शव मिलने से पहले ही पुलिस ने लगा दी थी हत्या की धाराएं: सुप्रीम कोर्ट ने 4 आरोपियों की बरी बरकरार रखी
Praveen Mishra
26 May 2026 5:10 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (25 मई) को हत्या के एक मामले में चार आरोपियों को बरी करने के राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि मृतक के शव की बरामदगी संदिग्ध परिस्थितियों में हुई थी और केवल उसी आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती।
जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ने पाया कि पुलिस ने लापता व्यक्ति की शिकायत को शव मिलने से पहले ही हत्या का मामला मान लिया था, जिससे जांच की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठते हैं।
मामला अशोक कुमार शर्मा नामक बोलेरो जीप चालक के गायब होने और बाद में उसकी मौत से जुड़ा था। अभियोजन पक्ष का दावा था कि आरोपियों में से एक के खुलासे के आधार पर सूखे कुएं से शव बरामद किया गया था।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया कि शव 29 अप्रैल 2007 को बरामद हुआ, लेकिन एक आरोपी के 28 अप्रैल 2007 के गिरफ्तारी मेमो में पहले से ही IPC की धारा 302, 394 और 201 दर्ज थीं।
कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब उस समय तक सिर्फ गुमशुदगी की रिपोर्ट थी और शव भी नहीं मिला था, तो पुलिस ने हत्या की धाराएं कैसे जोड़ दीं।
कोर्ट ने स्वतंत्र गवाह पीडब्ल्यू-5 की गवाही पर भी भरोसा जताया, जिसमें कहा गया था कि पुलिस खुलासा बयान दर्ज होने से पहले ही उस कुएं का निरीक्षण कर चुकी थी, जहां से शव मिला था। इससे अभियोजन की कहानी पर संदेह और गहरा हो गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष का मामला मुख्य रूप से “लास्ट सीन थ्योरी” पर आधारित था, जो अकेले दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है, जब तक कि उसे अन्य मजबूत साक्ष्यों से समर्थन न मिले। कोर्ट ने यह भी पाया कि बरामद सामान की पहचान परेड (TIP) नहीं कराई गई थी।
इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ सबूतों की पूरी और अखंड श्रृंखला साबित करने में विफल रहा। इसी आधार पर कोर्ट ने शिकायतकर्ता की अपील खारिज करते हुए आरोपियों की बरी को बरकरार रखा।

