पुणे पोर्शे दुर्घटना मामला: ब्लड सैंपल बदलने की साजिश के आरोपी नाबालिग चालक के पिता को सुप्रीम कोर्ट से जमानत
Praveen Mishra
10 March 2026 12:11 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पुणे पोर्शे कार दुर्घटना मामले में नाबालिग आरोपी के पिता विशाल अग्रवाल को जमानत दे दी। यह मामला 19 मई 2024 को हुए उस हादसे से जुड़ा है जिसमें पोर्शे कार की टक्कर से दो लोगों की मौत हो गई थी।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की खंडपीठ ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री और इस तथ्य को देखते हुए कि इसी मामले में अन्य आरोपियों को भी राहत दी जा चुकी है, याचिकाकर्ता जमानत का हकदार है। अदालत ने यह भी नोट किया कि अग्रवाल पिछले 22 महीनों से जेल में हैं।
अदालत ने कहा कि जमानत ट्रायल कोर्ट द्वारा तय की जाने वाली शर्तों के अधीन होगी। साथ ही कोर्ट ने अग्रवाल को मामले के गवाहों से सीधे या परोक्ष रूप से संपर्क करने से मना किया और ट्रायल कोर्ट को मामले की सुनवाई जल्द से जल्द पूरी करने का निर्देश दिया।
सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की कि यह मामला भारतीय समाज की उस मानसिकता को दर्शाता है जिसमें लोग कानून से बच निकलने की कोशिश करते हैं। हालांकि उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को दोष सिद्ध होने तक छीन लिया जाना चाहिए।
राज्य सरकार ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि अन्य सह-आरोपियों के साथ समानता (parity) का सिद्धांत इस मामले में लागू नहीं होता, क्योंकि नाबालिग चालक स्वयं याचिकाकर्ता का बेटा है। अभियोजन के अनुसार, अग्रवाल ने अपनी पत्नी के माध्यम से ₹5 लाख की रिश्वत देकर रक्त के नमूनों को बदलने और “निल अल्कोहल” रिपोर्ट हासिल करने की साजिश रची।
याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने तर्क दिया कि भले ही नाबालिग कार चला रहा था, लेकिन कार में एक ड्राइवर भी मौजूद था, जिसे उन्होंने पहले से नियुक्त किया था।
वहीं पीड़ितों में से एक के पिता की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने जमानत का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि यह मामला केवल दुर्घटना का नहीं बल्कि न्याय व्यवस्था को प्रभावित करने की साजिश का है। उन्होंने कहा कि हादसे के तुरंत बाद कई फोन कॉल किए गए, जिससे यह संकेत मिलता है कि आरोपी इस साजिश का मुख्य सूत्रधार था।
हालांकि जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अभियोजन को अपने आरोप ट्रायल के दौरान साबित करने होंगे और केवल समाज को संदेश देने के लिए किसी की जमानत से इनकार नहीं किया जा सकता।
पृष्ठभूमि
यह मामला बॉम्बे हाईकोर्ट के 16 दिसंबर 2025 के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका से जुड़ा है, जिसमें अग्रवाल और अन्य सह-आरोपियों की जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी।
अभियोजन के अनुसार 19 मई 2024 की रात करीब 2:10 बजे नाबालिग चालक पुणे के कल्याणी नगर इलाके में पोर्शे कार चला रहा था, जिसने पीछे से एक मोटरसाइकिल को टक्कर मार दी। इस हादसे में अनिश अवधिया और अश्विनी कोष्ठा की मौत हो गई।
शुरुआत में एफआईआर आईपीसी की धारा 304A, 279, 337, 338 और 427 तथा मोटर वाहन अधिनियम के तहत दर्ज की गई थी, जिसे बाद में धारा 304 आईपीसी और अन्य धाराओं में बदला गया।
जांच में आरोप लगा कि दुर्घटना के तुरंत बाद साजिश रचकर सबूत मिटाने और नाबालिग के पक्ष में “निल अल्कोहल” रिपोर्ट हासिल करने की कोशिश की गई। आरोप है कि ससून अस्पताल में नाबालिग और अन्य लोगों के रक्त नमूनों को बदल दिया गया और मेडिकल रिकॉर्ड में फर्जी प्रविष्टियां की गईं।
इसी आधार पर आईपीसी की धाराओं 304, 120-B, 201, 213, 214, 466, 467, 468, 471 और 109 तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट इस मामले में तीन सह-आरोपियों और ससून अस्पताल के डॉक्टर अजय तावरे को भी जमानत दे चुका है।

