पत्रकार अभिषेक उपाध्याय को सुप्रीम कोर्ट से राहत: 3 महीने का डिजिटल डेटा मांगने वाला यूपी पुलिस का नोटिस रद्द, जब्त कार छोड़ने का आदेश
Praveen Mishra
14 Oct 2026 4:30 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (14 अक्टूबर) को उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' को जारी उस नोटिस को रद्द कर दिया, जिसमें पत्रकार अभिषेक उपाध्याय का कथित रोड रेज मामले में घटना से लगभग तीन महीने पहले तक का डिजिटल डेटा मांगा गया था।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने कहा कि घटना से तीन महीने पहले तक का निजी या डिजिटल डेटा मांगना जरूरत से ज्यादा प्रतीत होता है। जस्टिस बागची ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि इस तरह की मांग 'ओवरकिल' यानी आवश्यकता से अधिक है।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि 'X' को जारी नोटिस के तहत या अन्यथा प्राप्त की गई किसी भी जानकारी का इस्तेमाल अभिषेक उपाध्याय के खिलाफ नहीं किया जाएगा।
FIR के बाद भी डिजिटल डेटा मांगने पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा कि अदालत यह देख रही है कि जांच के दौरान नियमों और शक्तियों का इस्तेमाल किस तरीके से किया जा रहा है।
उन्होंने टिप्पणी की कि कथित घटना से तीन महीने पहले तक का डेटा जब्त करना जरूरत से ज्यादा है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि FIR दर्ज होने के बाद भी निजी या गोपनीय जानकारी तब तक नहीं मांगी जा सकती, जब तक आरोपी का पता लगाने या उसे गिरफ्तार करने के वैकल्पिक उपाय अपर्याप्त साबित न हों।
पीठ ने कहा कि गाजियाबाद के पुलिस आयुक्त द्वारा हलफनामे में दी गई यह दलील कि डेटा मुख्य रूप से पत्रकार का पता लगाने और गिरफ्तारी में मदद के लिए मांगा गया था, 'X' को भेजे गए नोटिस की सामग्री से पूरी तरह मेल नहीं खाती। नोटिस में लॉगिन और लॉगआउट IP एड्रेस, ईमेल आईडी, IMEI नंबर और रजिस्ट्रेशन लॉग जैसी जानकारी मांगी गई थी।
राम मंदिर चंदे से जुड़ी रिपोर्टिंग के बाद पत्रकार पर रोड रेज का आरोप
अभिषेक उपाध्याय एक खोजी पत्रकार हैं, जिन्होंने श्री राम जन्मभूमि मंदिर में कथित चंदे के दुरुपयोग से जुड़ी रिपोर्टिंग की थी।
उन पर आरोप है कि उन्होंने गाजियाबाद में शिप्रा मॉल के पास अपनी कार से एक मोटरसाइकिल सवार को टक्कर मारी, शिकायतकर्ता को धमकाया और जातिसूचक टिप्पणी की। उपाध्याय ने इन आरोपों से इनकार किया है। उनका दावा है कि उनकी रिपोर्टिंग के प्रतिशोध में घटना को अंजाम दिया गया।
इस मामले में इंदिरापुरम पुलिस स्टेशन, गाजियाबाद में FIR दर्ज की गई थी। उपाध्याय ने FIR को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
25 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अंतरिम राहत देते हुए उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई से संरक्षण दिया था और उन्हें FIR की प्रति उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था, ताकि वह उचित कानूनी उपाय अपना सकें।
X को नोटिस जारी करने के पीछे पुलिस ने क्या कारण बताया?
सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्पष्टीकरण मांगे जाने के बाद गाजियाबाद के पुलिस आयुक्त ने बताया था कि 'X' को नोटिस पत्रकार का पता लगाने, गिरफ्तारी में मदद लेने और जांच आगे बढ़ाने के उद्देश्य से जारी किया गया था।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि यह स्पष्टीकरण नोटिस में मांगी गई जानकारी से कुछ हद तक विरोधाभासी है। कोर्ट ने कहा कि घटना से पहले की कोई गोपनीय या निजी जानकारी प्राप्त नहीं की जा सकती और FIR के बाद की जानकारी भी वैकल्पिक उपाय अपर्याप्त होने पर ही मांगी जा सकती है।
पत्रकार की कार दो दिन के भीतर छोड़ने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस द्वारा 'X' को जारी नोटिस रद्द करते हुए निर्देश दिया कि उसके तहत या अन्यथा प्राप्त किसी भी जानकारी का इस्तेमाल अभिषेक उपाध्याय के खिलाफ नहीं किया जाएगा।
खंडपीठ ने उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई से अंतरिम संरक्षण को भी जारी रखा, बशर्ते वह जांच में सहयोग करें। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह सक्षम हाईकोर्ट में FIR को चुनौती दे सकते हैं और सुप्रीम कोर्ट ने FIR में लगाए गए आरोपों के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है।
चूंकि पत्रकार की कार जब्त की गई थी, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने उसे तत्काल और अधिकतम दो दिनों के भीतर छोड़ने का निर्देश दिया।
निजी और डिजिटल डेटा जुटाने के लिए दिशा-निर्देशों पर भी टिप्पणी
जांच के दौरान निजी और डिजिटल डेटा जुटाने को लेकर व्यापक दिशा-निर्देश तय करने के सवाल पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि उचित मामले में ऐसी मांग पर विचार किया जा सकता है। कोर्ट ने इस संबंध में सक्षम न्यायालय का रुख करने की स्वतंत्रता भी दी।
अभिषेक उपाध्याय की ओर से सीनियर एडवोकेट प्रदीप राय और एडवोकेट अनूप कुमार अवस्थी पेश हुए।

