40 साल से मकान पर कब्जा रखने वाले किरायेदार को सुप्रीम कोर्ट का झटका, कहा- लंबे मुकदमे से मकान मालिक की वास्तविक जरूरत खत्म नहीं हो सकती

  • 40 साल से मकान पर कब्जा रखने वाले किरायेदार को सुप्रीम कोर्ट का झटका, कहा- लंबे मुकदमे से मकान मालिक की वास्तविक जरूरत खत्म नहीं हो सकती

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि लंबे समय तक चलने वाली मुकदमेबाजी मकान मालिक की वास्तविक जरूरत को खत्म नहीं कर सकती। कोर्ट ने करीब चार दशक से किराए की संपत्ति पर कब्जा बनाए रखने वाले किरायेदार को बेदखल करने का आदेश बहाल कर दिया।

    जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस नोंगमाइकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें किरायेदार को राहत दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने निर्धारित प्राधिकारी (Prescribed Authority) द्वारा पारित बेदखली आदेश को बहाल कर दिया, जिसे अपीलीय प्राधिकारी ने भी बरकरार रखा था।

    क्या था मामला?

    मकान मालिक ने जुलाई 1984 में संपत्ति का स्वामित्व हासिल किया था। इसके बाद उत्तर प्रदेश शहरी भवन (किराए पर देने, किराया और बेदखली का विनियमन) अधिनियम, 1972 की धारा 21(1)(a) के तहत किरायेदार को वैधानिक नोटिस जारी कर तीन साल के भीतर मकान खाली करने की मांग की थी।

    वर्ष 1988 में निर्धारित प्राधिकारी के समक्ष आश्वासन देने के बावजूद किरायेदार ने मकान खाली नहीं किया।

    इसके बाद मकान मालिक ने वर्ष 2010 में बेदखली की कार्यवाही शुरू की। उसने दलील दी कि उसे अपने बेटे के लिए मेडिकल क्लिनिक स्थापित करने के उद्देश्य से संपत्ति की वास्तविक आवश्यकता है। उसका बेटा न्यूरोसर्जन है।

    दिसंबर 2012 में निर्धारित प्राधिकारी ने मकान मालिक की वास्तविक आवश्यकता को स्वीकार करते हुए बेदखली का आदेश पारित किया। अपीलीय प्राधिकारी ने भी इस आदेश को बरकरार रखा।

    हालांकि, किरायेदार ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया। मार्च 2025 में हाईकोर्ट ने किरायेदार के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बेदखली आदेश रद्द कर दिया। इसके बाद मकान मालिक ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

    सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

    मामले पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मकान मालिक ने 1984 में संपत्ति हासिल की थी और वर्ष 1986 में ही सिविल मुकदमा शुरू कर दिया था। इसके बावजूद करीब 40 वर्षों तक किरायेदार संपत्ति पर कब्जा बनाए रहा।

    कोर्ट ने कहा कि मकान मालिक का बेटा न्यूरोसर्जन है और अपने क्लिनिक के लिए इस परिसर का उपयोग करना चाहता है, लेकिन लंबे समय से संपत्ति खाली नहीं होने के कारण वह ऐसा नहीं कर सका।

    पीठ ने Ravi Khandelwal v. Taluka Stores मामले का हवाला देते हुए कहा कि दशकों तक चलने वाली मुकदमेबाजी के दौरान समय बीतने से शुरुआती तकनीकी बाधाएं समाप्त हो जाती हैं।

    कोर्ट ने कहा:

    “लंबे समय तक चलने वाली मुकदमेबाजी मकान मालिक की वैध जरूरत को विफल नहीं कर सकती।”

    पीठ ने कहा कि यदि इतने वर्षों बाद भी मकान मालिक को केवल इस आधार पर नया मुकदमा दायर करने के लिए कहा जाए कि शुरुआती पांच साल की अवधि पूरी नहीं हुई थी, तो यह न्याय के उद्देश्य को विफल करने जैसा होगा।

    कोर्ट ने माना कि मुकदमेबाजी में बीते लंबे समय को मकान मालिक की वास्तविक आवश्यकता के विरुद्ध इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

    किरायेदार को 30 दिन में मकान खाली करने का निर्देश

    इन टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और निर्धारित प्राधिकारी तथा अपीलीय प्राधिकारी द्वारा पारित बेदखली आदेश बहाल कर दिया।

    कोर्ट ने किरायेदार को निर्देश दिया कि वह आदेश की तारीख से 30 दिनों के भीतर मकान मालिक को संपत्ति का खाली और शांतिपूर्ण कब्जा सौंपे।

    इसके अलावा, किरायेदार को इसी अवधि के भीतर बकाया किराया और यदि कोई वर्तमान किराया देय है, तो उसका भुगतान भी करना होगा।

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    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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