PF-ESI अंशदान की देर से जमा राशि पर कर कटौती मिलेगी या नहीं? परस्पर विरोधी फैसलों पर सुप्रीम कोर्ट करेगा निर्णय

Praveen Mishra

30 Jan 2026 2:49 PM IST

  • PF-ESI अंशदान की देर से जमा राशि पर कर कटौती मिलेगी या नहीं? परस्पर विरोधी फैसलों पर सुप्रीम कोर्ट करेगा निर्णय

    सुप्रीम कोर्ट ने आयकर कानून के तहत एक विवादित मुद्दे की जांच करने पर सहमति जताई है कि क्या नियोक्ता (Employer) कर्मचारियों के भविष्य निधि (PF) और कर्मचारी राज्य बीमा (ESI) के अंशदान पर आयकर कटौती (deduction) का दावा कर सकता है, यदि ये रकम निर्धारित वैधानिक समय-सीमा के बाद जमा की गई हो।

    जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने इस मुद्दे पर दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपील में नोटिस जारी किया है। हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा था कि कर्मचारियों के PF और ESI अंशदान, यदि संबंधित कल्याणकारी कानूनों में तय नियत तारीख के बाद जमा किए गए हों, तो उन पर कर कटौती नहीं मिल सकती—भले ही भुगतान आयकर रिटर्न दाखिल करने से पहले ही क्यों न कर दिया गया हो।

    विवाद का मूल प्रश्न

    यह विवाद आयकर अधिनियम, 1961 की तीन धाराओं की व्याख्या से जुड़ा है—

    धारा 2(24)(x)

    धारा 36(1)(va)

    धारा 43B

    धारा 2(24)(x) के तहत, कर्मचारियों से वसूला गया PF/ESI अंशदान नियोक्ता की आय माना जाता है।

    धारा 36(1)(va) कर्मचारियों के अंशदान की कटौती को नियंत्रित करती है और यह स्पष्ट करती है कि यह कटौती तभी मिलेगी, जब अंशदान संबंधित कानूनों में निर्धारित वैधानिक समय-सीमा के भीतर जमा किया गया हो।

    इसके विपरीत, धारा 43B कुछ वैधानिक भुगतानों पर यह राहत देती है कि यदि भुगतान आयकर रिटर्न दाखिल करने की अंतिम तिथि से पहले कर दिया गया हो, तो कटौती मिल सकती है।

    उच्च न्यायालयों में मतभेद

    इन प्रावधानों की व्याख्या को लेकर देश के विभिन्न हाईकोर्ट्स में दो परस्पर विरोधी दृष्टिकोण उभरे हैं—

    एक दृष्टिकोण यह मानता है कि कर्मचारियों के PF/ESI अंशदान यदि वैधानिक समय-सीमा के भीतर जमा नहीं किए गए, तो धारा 36(1)(va) के तहत कटौती का अधिकार समाप्त हो जाता है।

    दूसरा दृष्टिकोण धारा 43B को लागू करते हुए यह अनुमति देता है कि यदि भुगतान रिटर्न दाखिल करने से पहले कर दिया गया हो, तो कटौती दी जा सकती है।

    सुप्रीम कोर्ट का रुख

    इन परस्पर विरोधी न्यायिक मतों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे पर अधिकृत और अंतिम व्याख्या की आवश्यकता है। पीठ ने नोटिस जारी करते हुए मामले को चार सप्ताह के भीतर प्रत्यावर्तनीय (returnable) किया है।

    इस फैसले का प्रभाव न केवल नियोक्ताओं पर, बल्कि देशभर में लंबित कर विवादों पर भी महत्वपूर्ण पड़ने की संभावना है।

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