रैलियों के लिए देशव्यापी SOP बनाना अदालत के लिए कठिन: सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को गृह मंत्रालय और निर्वाचन आयोग से संपर्क करने को कहा

Praveen Mishra

22 Jan 2026 1:46 PM IST

  • रैलियों के लिए देशव्यापी SOP बनाना अदालत के लिए कठिन: सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को गृह मंत्रालय और निर्वाचन आयोग से संपर्क करने को कहा

    सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को रैलियों, जनसभाओं और प्रदर्शनों के दौरान भगदड़ की घटनाओं को रोकने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तय करने की मांग वाली एक जनहित याचिका (PIL) का निपटारा कर दिया। अदालत ने याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी कि वह इस संबंध में पहले से गृह मंत्रालय को भेजे गए अपने प्रतिवेदन को आगे बढ़ाए।

    इसके साथ ही, कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह भी अनुमति दी कि वह राजनीतिक रैलियों और रोड शो के लिए SOP तय करने के उद्देश्य से अपना प्रतिवेदन भारत निर्वाचन आयोग के समक्ष भी प्रस्तुत कर सकता है।

    चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की खंडपीठ ने कहा कि पूरे देश के लिए एकसमान और व्यापक निर्देश जारी करना “बहुत कठिन” है। इसी आधार पर अदालत ने इस मामले में हस्तक्षेप से इनकार किया। हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि भारत संघ याचिका में उठाए गए मुद्दों पर विचार कर सकता है।

    खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा,

    “यह मामला सार्वजनिक स्थलों पर आयोजित कार्यक्रमों में कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी से जुड़ा है, जो मुख्य रूप से केंद्र और राज्य सरकारों के दायरे में आता है। याचिका में मांगे गए निर्देश नीति निर्माण से संबंधित हैं, जिनके लिए विशेषज्ञ संस्थान और कानून प्रवर्तन एजेंसियां अधिक उपयुक्त हैं। चूंकि याचिकाकर्ता पहले ही गृह मंत्रालय से संपर्क कर चुका है, इसलिए हम याचिका को इस स्तर पर निस्तारित करना उचित समझते हैं।”

    यह याचिका तुम्बलम गूटी वेंकटेश, आंध्र प्रदेश से राज्यसभा के पूर्व सांसद एवं पूर्व राज्य मंत्री द्वारा दायर की गई थी। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता जी प्रियांधर्शिनी ने दलील दी कि हाल के वर्षों में कई भगदड़ की घटनाएं सामने आई हैं। उन्होंने जून 2025 में बेंगलुरु में RCB की जीत के जुलूस और सितंबर 2025 में करूर में TVK पार्टी की राजनीतिक रैली के दौरान हुई भगदड़ की घटनाओं का हवाला दिया।

    सुनवाई के दौरान चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने सवाल उठाया कि क्या अदालत ऐसे सामान्य निर्देश जारी कर सकती है जिनका पालन व्यावहारिक रूप से संभव हो। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी मैदान की क्षमता 10,000 लोगों की हो और 50,000 लोग वहां आ जाएं, तो ऐसी स्थिति में निर्देशों को लागू करना बेहद कठिन हो जाएगा।

    याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि हाल ही में मानसिक रूप से दिव्यांग व्यक्तियों के लिए संचालित गृहों के नियमन से संबंधित SOP पर कोर्ट ने विचार किया था। उन्होंने यह भी बताया कि मद्रास उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद तमिलनाडु सरकार ने राजनीतिक रैलियों के लिए SOP बनाई है, लेकिन अन्य राज्यों में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। इसलिए कम से कम एक न्यूनतम राष्ट्रीय मानक तय किया जाना जरूरी है।

    हालांकि, खंडपीठ ने यह भी नोट किया कि याचिकाकर्ता ने गृह मंत्रालय को प्रतिवेदन भेजने के कुछ ही दिनों बाद याचिका दाखिल कर दी थी, जिससे मंत्रालय को उस पर विचार करने का पर्याप्त समय नहीं मिला।

    अंततः, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी कि वह अपने प्रतिवेदन को गृह मंत्रालय और निर्वाचन आयोग के समक्ष आगे बढ़ाए।

    याचिका में मांग की गई थी कि राजनीतिक रैलियों और बड़े सार्वजनिक आयोजनों में भीड़ नियंत्रण के लिए अनिवार्य राष्ट्रीय दिशानिर्देश बनाए जाएं। इसमें एक केंद्रीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म, राष्ट्रीय भीड़ प्रबंधन एवं सुरक्षा संहिता, रियल-टाइम निगरानी, जोखिम ऑडिट और आधुनिक तकनीक के उपयोग जैसे उपायों की भी सिफारिश की गई थी, ताकि भविष्य में भगदड़ और जनहानि की घटनाओं को रोका जा सके।

    यह याचिका एडवोकेट राहुल श्याम भंडारी, जी प्रियांधर्शिनी और सत्यम पाठक द्वारा तैयार की गई थी और इसे AOR राहुल श्याम भंडारी के माध्यम से दाखिल किया गया था।

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