समयपूर्व रिहाई प्रक्रिया में देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, यूपी में डिजिटल मॉड्यूल लागू करने का निर्देश; सभी राज्यों-केन्द्रशासित प्रदेशों को भी समान सॉफ्टवेयर विकसित करने को कहा
Praveen Mishra
29 May 2026 1:28 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में कैदियों की समयपूर्व रिहाई (Premature Release) से संबंधित आवेदनों के निस्तारण में भारी देरी और रिहाई प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं पर चिंता व्यक्त करते हुए एक डिजिटल प्रोसेसिंग मॉड्यूल लागू करने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से भी कहा है कि वे राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) अथवा अन्य एजेंसियों के सहयोग से इसी प्रकार का सॉफ्टवेयर विकसित करें, ताकि पात्र कैदियों के मामलों पर उनकी नीतियों के अनुरूप स्वतः विचार किया जा सके।
जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की खंडपीठ ने यह निर्देश सुरेंद्र उर्फ सुंडा की अपील पर सुनवाई के दौरान जारी किए। याचिकाकर्ता ने हत्या के मामले में अपनी दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को चुनौती दी थी। हालांकि सुनवाई के दौरान मामला उत्तर प्रदेश की जेलों में समयपूर्व रिहाई संबंधी आवेदनों के लंबित रहने और प्रशासनिक देरी के व्यापक मुद्दे तक पहुंच गया।
हाईकोर्ट के आदेश के गलत अनुप्रयोग से हुआ था रिहाई का मामला
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि याचिकाकर्ता को मार्च 2024 में मथुरा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) द्वारा जमानत पर रिहा किया गया था। यह रिहाई इलाहाबाद हाईकोर्ट के जनवरी 2024 के गणेश बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में दिए गए आदेश के आधार पर हुई थी, जिसमें कहा गया था कि यदि समयपूर्व रिहाई का आवेदन छह महीने से अधिक समय तक लंबित रहे तो संबंधित दोषी को जमानत पर रिहा किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता का उस मामले से कोई संबंध नहीं था और रिहाई के समय वह केवल दो वर्ष पांच माह की सजा ही काट पाया था। न्यायालय ने इस पर गंभीर आपत्ति जताते हुए पूछा कि किसी विशेष न्यायिक आदेश के अभाव में एक मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट आजीवन कारावास की सजा पाए दोषी को कैसे रिहा कर सकता है।
बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ ने अंबरीश कुमार वर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में स्पष्ट किया कि दया, छूट और समयपूर्व रिहाई की शक्तियां केवल सक्षम कार्यपालिका प्राधिकरणों के पास हैं और अदालतें केवल आवेदन लंबित रहने के आधार पर दोषियों की रिहाई के सामान्य निर्देश नहीं दे सकतीं।
अवैध आदेश के आधार पर 158 दोषियों की रिहाई
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दाखिल हलफनामों से पता चला कि *गणेश* मामले में दिए गए निर्देशों के आधार पर जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों ने लंबित मामलों की सूची मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेटों को भेजी थी, जिसके बाद विभिन्न जिलों में दोषियों की रिहाई के आदेश जारी किए गए।
इस प्रक्रिया के तहत उत्तर प्रदेश में कुल 158 दोषियों को रिहा किया गया। इनमें से 21 दोषियों ने, वर्तमान अपीलकर्ता सहित, आजीवन कारावास के मामलों में सामान्यतः आवश्यक 14 वर्ष की न्यूनतम कैद भी पूरी नहीं की थी।
