कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़े जाने चाहिए दिव्यांग अधिकार, तभी कार्यस्थल पर सच्ची समानता संभव: सुप्रीम कोर्ट
Amir Ahmad
15 Jan 2026 12:17 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों को कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए, ताकि ऐसे वर्गों के मानवाधिकारों की प्रभावी सुरक्षा हो सके और कार्यस्थल पर वास्तविक समानता सुनिश्चित की जा सके।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दिव्यांग अधिकार केवल कल्याण का विषय नहीं हैं, बल्कि वे मानवाधिकार हैं, जिनका सम्मान और संरक्षण कॉरपोरेट संस्थाओं की जिम्मेदारी है।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी उस मामले में की, जिसमें कोल इंडिया लिमिटेड ने एक महिला अभ्यर्थी को केवल इस आधार पर नौकरी देने से इनकार कर दिया कि वह कई प्रकार की दिव्यांगताओं से ग्रसित है।
कोर्ट ने कोल इंडिया लिमिटेड को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता के लिए एक सुपरन्यूमेरेरी पोस्ट सृजित करे।
साथ ही पीठ ने दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 को कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ जोड़कर पढ़ने की आवश्यकता पर जोर दिया।
कोर्ट ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद द्वारा 2011 में अनुमोदित व्यवसाय और मानवाधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र मार्गदर्शक सिद्धांतों का भी उल्लेख किया, जिनके अनुसार कंपनियों की यह जिम्मेदारी है कि वे मानवाधिकारों का सम्मान करें, विशेष रूप से उन समूहों के अधिकारों का जिन्हें विशेष संरक्षण की आवश्यकता होती है, जैसे महिलाएं, बच्चे, दिव्यांग व्यक्ति और प्रवासी श्रमिक।
सुप्रीम कोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के एक अध्ययन का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार मानवाधिकार हैं और उद्यमों का दायित्व केवल उल्लंघन से बचना ही नहीं, बल्कि इन अधिकारों को आगे बढ़ाना भी है।
पीठ ने कहा,
“यह पूरी तरह स्पष्ट है कि दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों को कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। कार्यस्थल पर सच्ची समानता तभी संभव है, जब दिव्यांग अधिकारों को CSR का अभिन्न हिस्सा माना जाए।”
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता ने कोल इंडिया लिमिटेड में प्रबंधन प्रशिक्षु के पद के लिए दृष्टिबाधित श्रेणी के तहत आवेदन किया था।
साक्षात्कार में सफल होने के बाद दस्तावेज़ सत्यापन और मेडिकल टेस्ट के दौरान यह सामने आया कि वह न केवल दृष्टिबाधित है, बल्कि उसे दोनों आंखों में 60 प्रतिशत कम दृष्टि और आंशिक पक्षाघात की समस्या भी है। इसके आधार पर उसे नियुक्ति से वंचित कर दिया गया।
अपीलकर्ता ने कोलकाता हाइकोर्ट का रुख किया, जहां सिंगल बेंच ने मेडिकल रिपोर्ट को रद्द करते हुए कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी इस आधार पर नियुक्ति से इनकार नहीं कर सकती। हालांकि, बाद में डिवीजन बेंच ने यह कहते हुए आदेश पलट दिया कि याचिका भर्ती प्रक्रिया पूरी होने के बाद दायर की गई।
इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
यहां कोल इंडिया लिमिटेड ने तर्क दिया कि अपीलकर्ता को 40 प्रतिशत की बेंचमार्क दिव्यांगता नहीं है।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने एम्स, नई दिल्ली को मेडिकल बोर्ड गठित कर जांच करने का निर्देश दिया। एम्स की रिपोर्ट में यह स्पष्ट हुआ कि अपीलकर्ता को 57 प्रतिशत दिव्यांगता है, जो बेंचमार्क से अधिक है।
इन तथ्यों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने न केवल अपीलकर्ता के पक्ष में आदेश पारित किया बल्कि यह भी स्पष्ट संदेश दिया कि दिव्यांग अधिकारों को कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व का अनिवार्य हिस्सा बनाना समय की आवश्यकता है।

