'जागीरदार के पास कोई मालिकाना हक नहीं, ज़मीन सरकार की': सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना में मियापुर की 550 एकड़ ज़मीन पर किए गए दावों को खारिज किया

  • जागीरदार के पास कोई मालिकाना हक नहीं, ज़मीन सरकार की: सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना में मियापुर की 550 एकड़ ज़मीन पर किए गए दावों को खारिज किया

    सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (29 अक्टूबर) को तेलंगाना के मियापुर में जमीन पर मालिकाना हक जताने वाली अपीलों को खारिज किया और इस फैसले को बरकरार रखा कि जमीन की असली मालिक सरकार है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जागीरदार जमीन का मालिक नहीं होता है। 1949 में जब जागीरें खत्म की गईं, तब ये जमीनें राज्य सरकार के अधीन आ गईं।

    इसके अलावा, कोर्ट ने कहा कि जिन राजस्व रिकॉर्ड (रेवेन्यू एंट्रीज) के आधार पर कुछ लोगों ने दावा किया था, वे फर्जी थे। यह एक तरह की धोखाधड़ी है, जिसे "राजस्व अधिकारियों के साथ मिलीभगत करके अंजाम दिया गया।"

    जस्टिस एम.एम. सुंदेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने 2003 के आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपीलों को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। कोर्ट ने इस स्थिति को "बेहद निराशाजनक" बताया और कहा कि अपीलकर्ता "तेलंगाना राज्य की जमीन को हड़पने की कोशिश कर रहे थे।"

    1912 में मियापुर गांव के सर्वे के बाद 550 एकड़ और 39 गुंटा में फैली इस जमीन को 'सरकारी पोरामबोके' (सार्वजनिक भूमि) के रूप में वर्गीकृत किया गया। अपीलकर्ताओं ने तीन अलग-अलग स्रोतों के जरिए अपना मालिकाना हक जताया था। कुछ लोगों ने दावा किया कि यह जमीन रफी-उन-निसा बेगम के बेटे नवाब मोहम्मद कैसरुद्दीन खान की है, जिन्हें 1927 में रेली कमीशन ने मियापुर और अन्य गांवों को वापस सौंपने की सिफारिश की थी। कुछ अन्य लोगों ने अब्दुल सलाम की पत्नी रहीम-उन-निसा बेगम के जरिए दावा किया, जिनका नाम 1950-51 से 1952-53 के राजस्व रिकॉर्ड (पहाणी) में 'पट्टेदार' के तौर पर दर्ज था। एक तीसरे व्यक्ति ने नवाब मोइनुद्दौला बहादुर की पत्नी रहीम-उन-निसा बेगम के जरिए दावा किया, जिसमें उन्होंने 1929 के एक 'फरमान' (आधिकारिक आदेश) का हवाला दिया। आंध्र प्रदेश (तेलंगाना क्षेत्र) (जागीर उन्मूलन) विनियमन, 1358 फसली, 1949, 15 अगस्त 1949 को लागू हुआ और 15 सितंबर 1949 से जागीरों का प्रशासन हैदराबाद सरकार को सौंप दिया गया। बाद में खैसरुद्दीन खान ने 'हैदराबाद अतियात पूछताछ अधिनियम, 1952' के तहत कार्यवाही शुरू की और 1957 तथा 1958 में उन्हें अनंतिम (प्रोविज़नल) और संशोधित कम्यूटेशन अवार्ड (मुआवज़ा/भुगतान) प्राप्त हुए। 1976 में, राजस्व बोर्ड (बोर्ड ऑफ रेवेन्यू) द्वारा मियापुर सहित चार गांवों के लिए एक 'मुंतखिब' (अधिकार पत्र) जारी किया गया। बाद में, दावेदार के बेटे ने इन गांवों को मुक्त कराने के लिए आवेदन किया, जिसे 1995 में खारिज कर दिया गया।

