ISRO कर्मचारियों को स्थायी नौकरी न देने पर सुप्रीम कोर्ट नाराज़, कहा—सरकार को आदर्श नियोक्ता बनना चाहिए
Praveen Mishra
1 May 2026 10:16 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने ISRO की इकाई में कार्यरत दैनिक वेतनभोगी “गैंग लेबरर्स” के नियमितीकरण में देरी पर केंद्र सरकार की कड़ी आलोचना की है। कोर्ट ने कहा कि सरकार ने पहले दिए गए न्यायिक निर्देशों का सही तरीके से पालन नहीं किया और 2012 की योजना के जरिए उन्हें कमजोर कर दिया।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए “Gang Labourers (Employment for Sporadic Types of Work) Scheme, 2012” के उन हिस्सों को भी खारिज कर दिया, जो स्थायी नियुक्ति के बजाय केवल अस्थायी रोजगार प्रदान करते थे।
अदालत ने स्पष्ट कहा कि एक बार न्यायिक आदेश अंतिम हो जाए, तो सरकार उसे कमजोर करने के लिए अधूरी योजनाएं नहीं बना सकती। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि राज्य का “मॉडल एम्प्लॉयर” होना संविधान के अनुच्छेद 14 से उत्पन्न दायित्व है, जो निष्पक्षता और समानता की मांग करता है।
कोर्ट ने कहा कि ये श्रमिक 1991 से 1997 के बीच ISRO के लिक्विड प्रोपल्शन सिस्टम्स सेंटर, महेंद्रगिरि में कार्यरत थे और उन्होंने दशकों तक सेवा दी। इसके बावजूद उन्हें स्थायी दर्जा नहीं दिया गया, जो अनुचित है।
खंडपीठ ने कहा कि भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की सफलता में इन कर्मचारियों का भी महत्वपूर्ण योगदान है और उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि इन कर्मचारियों को 9 सितंबर 2010 से प्रभावी रूप से स्थायी दर्जा दिया जाए और चार सप्ताह के भीतर उनकी सेवाओं का नियमितीकरण किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार का यह रवैया यह दिखाता है कि कैसे एक साधारण कर्मचारी को अपने हक के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है, जो न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

