वैवाहिक मामलों में AI से गढ़े जा रहे अक्सर सबूत, झूठे आरोप हो गए हैं आम: सुप्रीम कोर्ट

Praveen Mishra

21 Jan 2026 1:44 PM IST

  • वैवाहिक मामलों में AI से गढ़े जा रहे अक्सर सबूत, झूठे आरोप हो गए हैं आम: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में फर्जी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से तैयार किए गए साक्ष्यों के बढ़ते इस्तेमाल पर गहरी चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि आजकल पति-पत्नी के बीच मतभेद होते ही एक-दूसरे को “किसी भी कीमत पर सबक सिखाने” की मानसिकता हावी हो जाती है, जिसके चलते झूठे आरोप लगाए जाते हैं और कई मामलों में तकनीक की मदद से सबूत तक गढ़े जा रहे हैं।

    जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की खंडपीठ ने विवाह को अप्रतिरोहणीय विघटन (irretrievable breakdown of marriage) के आधार पर भंग करते हुए टिप्पणी की:

    “जब वैवाहिक विवाद में पक्षों के बीच मतभेद पैदा होते हैं, तो यह सोच शुरू हो जाती है कि दूसरे पक्ष को कैसे सबक सिखाया जाए। इसके लिए सबूत जुटाए जाते हैं और कई मामलों में आज के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में सबूत बनाए भी जाते हैं। झूठे आरोप आम होते जा रहे हैं।”

    अदालत ने यह भी कहा कि वैवाहिक विवाद उत्पन्न होने पर सबसे पहले पक्षकारों और उनके वकीलों का दायित्व होना चाहिए कि वे मुकदमेबाजी से पहले मध्यस्थता (pre-litigation mediation) की दिशा में गंभीर प्रयास करें। कुछ मामलों में परामर्श (counselling) की भी आवश्यकता हो सकती है।

    खंडपीठ ने यह स्पष्ट किया कि भले ही मामूली मामलों में, जैसे भरण-पोषण से संबंधित याचिकाएं (BNSS, 2023 की धारा 144 अथवा पहले की धारा 125 CrPC) या घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 की धारा 12 के तहत आवेदन दायर किए जाएं, अदालतों को सबसे पहले मध्यस्थता की संभावना तलाशनी चाहिए, न कि तुरंत जवाब-प्रतिजवाब मंगवाकर आरोप-प्रत्यारोप की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए, क्योंकि इससे विवाद और गहरा हो जाता है।

    पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की प्रवृत्ति पर भी अदालत ने आलोचनात्मक रुख अपनाया और कहा कि साधारण वैवाहिक विवादों में पहली प्राथमिकता सुलह-समझौते की होनी चाहिए, वह भी संभव हो तो न्यायालयों के मध्यस्थता केंद्रों के माध्यम से, न कि सीधे पुलिस थाने बुलाकर। अदालत ने आगाह किया कि गिरफ्तारी—even अगर एक दिन के लिए हो—अक्सर “नो रिटर्न” की स्थिति पैदा कर देती है।

    जस्टिस राजेश बिंदल द्वारा लिखित फैसले में कहा गया कि यह विवाह पिछले 13 वर्षों से पूरी तरह टूट चुका था। वर्ष 2012 में शादी के बाद पति-पत्नी महज 65 दिनों तक साथ रहे, लेकिन इसके बाद वे एक दशक से अधिक समय तक कानूनी लड़ाइयों में उलझे रहे। इस दौरान दोनों पक्षों के बीच 40 से अधिक मुकदमे चले, जिनमें तलाक याचिकाएं, भरण-पोषण के मामले, घरेलू हिंसा के प्रकरण, आईपीसी की धारा 498A के तहत आपराधिक मामले, निष्पादन याचिकाएं, झूठी गवाही (perjury) से जुड़े आवेदन, रिट याचिकाएं और विभिन्न अदालतों में स्थानांतरण अर्जियां शामिल थीं।

    सुप्रीम कोर्ट में यह मामला पत्नी द्वारा पति के खिलाफ दर्ज मामले के स्थानांतरण की मांग के साथ पहुंचा था। हालांकि बीच में मध्यस्थता का विकल्प तलाशा गया, लेकिन वह सफल नहीं हो सका। इसके बाद पत्नी ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विवाह विच्छेद की मांग की, जिसे स्वीकार करते हुए कोर्ट ने विवाह को भंग कर दिया।

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