पालन की तिथि निर्धारित न हो तो अनिवार्य निषेधाज्ञा के क्रियान्वयन की सीमा अवधि डिक्री की तारीख से 3 वर्ष: सुप्रीम कोर्ट

Praveen Mishra

19 Feb 2026 5:17 PM IST

  • पालन की तिथि निर्धारित न हो तो अनिवार्य निषेधाज्ञा के क्रियान्वयन की सीमा अवधि डिक्री की तारीख से 3 वर्ष: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि अनिवार्य निषेधाज्ञा (mandatory injunction) संबंधी डिक्री में कार्य निष्पादन के लिए कोई तिथि निर्धारित नहीं की गई हो, तो उसके क्रियान्वयन के लिए सीमा अवधि डिक्री की तारीख से तीन वर्ष होगी।

    जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की खंडपीठ उस मामले की सुनवाई कर रही थी जिसमें प्रथम अपीलीय न्यायालय ने 06.01.2005 को याचिकाकर्ताओं के पक्ष में अनिवार्य निषेधाज्ञा की डिक्री पारित की थी, लेकिन उसमें आदेश के पालन की कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई थी।

    याचिकाकर्ताओं ने 12.08.2010 को निष्पादन न्यायालय (Executing Court) में आवेदन दायर कर डिक्री के पालन की मांग की। निष्पादन न्यायालय ने इस आवेदन को खारिज कर दिया, यह कहते हुए कि यह सीमा अवधि से बाहर है, क्योंकि लिमिटेशन एक्ट, 1963 की अनुसूची के अनुच्छेद 135 के अनुसार ऐसी डिक्री के क्रियान्वयन के लिए तीन वर्ष की अवधि निर्धारित है।

    अनुच्छेद 135 के अनुसार, यदि डिक्री में पालन की तिथि तय हो तो सीमा अवधि उसी तिथि से शुरू होती है, और यदि कोई तिथि तय न हो तो डिक्री की तारीख से तीन वर्ष की अवधि लागू होती है।

    निष्पादन न्यायालय के इस निर्णय के विरुद्ध याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की, जिसे भी खारिज कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

    सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप से इनकार करते हुए कहा कि चूंकि अनिवार्य निषेधाज्ञा की डिक्री में पालन की कोई तिथि निर्धारित नहीं थी, इसलिए सीमा अवधि डिक्री की तारीख से ही शुरू होगी। अतः निष्पादन न्यायालय द्वारा आवेदन को समय-सीमा से बाहर मानकर खारिज करना सही था।

    अदालत ने कहा, “प्रथम अपीलीय न्यायालय द्वारा पारित डिक्री में पालन की कोई तिथि निर्दिष्ट नहीं थी, इसलिए सीमा अवधि डिक्री की तारीख से ही शुरू होगी, जैसा कि निष्पादन न्यायालय ने माना।”

    अदालत ने आगे कहा कि चूंकि निष्पादन आवेदन केवल अनिवार्य निषेधाज्ञा के हिस्से के क्रियान्वयन से संबंधित था, इसलिए impugned आदेश में हस्तक्षेप का कोई औचित्य नहीं है।

    Praveen Mishra

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    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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