केवल निर्णय में त्रुटि पर जज के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं हो सकती: सुप्रीम कोर्ट
Amir Ahmad
5 Jan 2026 3:20 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल कथित रूप से गलत या त्रुटिपूर्ण न्यायिक आदेश पारित करने के आधार पर जिला न्यायपालिका के किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती।
अदालत ने मध्य प्रदेश के एक न्यायिक अधिकारी की बर्खास्तगी रद्द करते हुए हाईकोर्ट को इस तरह की यांत्रिक कार्रवाई से सावधान रहने को कहा है।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने निर्भय सिंह सुलिया की अपील स्वीकार की। सुलिया को वर्ष 2014 में अतिरिक्त जिला एवं सत्र जज के पद पर रहते हुए सेवा से हटा दिया गया था। उन पर आबकारी अधिनियम के तहत जमानत याचिकाओं के निपटारे में 'दोहरा मापदंड' अपनाने और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए।
यह कार्रवाई हाईकोर्ट द्वारा कराई गई विभागीय जांच के बाद की गई। आरोप है कि मध्य प्रदेश आबकारी अधिनियम की धारा 34(2) के अंतर्गत दर्ज मामलों में जहां 50 बल्क लीटर से अधिक शराब की जब्ती हुई, कुछ मामलों में जमानत दी गई जबकि अन्य समान मामलों में यह कहते हुए जमानत खारिज कर दी गई कि इतनी मात्रा में शराब जब्त होने पर जमानत नहीं दी जा सकती।
अनुशासनात्मक कार्रवाई में सावधानी आवश्यक
मुख्य निर्णय लिखते हुए जस्टिस के.वी. विश्वनाथन ने कहा कि हाईकोर्ट को न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करते समय अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए। केवल इसलिए कि कोई आदेश गलत है या निर्णय में त्रुटि है बिना किसी अतिरिक्त ठोस सामग्री के, किसी न्यायिक अधिकारी को विभागीय कार्यवाही की पीड़ा से नहीं गुजरना चाहिए।
अदालत ने कहा कि इस प्रकार की कार्रवाइयों से जिला न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और विशेष रूप से जमानत मामलों में ट्रायल कोर्ट के जज विवेकाधिकार के प्रयोग से हिचकने लगते हैं।
जस्टिस पारदीवाला ने अपने सहमतिपूर्ण निर्णय में कहा कि प्रशासनिक कार्रवाई के भय के कारण कई बार ट्रायल कोर्ट के जज योग्य मामलों में भी जमानत देने से बचते हैं, जिससे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जमानत याचिकाओं की संख्या अत्यधिक बढ़ जाती है।
झूठी शिकायतों पर सख्ती के निर्देश
पीठ ने न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ झूठी और निराधार शिकायतों पर भी कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर ऐसी शिकायतें करता पाया जाए तो उसके खिलाफ अवमानना सहित उपयुक्त कार्यवाही की जानी चाहिए। यदि शिकायतकर्ता बार का सदस्य हो तो बार काउंसिल को अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए संदर्भ भेजा जाना चाहिए।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जहां किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ कदाचार के आरोप प्रथम दृष्टया सही पाए जाएं, वहां त्वरित और कठोर कार्रवाई आवश्यक है और ऐसे मामलों में कोई नरमी नहीं बरती जानी चाहिए।
न्यायिक स्वतंत्रता और ईमानदारी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका के किसी भी स्तर पर भ्रष्टाचार असहनीय है लेकिन केवल गलत आदेश या विवेकाधिकार के कथित गलत प्रयोग के आधार पर विभागीय कार्रवाई उचित नहीं ठहराई जा सकती।
अदालत ने पूर्व के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि किसी अधिकारी की ईमानदारी पर संदेह केवल आशंका या अनुमान के आधार पर नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके लिए ठोस और संभावनाओं पर आधारित सामग्री होना आवश्यक है।
बर्खास्तगी रद्द, सभी लाभ देने के निर्देश
अदालत ने बर्खास्तगी आदेश को रद्द करते हुए निर्देश दिया कि अपीलकर्ता को सेवानिवृत्ति की आयु तक सेवा में निरंतर माना जाए और उसे पूर्ण वेतन, बकाया राशि तथा सभी परिणामी लाभ दिए जाएं।
अदालत ने यह भी आदेश दिया कि समस्त मौद्रिक लाभ आठ सप्ताह के भीतर छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित जारी किए जाएं। साथ ही इस निर्णय की प्रति सभी हाईकोर्ट को प्रसारित करने के निर्देश दिए गए हैं।
मामले में पृष्ठभूमि
सुलिया के खिलाफ मध्य प्रदेश सिविल सेवा नियमों के तहत विभागीय जांच हुई, जिसमें दो में से एक आरोप सिद्ध माना गया। इसके आधार पर हाईकोर्ट की प्रशासनिक समिति और पूर्णपीठ ने सेवा से हटाने की सिफारिश की, जिसे राज्य सरकार ने स्वीकार कर लिया। बाद में राज्यपाल ने उनकी वैधानिक अपील भी खारिज कर दी थी।
इन आदेशों को चुनौती देते हुए सुलिया ने हाईकोर्ट का रुख किया, जहां उनकी याचिका खारिज कर दी गई। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां उन्हें राहत प्रदान की गई।