    इसके बाद 'आंध्र प्रदेश भूमि हड़पना (निषेध) अधिनियम, 1982' के तहत गठित विशेष अदालत ने राज्य सरकार को पक्ष बनाए बिना ही भूमि हड़पने के दो मामलों में फैसला सुनाया और प्रतिवादियों को 'भूमि हड़पने वाला' (लैंड ग्रैबर) घोषित किया। अन्य मामलों में, जहां राज्य सरकार एक पक्ष थी, वहां भूमि को 'पोरांबोके' (राज्य के स्वामित्व वाली भूमि) माना गया और संबंधित पक्षों को 'भूमि हड़पने वाला' घोषित किया गया। बाद में हाईकोर्ट ने दूसरे मामलों के फैसलों को तो बरकरार रखा, लेकिन पहले वाले फैसलों को रद्द कर दिया और राज्य सरकार को ही उस भूमि का असली मालिक घोषित किया।

    हाईकोर्ट के इन फैसलों से असंतुष्ट होकर अपीलकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।

    सुप्रीम कोर्ट ने 'जागीर उन्मूलन विनियमन' के प्रावधानों का हवाला देते हुए इसके प्रभाव को स्पष्ट किया। न्यायालय ने साफ किया कि "पैगाह के अनुदान का अर्थ है - सेना के रखरखाव के लिए दी गई जागीर (संपदा)। जागीर का अर्थ है - भू-राजस्व के अधिकार के रूप में दी गई कोई संपदा। इसलिए जागीर के अनुदान को संपत्ति पर मालिकाना हक (टाइटल) के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए।" अदालत ने माना कि एक जागीरदार “कोई उपाधि-धारक (टाइटल होल्डर) नहीं होता है, बल्कि वह निज़ाम की इच्छा के अनुसार ही उस पद पर बना रहता है।”

    साथ ही रेगुलेशन 4 के तहत किसी दिवंगत जागीरदार के उत्तराधिकार की प्रक्रिया अपने आप (ऑटोमैटिक रूप से) लागू नहीं होती, क्योंकि रेगुलेशन लागू होने की तारीख से ही जागीरदार का दर्जा पूरी तरह से खत्म कर दिया गया। रेगुलेशन 6 के तहत, जागीरों को 'दीवानी' (सरकारी नियंत्रण) में शामिल कर लिया गया, और जागीरदार की सभी शक्तियां, अधिकार और जिम्मेदारियां समाप्त हो गईं।

    रेगुलेशन 17 और 18 में 'होम फार्म' (निजी खेती की ज़मीन) और 'निजी संपत्ति' से जुड़े अपवादों के संबंध में अदालत ने कहा,

    “यह साबित करने की ज़िम्मेदारी उसी व्यक्ति की है, जो यह दावा करता है कि कोई संपत्ति 'होम फार्म' या 'निजी संपत्ति' है, क्योंकि संबंधित रेगुलेशन केवल एक अपवाद है।”

    'अतियात इंक्वायरीज़ एक्ट' (Atiyat Inquiries Act) और 'जागीर कम्यूटेशन रूल्स' (Jagirs Commutation Rules) के साथ इन रेगुलेशंस को पढ़ने पर अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि पूर्व जागीरदार या 'मुंतखिब' (Muntakhib) धारक का अधिकार “केवल 'कम्यूटेशन' (मुआवज़े) की राशि प्राप्त करने तक ही सीमित रहेगा।” यह राशि एक बार मिलने वाला भुगतान है, जो उन जागीरदारी अधिकारों को खत्म करने के बदले में दिया जाता है, जो अपनी प्रकृति से ही सीमित और प्रतिबंधित थे।

