है कि अलग-अलग अपराधों में दी गई उम्रकैद की सजाएं लगातार नहीं चलाई जा सकतीं, लेकिन एक अपराध में मिली छूट या सजा में कमी का लाभ दूसरे अपराध में दी गई उम्रकैद पर स्वतः लागू नहीं होगा।

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