यूपी में 'स्पिरिचुअल रीजेनरेशन मूवमेंट फाउंडेशन' की ज़मीनों की बिक्री जांच करे SIT: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
13 May 2026 4:39 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव की देखरेख में विशेष जांच दल (SIT) गठित करने का आदेश दिया। यह SIT 'स्पिरिचुअल रीजेनरेशन मूवमेंट फाउंडेशन ऑफ इंडिया' से जुड़ी ज़मीनों की कथित धोखाधड़ी वाली बिक्री की जांच करेगी। इसके साथ ही कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस अंतरिम निर्देश को भी रद्द किया, जिसमें पुलिस को इस मामले में चार्जशीट दाखिल करने से रोका गया।
जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की खंडपीठ ने यह माना कि हालांकि कोई भी कोर्ट कार्यवाही के दौरान आरोपी को दंडात्मक कदमों से बचाने के लिए अपने विवेक का इस्तेमाल कर सकता है, लेकिन इस मामले के तथ्यों को देखते हुए जांच एजेंसी को 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' (BNSS) की धारा 193(3) के तहत पुलिस रिपोर्ट दाखिल न करने का निर्देश देना अनुचित था।
यह मामला शिकायतकर्ता श्रीकांत ओझा द्वारा दायर एक अपील से जुड़ा है। यह अपील इलाहाबाद हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के खिलाफ दायर की गई। हाईकोर्ट का यह आदेश आरोपी राघवेंद्र प्रताप सिंह (जो M/s सिंहवाहिनी इंफ्राप्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक हैं) द्वारा दायर आपराधिक रिट याचिका के संदर्भ में आया था। हाईकोर्ट ने नोएडा सेक्टर 39 पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR संख्या 642 (वर्ष 2025) में जांच जारी रखने की अनुमति तो दी थी, लेकिन जांच अधिकारी को रिट याचिका का निपटारा होने तक पुलिस रिपोर्ट जमा करने से रोक दिया था।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, यह विवाद 'स्पिरिचुअल रीजेनरेशन मूवमेंट फाउंडेशन ऑफ इंडिया' से संबंधित है। यह ऐसी संस्था (सोसायटी) है, जो वर्ष 1963 में 'सोसायटी पंजीकरण अधिनियम' के तहत पंजीकृत हुई थी। कोर्ट ने उन आरोपों का संज्ञान लिया, जिनमें कहा गया कि विभिन्न व्यक्तियों ने जाली दस्तावेजों और प्रबंधन नियंत्रण के मनगढ़ंत दावों का इस्तेमाल करके अलग-अलग राज्यों में इस संस्था की ज़मीनें बार-बार बेची हैं। संस्था की संपत्ति के कथित धोखाधड़ी वाले हस्तांतरण को लेकर दिल्ली, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में पहले से ही कई दीवानी और आपराधिक मामले लंबित हैं।
खंडपीठ ने यह भी गौर किया कि पहले से FIR दर्ज होने और मुकदमेबाजी जारी होने के बावजूद, कथित तौर पर संस्था की संपत्तियों की बिक्री लगातार जारी थी।
मौजूदा FIR में आरोपियों के खिलाफ लगे आरोपों का ज़िक्र करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की,
"इसके बावजूद, उन्होंने कानून को अपने हाथ में लेते हुए संस्था की संपत्ति का सौदा कर दिया।"
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कुछ पिछले निर्णयों का हवाला दिया था, जिनमें यह सुझाव दिया गया कि जिन विवादों का स्वरूप दीवानी (सिविल) प्रकृति का होता है, उनमें हमेशा आपराधिक मुकदमा चलाना ज़रूरी नहीं होता। हाईकोर्ट ने इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के प्रज्ञा प्रांजल कुलकर्णी मामले में दिए गए फैसले का भी ज़िक्र किया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट द्वारा इन फैसलों पर भरोसा करना उचित नहीं था।
बेंच ने साफ़ किया कि प्रज्ञा प्रांजल कुलकर्णी के फ़ैसले में चार्जशीट दाख़िल करने पर पूरी तरह रोक लगाने की बात नहीं कही गई। बल्कि, उस फ़ैसले में हाईकोर्ट के आर्टिकल 226 के तहत रिट अधिकार क्षेत्र (संज्ञान लेने से पहले) और उसके बाद वैधानिक रद्द करने के अधिकार क्षेत्र के तहत उसकी शक्तियों के बीच का अंतर समझाया गया।
कोर्ट ने नीहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में तय किए गए सिद्धांत को भी दोहराया कि जांच में रुकावट डालने वाले पूरी तरह से रोक लगाने वाले अंतरिम आदेश, बिना सही कारणों के, आम तौर पर मंज़ूर नहीं होते।
कोर्ट ने कहा,
"प्रज्ञा प्रांजल कुलकर्णी के फ़ैसले को पढ़ने के बाद हमें चार्जशीट दाख़िल करने पर रोक लगाने का कोई कारण नहीं दिखता।"
सात ही जाँच अधिकारी को निर्देश दिया कि वह जांच पूरी करे और नोएडा FIR में रिपोर्ट दाख़िल करे।
संगठित ज़मीन घोटाले के बड़े संकेतों को देखते हुए कोर्ट ने जांच का दायरा सिर्फ़ इस FIR तक सीमित न रखकर, उससे आगे बढ़ाने का फ़ैसला किया।
ज़मीन घोटालों से जुड़े अपने पिछले फ़ैसले, प्रतिभा मनचंदा बनाम हरियाणा राज्य का ज़िक्र करते हुए बेंच ने कहा कि ऐसे घोटाले जनता के भरोसे को कमज़ोर करते हैं और इनकी बिना किसी रुकावट के जांच होनी चाहिए।
इसलिए कोर्ट ने निर्देश दिया कि उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव की देखरेख में एक SIT बनाई जाए, जिसमें सोसायटी के रजिस्ट्रार भी एक सदस्य हों।
SIT को यह ज़िम्मेदारी दी गई कि वह सोसायटी की सभी ज़मीनों की पहचान करे, यह जांच करे कि संपत्तियों को बिना किसी अधिकार के कैसे बेचा या ट्रांसफ़र किया गया। साथ ही मूल पदाधिकारियों के अलावा दूसरे लोगों द्वारा की गई बिक्री की तथ्यों पर आधारित जांच करे। SIT को तीन महीने के अंदर पुलिस को अपनी रिपोर्ट सौंपनी होगी, जिसके बाद अगर कोई धोखाधड़ी वाला काम (जिसमें आपराधिक इरादा शामिल हो) पाया जाता है, तो संबंधित पुलिस अधिकारी कार्रवाई कर सकते हैं।
जवाब देने वाले नंबर 2 को SIT की रिपोर्ट आने और जांच पूरी होने तक सख़्त कार्रवाई से अंतरिम सुरक्षा देते हुए, कोर्ट ने सभी आरोपियों को निर्देश दिया कि वे पूरी तरह से सहयोग करें।
उल्लेखनीय है कि बेंच ने सोसायटी के अंदरूनी गुटों के झगड़ों पर चिंता जताई, जिनकी वजह से जनता की भलाई के लिए रखी गई संपत्तियाँ बर्बाद हो रही थीं।
कोर्ट ने कहा,
"संस्थापक की मौत के बाद उनका यह इरादा बिल्कुल नहीं था कि गुटों के बीच की अनबन झगड़ों में बदल जाए। वह संपत्ति जो काफ़ी कीमती थी, उसे उनके अपने फ़ायदे के लिए, मूल उद्देश्य और लक्ष्य के विपरीत बेच दिया जाए।"
Case : Shrikant Ojha v State of UP and others