    खंडपीठ ने माना कि 'फरमान' (शाही आदेश) ने ही जागीरदार के अधिकारों को सीमित कर दिया था और इस अनुदान (ग्रांट) की प्रकृति ही प्रतिबंधात्मक थी, इसलिए “इस आधार पर किसी तरह के मालिकाना हक (टाइटल) का दावा नहीं किया जा सकता।” यहां तक कि 'फरमान' के तहत मिलने वाले सीमित अधिकार भी रेगुलेशन के ज़रिए कानूनी रूप से खत्म कर दिए गए।

    अदालत ने माना कि ये अपीलकर्ता “नाज़िम अतियात” के समक्ष उनकी पहल पर शुरू की गई कार्यवाही और बाद में बोर्ड ऑफ रेवेन्यू के समक्ष हुई अपील के कारण, अब इन ज़मीनों पर अपने मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकते। कम्यूटेशन (मुआवज़ा) राशि तय होने और उसे प्राप्त कर लेने के बाद, कैसरुद्दीन खान और उनके उत्तराधिकारियों का इन ज़मीनों पर कोई भी हक या हित नहीं रह जाता।

    अदालत ने आगे कहा,

    “नवाब कैसरुद्दीन खान के बेटे द्वारा इन ज़मीनों को वापस पाने के लिए दायर की गई अर्ज़ी का बिना किसी चुनौती के खारिज हो जाना, इस मामले में अंतिम कील साबित हुआ है।”

    अदालत को यह बात अजीब लगी कि 1954-55 के खसरा पाहानी (ज़मीन के रिकॉर्ड) में इस ज़मीन को “डोंगाला गुट्टा कांचा पोरामबोके” (सरकारी ज़मीन) के रूप में दर्ज होने के बावजूद, इसमें एक महिला का नाम 'पट्टेदार' के तौर पर शामिल कर लिया गया।

    अदालत ने गौर किया कि ये राजस्व प्रविष्टियाँ (रेवेन्यू एंट्रीज़) और ज़मीन हड़पने के मामलों में की गई कार्यवाहियां—जिनमें राज्य सरकार को पक्षकार नहीं बनाया गया—पूरी तरह से 'एबोलिशन ऑफ जागीर्स रेगुलेशन' (जागीर उन्मूलन कानून) और 'अतियात इंक्वायरीज़ एक्ट' की अनदेखी करके की गई थीं।

    खंडपीठ ने माना कि ये प्रविष्टियां तब की गईं, जब ज़मीनें पहले ही राज्य सरकार के अधिकार में आ चुकी थीं, और यह सब जागीर प्रशासक की जानकारी के बिना हुआ। पाहानी में पाई गई गड़बड़ियाँ और मंडल राजस्व अधिकारी (Mandal Revenue Officer) के साक्ष्य, इन परिस्थितियों को संदिग्ध बनाते हैं।

    अदालत ने कहा,

    “यह रहस्य तब और गहरा हो जाता है जब पता चलता है कि ज़मीन के ट्रांसफर या म्यूटेशन (नाम परिवर्तन) का कोई आदेश ही मौजूद नहीं है, जिसके आधार पर अब्दुल सलाम की पत्नी, रहीमूनिसा बेगम के पक्ष में यह प्रविष्टि की गई हो। सर्वे नंबर 100 और 101 के लिए 'फैसल पट्टी' और 'पक्का बुक' (सरकारी रिकॉर्ड) में ज़मीन के ट्रांसफर या म्यूटेशन से जुड़ी कोई प्रविष्टि नहीं है। मंडल राजस्व अधिकारी के बयान—जिन्हें विशेष अदालत में LGC नंबर 131/1995 के मामले में RW-8 के रूप में पेश किया गया था—के अनुसार, ऐसी प्रविष्टि के लिए आधिकारिक आदेश होना अनिवार्य है। ये प्रविष्टियाँ बिना किसी अधिकार या क्षेत्राधिकार के की गईं। इसलिए इनका कोई कानूनी वजूद नहीं है और ये पूरी तरह से अमान्य हैं।”

