मध्य प्रदेश में सरकारी वकीलों की नियुक्ति में OBC आरक्षण की मांग वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट ने निपटाई, प्रतिनिधित्व पर दिया जोर
Praveen Mishra
10 Feb 2026 1:33 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मध्य प्रदेश में सरकारी वकीलों (Government Pleaders) की नियुक्ति में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के अधिवक्ताओं के लिए आरक्षण की मांग वाली याचिका का निपटारा कर दिया। कोर्ट ने किसी वैधानिक प्रावधान के अभाव में बाध्यकारी निर्देश देने से इनकार किया, लेकिन अधिवक्ता महाधिवक्ता (Advocate General) से यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया कि हाशिए के समुदायों और महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व मिले।
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ इस याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि हालिया नियुक्तियों में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और OBC वर्ग के अधिवक्ताओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि हाल की नियुक्तियों में एक भी ST अधिवक्ता का चयन नहीं हुआ और SC वर्ग से भी बहुत कम अधिवक्ताओं को स्थान मिला। यह भी कहा गया कि सरकारी वकीलों की नियुक्ति का दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है, क्योंकि ऐसे वकीलों पर आगे चलकर न्यायाधीश पद के लिए विचार किया जाता है।
इस पर जस्टिस सुंदरेश ने सवाल उठाया कि क्या ऐसी नियुक्तियों में आरक्षण को अधिकार के रूप में लागू किया जा सकता है। उन्होंने कहा, “क्या हम लॉ क्लर्क्स के लिए भी आरक्षण दे सकते हैं? महाधिवक्ता अपनी टीम अपने साथ लाते हैं।”
जस्टिस कोटिश्वर सिंह ने भी कहा कि महाधिवक्ता बदलने पर अक्सर सरकारी वकील भी बदल जाते हैं।
राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट और अन्य अदालतों में राज्य का प्रतिनिधित्व करने के लिए महाधिवक्ता को अपनी टीम नियुक्त करने का विशेषाधिकार है और इन नियुक्तियों पर वैधानिक आरक्षण नियम लागू नहीं होते।
हालांकि, जस्टिस सुंदरेश ने कहा, “कानूनी तौर पर भले ही उनका अधिकार न हो, लेकिन कम से कम विचार तो होना चाहिए। महाधिवक्ता बार के नेता होते हैं।” न्यायमूर्ति कोटिश्वर सिंह ने भी व्यापक प्रतिनिधित्व को “वांछनीय” बताया।
राज्य के वकील ने पीठ को आश्वासन दिया कि उठाई गई चिंताओं को महाधिवक्ता तक पहुंचाया जाएगा।
जस्टिस सुंदरेश ने टिप्पणी की, “दूसरों को भी आगे आने का अवसर मिलना चाहिए। आप जिस पद पर हैं, वहीं से आगे बढ़ने के मौके मिलते हैं। यदि अवसर ही नहीं दिया जाएगा, तो वे आगे कैसे आएंगे?”
अपने आदेश में पीठ ने कहा कि किसी वैधानिक आरक्षण प्रावधान के अभाव में वह बाध्यकारी निर्देश नहीं दे सकती, लेकिन महाधिवक्ता से अनुरोध करती है कि नियुक्तियों के दौरान हाशिए के समाज से आने वाले अधिवक्ताओं और महिलाओं का समुचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए। इसके साथ ही याचिका का निपटारा कर दिया गया।

