नाबालिग रेप पीड़िताओं के गर्भपात से समय सीमा हटाने के लिए कानून में संशोधन करें: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा

  • नाबालिग रेप पीड़िताओं के गर्भपात से समय सीमा हटाने के लिए कानून में संशोधन करें: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा

    सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि Medical Termination of Pregnancy Act, 1971 में संशोधन कर नाबालिग लड़कियों के साथ बलात्कार से उत्पन्न गर्भधारण के मामलों में समय सीमा (time limit) हटाई जानी चाहिए।

    चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ All India Institute of Medical Sciences (AIIMS), नई दिल्ली द्वारा दायर क्यूरेटिव याचिका पर सुनवाई कर रही थी। यह याचिका 15 वर्षीय लड़की के 30 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने के निर्देश के खिलाफ दाखिल की गई थी।

    सुनवाई के दौरान एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि गर्भ 24 सप्ताह की कानूनी सीमा पार कर चुका है। इस पर चीफ़ जस्टिस ने कहा कि नाबालिग रेप पीड़िताओं के मामलों में ऐसी समय सीमा नहीं होनी चाहिए, क्योंकि कई बार पीड़िता को गर्भ का पता देर से चलता है या वह सामाजिक कारणों से इसे बताने में हिचकिचाती है।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून में संशोधन कर ऐसे मामलों की सुनवाई जल्द से जल्द सुनिश्चित की जानी चाहिए।

    खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि गर्भपात से जुड़ी समय सीमा डॉक्टरों पर लागू होती है, लेकिन अदालत अपने संवैधानिक अधिकार, विशेषकर Article 142 of the Constitution of India के तहत विशेष परिस्थितियों में निर्णय ले सकती है।

    सुप्रीम कोर्ट ने AIIMS की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि अस्पताल किसी नाबालिग पर अपना निर्णय नहीं थोप सकता। यह फैसला लड़की का होगा कि वह गर्भ जारी रखना चाहती है या उसे समाप्त करना चाहती है।

    क्या है मौजूदा कानून?

    वर्तमान कानून (2021 संशोधन) के तहत सामान्य रूप से 20 सप्ताह तक गर्भपात की अनुमति है। विशेष परिस्थितियों—जैसे रेप पीड़िता, नाबालिग, या गंभीर भ्रूण विकृति—में यह सीमा 24 सप्ताह तक बढ़ाई गई है। 24 सप्ताह के बाद गर्भपात केवल तब संभव है, जब महिला की जान बचाना आवश्यक हो या भ्रूण में गंभीर असामान्यता हो।

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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