    बेंच ने यह भी गौर किया कि अक्टूबर 1995 में मंडल राजस्व अधिकारी द्वारा किए गए निरीक्षण में यह पाया गया कि वह ज़मीन बंजर थी और उस पर बड़े-बड़े पत्थर पड़े हुए थे। वहां खेती का कोई काम नहीं हो रहा था और न ही किसी पक्ष का उस पर कब्ज़ा था।

    कोर्ट ने कहा,

    "इसे देखते हुए हम पाते हैं कि उनके पक्ष में की गई राजस्व प्रविष्टियां (Revenue Entries) फर्जी हैं। यह राजस्व अधिकारियों के साथ मिलीभगत करके की गई धोखाधड़ी का मामला है।"

    कोर्ट ने आगे कहा,

    "बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के, केवल एक प्रविष्टि के ज़रिए किसी व्यक्ति का नाम 'पट्टेदार' के रूप में दर्ज करने का कोई अधिकार नहीं है।"

    कोर्ट ने यह भी कहा कि 'प्रतिकूल कब्ज़े' (Adverse Possession) का दावा न तो साबित हुआ और न ही इस मामले में लागू होता है।

    'हैदराबाद टेनेंसी एक्ट' के तहत 140 एकड़ ज़मीन को हस्तांतरित करने के लिए तहसीलदार द्वारा दी गई अनुमति को कोर्ट ने अमान्य और शून्य करार दिया, क्योंकि तहसीलदार के पास ऐसा करने का अधिकार (Jurisdiction) नहीं था। इस अनुमति में 'एबोलिशन ऑफ जागीर्स रेगुलेशन' (जागीर उन्मूलन नियम) या 'अतियात' (Atiyat) कार्यवाही का कोई ज़िक्र नहीं था, और न ही इस मामले में प्रशासक (Administrator) या खैसरुद्दीन खान का पक्ष सुना गया था।

    कोर्ट ने कहा कि ज़मीन अधिग्रहण की जो कार्यवाही बाद में हाईकोर्ट द्वारा रद्द कर दी गई (जिसमें इस ज़मीन को उनकी निजी संपत्ति माना गया), वह राज्य सरकार को नहीं रोक सकती, क्योंकि उस कार्यवाही में ज़मीन के मालिकाना हक (Title) पर न तो कोई विवाद था और न ही उसका कोई फैसला हुआ था। साथ ही 'हाउस कमिटी' की रिपोर्ट से न तो कोई अधिकार मिलता है और न ही कोई लाभ।

    सुप्रीम कोर्ट के सामने पहली बार अपीलकर्ताओं ने यह दलील दी कि 1918 में बासित खान ने एक नीलामी में यह संपत्ति खरीदी थी और 1943-1944 के बीच एक वसीयत (Will) के ज़रिए इसे उनके नाम कर दिया था। कोर्ट ने इस दलील को मानने से इनकार कर दिया, क्योंकि यह बात न तो स्पेशल कोर्ट के सामने उठाई गई थी और न ही हाई कोर्ट के सामने। इसके अलावा, इन दस्तावेज़ों को अदालत में स्वीकार्यता, प्रासंगिकता और सबूत के तौर पर साबित करने की प्रक्रिया से भी नहीं गुज़ारा गया था।

    अदालत ने कहा,

    “सिर्फ इसलिए कि दस्तावेज़ पेश किए गए, इसका मतलब यह नहीं है कि वे असली हैं। यह मामला एक विशेष अदालत (स्पेशल कोर्ट) की कार्यवाही से जुड़ा है। इन दस्तावेज़ों को स्वीकार्यता, प्रासंगिकता और सबूत की प्रक्रिया से नहीं गुजारा गया। इसलिए यह काफी अजीब बात है कि किसी भी पुरानी कार्यवाही में—जिसमें रेली कमीशन की रिपोर्ट भी शामिल है—और उसके बाद भी कथित नीलामी या वसीयत का कहीं कोई ज़िक्र नहीं मिलता है।”

