वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने पर रिट याचिका खारिज करते हुए अंतरिम राहत देना अनुचित: सुप्रीम कोर्ट

Praveen Mishra

25 Feb 2026 4:10 PM IST

  • वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने पर रिट याचिका खारिज करते हुए अंतरिम राहत देना अनुचित: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने उस प्रथा की आलोचना की है, जिसमें उच्च न्यायालय वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने के आधार पर रिट याचिका पर विचार करने से इंकार करने के बावजूद अंतरिम स्थगन आदेश (इंटरिम स्टे) दे देते हैं। न्यायालय ने इसे आत्म-विरोधी (self-contradictory) दृष्टिकोण बताते हुए कहा कि यह न्यायिक अनुशासन के उद्देश्य को विफल करता है।

    जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के एक आदेश से उत्पन्न मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। संबंधित मामले में हाईकोर्ट ने वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने के आधार पर रिट याचिका पर सुनवाई से इंकार किया था, लेकिन साथ ही याचिकाकर्ता को वैकल्पिक मंच पर जाने का अवसर देने के लिए विवादित आदेश पर अंतरिम स्थगन भी दे दिया था।

    खंडपीठ ने इस कदम की आलोचना करते हुए कहा कि जब उच्च न्यायालय रिट याचिका पर विचार करने से इंकार कर देता है, तो कार्यवाही वहीं समाप्त हो जाती है और ऐसी स्थिति में चुनौती दिए गए आदेश के संचालन पर रोक लगाना स्वीकार्य नहीं है, भले ही उद्देश्य याचिकाकर्ता को वैकल्पिक मंच तक पहुँचने का समय देना ही क्यों न हो।

    न्यायालय ने कहा कि स्थापित विधि के अनुसार यदि उच्च न्यायालय यह पाता है कि प्रभावी वैकल्पिक उपाय उपलब्ध है और याचिकाकर्ता ने उसका उपयोग नहीं किया है, तो विवेकाधीन अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए याचिका को अस्वीकार कर देने पर कार्यवाही समाप्त हो जाती है। ऐसी स्थिति में अंतिम राहत नहीं दी जा सकती, इसलिए अंतरिम राहत—जैसे आदेश के संचालन पर रोक या यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश—देना भी अस्वीकार्य है।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार का आदेश संविधान पीठ के निर्णय स्टेट ऑफ उड़ीसा बनाम मदन गोपाल रुंगटा (AIR 1952 SC 12) के प्रतिकूल होगा।

    संविधान पीठ के उक्त निर्णय का उल्लेख करते हुए न्यायालय ने उच्च न्यायालयों से अपेक्षा की कि वे इस बाध्यकारी नजीर का संज्ञान लें और भविष्य में ऐसी स्थिति उत्पन्न न होने दें।

    न्यायालय ने कहा, “हमें विश्वास है कि उच्च न्यायालय इन बाध्यकारी निर्णयों का संज्ञान लेंगे और आशा है कि भविष्य में इस प्रकार का कोई मामला हमारे समक्ष विचारार्थ नहीं आएगा।”

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