बाद में पूर्ण पीठ के फैसले के पश्चात कई दोषियों के विरुद्ध गिरफ्तारी वारंट जारी किए गए। नवंबर 2024 तक 25 दोषियों को पुनः गिरफ्तार किया जा चुका था, जबकि अन्य के खिलाफ वारंट लंबित थे।
1,678 पात्र कैदियों के मामले लंबित मिले
सुप्रीम कोर्ट की जांच में समयपूर्व रिहाई संबंधी मामलों में भारी प्रशासनिक लंबितता सामने आई।
राज्य सरकार के हलफनामे के अनुसार 31 अक्टूबर 2024 तक ऐसे 1,678 आजीवन कारावास भुगत रहे दोषी थे, जिन्होंने 14 वर्ष से अधिक की सजा पूरी कर ली थी और जिनके मामले विचाराधीन थे।
इनमें से 915 मामलों को अभी तक सक्षम प्राधिकारी के समक्ष भेजा ही नहीं गया था। 431 मामले जिला मजिस्ट्रेटों के समक्ष लंबित थे, 62 प्रस्ताव जेल मुख्यालय स्तर पर परीक्षण की प्रतीक्षा में थे और 97 प्रस्ताव निर्णयों की अनुपलब्धता या अन्य त्रुटियों के कारण वापस भेज दिए गए थे। केवल 93 कैदियों को ही वास्तव में रिहा किया गया था।
न्यायालय ने इस स्थिति को गंभीर प्रशासनिक अक्षमता का उदाहरण बताते हुए देरी के लिए दिए गए कारणों को असंतोषजनक माना।
पात्र कैदियों को आवेदन देने की आवश्यकता नहीं
पीठ ने फरवरी 2025 में दिए गए अपने निर्णय In Re: Policy Strategy for Grant of Bail का भी उल्लेख किया, जिसमें राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) द्वारा तैयार मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) को मंजूरी दी गई थी।
उस फैसले में स्पष्ट किया गया था कि जहां समयपूर्व रिहाई की नीति मौजूद है, वहां राज्य सरकार का दायित्व है कि पात्र दोषियों के मामलों पर स्वतः विचार करे। ऐसे कैदियों को अलग से आवेदन देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। जेल प्रशासन को स्वयं प्रक्रिया शुरू करनी होगी।
'ई-प्रिज़न्स अर्ली रिलीज प्रोसेसिंग मॉड्यूल' विकसित
न्यायालय ने कहा कि देरी का एक प्रमुख कारण फाइलों का विभिन्न प्रशासनिक स्तरों पर भौतिक रूप से घूमना है। इसी समस्या के समाधान के लिए मार्च 2025 में उत्तर प्रदेश सरकार को एक डिजिटल प्रणाली विकसित करने का निर्देश दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड पर लिया कि NIC ने अब मौजूदा ई-प्रिज़न्स प्लेटफॉर्म के भीतर "E-Prisons Early Release Processing Module" विकसित कर लिया है।
यह प्रणाली पात्रता प्राप्त करने से चार महीने पहले ही संबंधित कैदियों की पहचान कर लेगी और समयपूर्व रिहाई की प्रक्रिया स्वतः शुरू करेगी। इसके अलावा कैदियों या उनके अभिभावकों को एसएमएस और व्हाट्सएप के माध्यम से नियमित अपडेट भेजे जाएंगे। सभी दस्तावेज डिजिटल रूप में सुरक्षित रहेंगे तथा फाइलों की भौतिक आवाजाही समाप्त हो जाएगी।
सिस्टम में डिजिटल हस्ताक्षर, उपयोगकर्ता पहचान तंत्र और केंद्रीकृत डैशबोर्ड भी उपलब्ध होगा, जिससे अधिकारियों को वास्तविक समय में लंबित मामलों और देरी की निगरानी करने में सहायता मिलेगी।
आगरा और लखनऊ जेलों में पायलट परियोजना
सुप्रीम कोर्ट ने इस सॉफ्टवेयर को केंद्रीय कारागार आगरा और जिला कारागार लखनऊ में पायलट परियोजना के रूप में लागू करने का निर्देश दिया है। राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर आवश्यक तकनीकी ढांचा, कंप्यूटर ऑपरेटर और प्रशिक्षण कार्यक्रम उपलब्ध कराने को कहा गया है।
न्यायालय ने यह भी उम्मीद जताई कि भविष्य में इस प्रणाली को पूरे देश में लागू किया जा सकेगा। रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया है कि इस फैसले की प्रति सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को भेजी जाए, ताकि वे भी अपनी-अपनी रिहाई नीतियों के अनुरूप इसी प्रकार की डिजिटल व्यवस्था विकसित करने पर विचार कर सकें।