    इसके अलावा, पीठ ने कहा,

    “अगर यह मान भी लिया जाए कि 'फ़रमान इसफ़न्दार 1338 फ़सली' के तहत ज़मीन उनके पूर्वजों के नाम कर दी गई थी, तो भी इससे उन्हें कोई फ़ायदा नहीं होगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि उस फ़रमान से ज़मीन का मालिकाना हक़ (टाइटल) ट्रांसफर नहीं हुआ था। अगर कोई अधिकार ट्रांसफर हुआ भी था तो वह 'ए.पी. एबोलिशन ऑफ़ जागीर्स रेगुलेशन' (A.P. Abolition of Jagirs Regulation) के लागू होने से ख़त्म हो गया।”

    इस दलील के संबंध में कि ये ज़मीनें 'ज़ात जागीर' थीं, इसलिए इन पर यह रेगुलेशन लागू नहीं होता, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 'ज़ात जागीर' का अर्थ है किसी व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से दी गई संपत्ति। यह रेगुलेशन 17 और 18 के तहत आने वाले 'होम फार्म' (निजी खेतों) या व्यक्तिगत संपत्ति से अलग है। कोर्ट ने यह भी माना कि हाईकोर्ट ने इस दलील को सही ढंग से खारिज किया था, क्योंकि न तो यह दलील दी गई और न ही स्पेशल कोर्ट के सामने इससे जुड़ा कोई सबूत पेश किया गया। हाईकोर्ट ने मामले के गुण-दोषों (Merits) पर भी विचार किया और पाया कि "ज़मीनों के मामले में केवल राजस्व (Revenue) ही किसी को दिया जा सकता है।"

    कोर्ट ने आगे कहा कि, वैसे भी, यह तथ्य का एक ऐसा सवाल है जो साबित नहीं हो पाया। चूंकि दावा करने वाली महिला के पास खुद ही कोई वैध मालिकाना हक (Title) नहीं था, इसलिए वह इन ज़मीनों को किसी और को कानूनी रूप से हस्तांतरित (Alienate) नहीं कर सकती थी।

    उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी का एक भी कृत्य बाकी सभी वैध कार्यों को अमान्य कर देता है। कोर्ट ने कहा कि ये अपीलें "राज्य की ज़मीनों को हड़पने के लिए की गई धोखाधड़ी का एक स्पष्ट उदाहरण हैं।" कोर्ट ने माना कि स्पेशल कोर्ट और हाई कोर्ट ने सभी दलीलों और दस्तावेज़ों पर विचार किया था। ज़मीन हड़पने से जुड़े शुरुआती मामलों में राज्य सरकार को पक्ष न बनाना एक चूक थी, जिसे हाई कोर्ट ने बाद में सुधार दिया था।

    बेंच ने आगे स्पष्ट किया कि चूंकि 1994 के LGC (लैंड ग्रैबिंग केस) नंबर 21 और 22 में राज्य सरकार कोई पक्ष (Party) नहीं थी, इसलिए उन फैसलों का इस मामले पर "कोई असर नहीं पड़ेगा।" कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि ये ज़मीनें 'हैदराबाद अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी' (HUDA) को हस्तांतरित कर दी गई थीं।

    कोर्ट ने आगे कहा,

    "जैसा कि ऊपर चर्चा की गई है, यह राज्य की कीमती ज़मीनों को हड़पने की कोशिश का एक स्पष्ट मामला है। चूंकि अपीलकर्ताओं के पास खुद ही कोई वैध मालिकाना हक नहीं है, इसलिए उन्हें किसी भी तरह की राहत (Equitable Relief) देने का सवाल ही नहीं उठता।"

    इसके अनुसार, इन अपीलों को खारिज कर दिया गया।

    Case Title : Bandari Ramchander & Ors. Maitri Coop. Housing Ltd. & Ors

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