“शादी से पहले साथ क्यों रही?”: 15 साल के लिव-इन रिश्ते में 'झूठे शादी के वादे' पर यौन शोषण के आरोप पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

Praveen Mishra

28 April 2026 12:12 AM IST

  • “शादी से पहले साथ क्यों रही?”: 15 साल के लिव-इन रिश्ते में झूठे शादी के वादे पर यौन शोषण के आरोप पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि लंबे समय तक चले लिव-इन रिलेशनशिप में, जहां दोनों पक्ष साथ रहे और एक बच्चा भी हुआ, उसे केवल “शादी के झूठे वादे पर यौन शोषण” के आपराधिक मामले के रूप में नहीं देखा जा सकता।

    जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की खंडपीठ एक महिला की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें भारतीय न्याय संहिता, 2024 की धाराओं 69, 115(2) और 74 के तहत दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया गया था।

    महिला का आरोप था कि आरोपी ने शादी का झूठा वादा कर उसका यौन शोषण किया और यह तथ्य छुपाया कि वह पहले से शादीशुदा है। हालांकि, सुनवाई के दौरान कोर्ट ने संबंध की प्रकृति पर सवाल उठाए। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि जब दोनों पक्ष सहमति से 15 वर्षों तक साथ रहे और एक बच्चा भी हुआ, तो ऐसे में आपराधिक अपराध का प्रश्न कैसे बनता है।

    कोर्ट ने यह भी पूछा कि यदि यह रिश्ता सहमति पर आधारित था, तो इतने वर्षों बाद शिकायत क्यों दर्ज कराई गई। पीठ ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में अलगाव अपने आप में आपराधिक अपराध नहीं बनता। “अगर कोई व्यक्ति ऐसे संबंध से बाहर निकलता है, तो यह उस रिश्ते का जोखिम है,” कोर्ट ने टिप्पणी की।

    याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि महिला कम उम्र में विधवा हो गई थी और आरोपी ने उसकी कमजोर स्थिति का फायदा उठाया। साथ ही, यह भी कहा गया कि आरोपी पहले से विवाहित था और उसने यह तथ्य छुपाया।

    इस पर कोर्ट ने कहा कि यदि विवाह हुआ होता, तो महिला के पास भरण-पोषण और द्विविवाह (बिगैमी) जैसे कानूनी उपाय उपलब्ध होते। लेकिन विवाह के अभाव में, लिव-इन संबंधों में ऐसे जोखिम बने रहते हैं।

    कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि आपराधिक कार्रवाई के बजाय बच्चे के भरण-पोषण जैसे उपाय अधिक व्यावहारिक हो सकते हैं। पीठ ने मध्यस्थता (मेडिएशन) का सुझाव देते हुए कहा कि कम से कम बच्चे के लिए आर्थिक सहायता सुनिश्चित की जा सकती है।

    अंत में, कोर्ट ने नोटिस जारी करते हुए मामले को 25 मई के लिए सूचीबद्ध किया है, ताकि यह देखा जा सके कि पक्षकारों के बीच कोई समझौता संभव है या नहीं।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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