BREAKING| सुप्रीम कोर्ट ने रेप केस में तरुण तेजपाल की सजा पर रोक लगाने से किया इनकार

  • BREAKING| सुप्रीम कोर्ट ने रेप केस में तरुण तेजपाल की सजा पर रोक लगाने से किया इनकार

    सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (4 नवंबर) को 'तहलका' मैगजीन के पूर्व एडिटर-इन-चीफ तरुण तेजपाल की सजा पर रोक लगाने से इनकार किया। यह मामला 2013 के रेप केस से जुड़ा है, जिसमें उन्हें गोवा के लग्जरी होटल की लिफ्ट में अपनी सहकर्मी के साथ रेप करने के आरोप में 10 साल की जेल की सजा सुनाई गई थी।

    जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने सबूतों, और तेजपाल के ईमेल व मैसेज पर शुरुआती विचार करने के बाद यह माना कि सजा पर रोक लगाने का कोई आधार नहीं बनता। इसलिए इस अर्जी को खारिज कर दिया गया।

    तेजपाल ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसने ट्रायल कोर्ट के 2021 के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें उन्हें इस मामले में बरी कर दिया गया। वहीं, गोवा सरकार ने भी एक अपील दायर कर उनके लिए उम्रकैद की सजा की मांग की।

    तरुण तेजपाल की दलीलें

    तेजपाल की ओर से पेश सीनियर वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि आरोप यह था कि तेजपाल लिफ्ट में घुटनों के बल बैठ गए और बटन दबा दिए ताकि लिफ्ट के दरवाजे न खुलें, और इस दौरान उन्होंने पीड़िता का यौन उत्पीड़न किया। हालांकि, सिब्बल ने कहा कि ऐसे सबूत मौजूद हैं, जो दिखाते हैं कि दरवाजे खुले थे।

    सिब्बल के अनुसार, तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि कथित घटना के दौरान, जो 2 मिनट 9 सेकंड तक चली, लिफ्ट हर मंजिल पर खुली थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस पहलू पर कोई गौर नहीं किया।

    सिब्बल ने कहा,

    "उन 2 मिनट 9 सेकंड के दौरान, लिफ्ट का दरवाजा ग्राउंड फ्लोर पर दो बार खुला था। पीड़िता का कहना था कि दरवाजा नहीं खुला, और अगर खुलता तो वह बाहर भाग जाती।"

    उन्होंने कहा कि वह फुटेज, जिससे यह पता चल सकता था कि लिफ्ट के दरवाजे खुले थे, उसे नष्ट कर दिया गया।

    सिब्बल ने कहा,

    "पूरी कहानी ही झूठी है।"

    उन्होंने ग्रैंड हयात होटल के मैनेजर और मित्सुबिशी (लिफ्ट कंपनी) के कर्मचारियों के बयानों का हवाला दिया, जिन्होंने कहा था कि लिफ्ट हर मंजिल पर पहुंचने पर अपने आप खुल जाती है और बटन दबाकर इसके दरवाजों को बंद नहीं रखा जा सकता। उन्होंने तर्क दिया कि ये बयान पीड़िता के पूरे मामले की बुनियाद को ही खत्म कर देते हैं। जांच अधिकारी ने CCTV फुटेज देखी, जो पीड़िता के बयान से मेल नहीं खाती थी, फिर भी उन्होंने उसे जब्त करने की कोई कोशिश नहीं की।

    सिब्बल ने आगे कहा कि लिफ्ट से बाहर आते ही पीड़िता की मुलाकात निखिल अग्रवाल से हुई, और इसका जिक्र उसके ईमेल में भी था। हालांकि, शिकायत में निखिल अग्रवाल का नाम हटा दिया गया। फिर भी जांच अधिकारी ने निखिल अग्रवाल से संपर्क नहीं किया।

    बचाव पक्ष के गवाह के तौर पर पेश हुए निखिल अग्रवाल ने बताया कि पीड़िता मुस्कुरा रही थी, उसे देखकर हंसी और काफी उत्साहित लग रही थी।

    कथित तौर पर पीड़िता ने अग्रवाल से कहा,

    "मेरे पास कुछ गपशप है, बताओ मैं किसके साथ फ्लर्ट कर रही थी?"

    जब अग्रवाल ने पूछा कि वह कौन है तो पीड़िता ने कथित तौर पर कहा, "TT" - जिसका इशारा तरुण तेजपाल की ओर था।

    यह बताते हुए कि यह मामला बरी किए जाने के फैसले को पलटने (Reversal of Acquittal) से जुड़ा है, सिब्बल ने कहा कि ऐसे मामलों में आमतौर पर सजा पर रोक (Suspend the Sentence) लगा दी जाती है।

