सुप्रीम कोर्ट ने जाली पॉलिसी पर शिकायत दर्ज न करने के लिए इंश्योरेंस कंपनी से सवाल किया, SIT जांच का आदेश दिया
Shahadat
7 April 2026 8:18 PM IST

इंश्योरेंस पॉलिसी में हेराफेरी के मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में तमिलनाडु के पुलिस महानिदेशक (DGP) को इस मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) गठित करने का आदेश दिया।
जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने यह आदेश यह सुनिश्चित करने के उद्देश्य से पारित किया कि इंश्योरेंस कंपनियां जो पॉलिसीधारकों द्वारा जमा किए गए भारी मात्रा में सार्वजनिक धन का प्रबंधन करती हैं, अपने दायित्वों का निर्वहन पूरी सतर्कता के साथ करें।
खंडपीठ ने टिप्पणी की कि यह मुद्दा पूरे देश में व्यापक प्रतीत होता है। खंडपीठ ने आगे राय व्यक्त की कि जब किसी इंश्योरेंस कंपनी को यह पता चलता है कि कोई पॉलिसी धोखाधड़ी से हासिल की गई और उस पर अमल नहीं किया जा सकता तो यह उसका अनिवार्य दायित्व है कि वह कार्रवाई करे और पुलिस में शिकायत दर्ज कराए, क्योंकि पॉलिसी में हेराफेरी करना एक अपराध है।
यह घटनाक्रम तब सामने आया, जब तमिलनाडु के DGP ने कोर्ट को सूचित किया कि अब तक इंश्योरेंस कंपनी ने जाली/मनगढ़ंत पॉलिसी के संबंध में पुलिस में कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई। नेशनल इंश्योरेंस कंपनी के वकील ने भी इस बात को स्वीकार किया और बताया कि कंपनी को उचित शिकायत दर्ज कराने की सलाह दी जाएगी।
हालांकि, खंडपीठ ने टिप्पणी की कि यह रवैया कंपनी की ओर से जिम्मेदारी की कमी और घोर लापरवाही को दर्शाता है।
आगे कहा गया,
"एक इंश्योरेंस कंपनी अपनी जारी की गई पॉलिसियों के तहत मोटर वाहन दुर्घटनाओं से उत्पन्न होने वाले दावों का निपटारा करने के लिए उत्तरदायी है। उस पर पूरी तत्परता के साथ कार्य करने का भी समान दायित्व है। एक बार जब उसे यह पता चल जाता है और वह इस बात से संतुष्ट हो जाती है, कि कोई पॉलिसी जाली/मनगढ़ंत है और उस पर अमल करके कंपनी पर कोई दायित्व नहीं डाला जा सकता, तो इंश्योरेंस कंपनी का यह अनिवार्य दायित्व है कि वह संबंधित अधिकारियों, यानी पुलिस को सूचित करे, क्योंकि ऐसे दस्तावेज़ों को बनाना और उनका उपयोग करना एक अपराध है।"
खंडपीठ ने यह राय भी व्यक्त की कि आवश्यक शिकायत दर्ज न करना पक्षों के बीच मिलीभगत का संकेत हो सकता है। तदनुसार, खंडपीठ ने वर्तमान मामले के तथ्यों के आधार पर एक नया मामला दर्ज करने का निर्देश दिया। अन्य लोगों के अलावा, इंश्योरेंस कंपनी के उन अधिकारियों को भी आरोपी के रूप में नामित करने का निर्देश दिया गया, जिन्हें इस धोखाधड़ी की जानकारी थी और जो उस समय संबंधित शाखा में तैनात थे, जहां से कथित तौर पर जाली/मनगढ़ंत पॉलिसी जारी की गई।
यह मामला प्रतिवादी-के. सरवनन से जुड़ा है, जो 2004 में बाइक से यात्रा करते समय एक दुखद दुर्घटना का शिकार हो गए। आरोप है कि यह दुर्घटना एक बस के लापरवाही और तेज़ी से चलाए जाने के कारण हुई। इस दुर्घटना के परिणामस्वरूप, सरवनन को कई चोटें आईं; उनके जांघों और पैरों की सर्जरी हुई, लेकिन उन्हें 70% विकलांग घोषित कर दिया गया।
रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के अनुसार, पुलिस द्वारा दावा करने वालों को कथित रूप से जाली/मनगढ़ंत बीमा पॉलिसी दी गई और उसी के आधार पर उन्होंने मुआवजे के लिए याचिका दायर की। हालांकि, सत्यापन करने पर बीमा कंपनी ने पाया कि जिस अवधि के दौरान दुर्घटना हुई, उस अवधि के लिए पॉलिसी का नवीनीकरण (Renewal) नहीं किया गया।
मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (Motor Accident Claims Tribunal) द्वारा दावा करने वालों के पक्ष में दिए गए फैसले (Award) के खिलाफ, जिसमें 8 लाख रुपये से अधिक का मुआवजा देने का आदेश दिया गया, बीमा कंपनी ने मद्रास हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
दोनों पक्षकारों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने मुआवजे की राशि को लगभग तीन गुना बढ़ा दिया और कंपनी के 'जाली बीमा पॉलिसी' का दावा यह देखते हुए खारिज कर दिया कि इस संबंध में कोई शिकायत दर्ज नहीं की गई।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की,
"यदि बीमा कंपनी ने आपराधिक शिकायत दर्ज की होती और उन दोषियों का पता लगाने के लिए आपराधिक कानून की प्रक्रिया शुरू की होती, जो जाली बीमा पॉलिसी बनाने में शामिल थे—और जिसके माध्यम से उन्होंने भोले-भाले और सीधे-सादे लोगों से बीमा का पैसा (Subscription) वसूला था—तो दूसरे प्रतिवादी/बीमा कंपनी के वकील की यह दलील स्वीकार की जा सकती थी कि दावा करने वाले द्वारा संदर्भित पॉलिसी जाली है... यहां तक कि यदि बीमा कंपनी के मामले को स्वीकार भी कर लिया जाए तो भी बीमा कंपनी को हुए नुकसान के लिए कोई आपराधिक शिकायत दर्ज किए बिना दावा करने वाले से उन दोषियों की पहचान करने या उन्हें पेश करने की अपेक्षा करना अनुचित और अतार्किक प्रतीत होता है। अज्ञात दोषियों के खिलाफ किसी भी आपराधिक शिकायत के अभाव में बीमा कंपनी के वकील की दलीलों को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं किया जा सकता।"
Case Title: NATIONAL INSURANCE COMPANY LIMITED v. K. SARAVANAN, SLP (C) NO. 1003/2022