    तेजपाल की ओर से पेश सीनियर वकील सिद्धार्थ अग्रवाल ने बताया कि 22 नवंबर को FIR दर्ज होने से पहले - जो कथित घटना के लगभग दो हफ्ते बाद हुई - पीड़िता के अपने ही छह लिखित बयान मौजूद थे। इनमें से किसी भी बयान में बलात्कार का कोई जिक्र नहीं था। एक बयान में उसने कहा कि तेजपाल ने उसके साथ फ्लर्ट किया; दूसरे में कहा गया कि उसने चूमने की कोशिश की; एक और बयान में कहा गया कि उसने चूम लिया; लेकिन इनमें से किसी भी दस्तावेज में 'ओरल पेनिट्रेशन' (Oral Penetration) का कोई आरोप नहीं था।

    अग्रवाल ने आगे कहा कि पूरी सुनवाई के दौरान तेजपाल जमानत पर थे, और उन्होंने कभी भी अपनी इस आजादी का गलत इस्तेमाल नहीं किया।

    गोवा राज्य का विरोध

    गोवा राज्य की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सिब्बल की दलीलें बेमानी हैं। उन्होंने बताया कि तेजपाल उस मैगजीन के मालिक थे, जहां पीड़िता काम करती थी। साथ ही वह तेजपाल की बेटी की दोस्त भी थी।

    सॉलिसिटर जनरल ने आगे कहा कि पीड़िता के सहकर्मियों के बयान हैं, जिनमें उन्होंने बताया कि उन्होंने पीड़िता को फूट-फूटकर रोते हुए देखा था। इसके अलावा, घटना वाली रात के बाद रात 1:30 बजे तेजपाल ने पीड़िता को एक मैसेज भेजा: "फिंगरटिप्स" (Fingertips)।

    मेहता ने कहा,

    "सोचिए, कोई व्यक्ति अपनी बेटी की उम्र की लड़की को ऐसा मैसेज भेज रहा है। इस मैसेज का क्या मतलब निकलता है? इसका वही मतलब हो सकता है, जो हाईकोर्ट ने निकाला है।"

    इसके बाद मेहता ने उस माफी वाले ईमेल का जिक्र किया, जो तेजपाल ने पीड़िता को भेजा था। यह ईमेल तब भेजा गया जब पीड़िता ने मैगजीन की तत्कालीन संपादक शोमा चौधरी के सामने यह मुद्दा उठाया था। इस माफीनामे के बाद, लिफ्ट का दरवाजा खुला था या नहीं, इस पर दी गई सभी दलीलें बेमानी हो जाती हैं।

    मेहता ने बेंच के सामने ईमेल का हिस्सा पढ़कर सुनाया, जिसमें लिखा था - "यह घटना हंसी-मजाक और हल्के-फुल्के अंदाज में हुई थी।" ईमेल में तेजपाल ने कहा कि उन्हें बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि यह बिना सहमति के हुआ है। उन्हें इस बात का पता तब चला जब पीड़िता ने घटना की शिकायत उनकी बेटी से की और बेटी ने उनसे इस बारे में सवाल किया।

    सॉलिसिटर जनरल ने आगे कहा कि ट्रायल कोर्ट के फैसले ने असल में पीड़िता को ही कटघरे में खड़ा कर दिया, और यह इस बात पर केंद्रित था कि एक "आदर्श पीड़िता" को कैसा व्यवहार करना चाहिए।

    सॉलिसिटर जनरल की बात का खंडन करते हुए सिब्बल ने कहा कि माफीनामा असल में शोमा ने तैयार किया था। हालांकि, सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि तेजपाल ने खुद सीधे पीड़िता को यह माफीनामा भेजा था।

    सिब्बल ने शोमा का बयान पढ़कर सुनाया, जिसमें कहा गया कि पीड़िता के दबाव के कारण घबराहट में वह माफीनामा भेजा गया।

    सिब्बल ने कहा,

    "मैंने सिर्फ बातचीत के लिए माफी मांगी थी। वह तो बस हंसी-मजाक था। उसका रेप से कोई लेना-देना नहीं है।"

    उन्होंने दावा किया कि "घटना" (Encounter) का जिक्र उस फ्लर्ट भरी बातचीत के लिए किया गया, जो उनके बीच सेक्स और वफादारी को लेकर हुई। उन्होंने आगे कहा कि "फिंगरटिप्स" (उंगलियों के पोर) का जिक्र बॉब गेल्डोफ की एक कहानी के संदर्भ में था। यह उनके उस सवाल के जवाब में भेजा गया, जिसमें उन्होंने पूछा था कि क्या उन्हें जीभ ज्यादा पसंद है या उंगली।

    हालांकि, सजा पर रोक (सस्पेंशन) लगाने के लिए तेजपाल की दलीलों से बेंच सहमत नहीं हुई।

    अपने आदेश में बेंच ने कहा:

    "हमारा सरोकार केवल सजा पर रोक लगाने से है। हालांकि यह तर्क दिया गया कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री - विशेष रूप से अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयान, और ईमेल व संदेशों के रूप में पेश किए गए सबूत - को देखते हुए हमें नहीं लगता कि यह सजा पर रोक लगाने के लिए उपयुक्त मामला है। प्रथम दृष्टया, हम सजा पर रोक लगाने के पक्ष में नहीं हैं।"

    Case Title : TARUNJIT TEJPAL Vs THE STATE OF GOA

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