भाई-भतीजावाद लोकतंत्र के लिए घातक: हरियाणा अधिकारियों को दिए गए डीलक्स फ्लैटों का आवंटन सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया
Praveen Mishra
18 Feb 2026 3:24 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार से जुड़ी एक हाउसिंग सोसाइटी में फ्लैट आवंटन में भाई-भतीजावाद (नेपोटिज़्म) पाए जाने पर आवंटन रद्द कर दिया। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने कहा कि सोसाइटी की गवर्निंग बॉडी के सदस्यों ने अपने पद का दुरुपयोग कर स्वयं और अपने अधीनस्थों को लाभ पहुंचाया, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल सिद्धांतों के विपरीत है। अदालत ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को भी निरस्त कर दिया, जिसमें आवंटन प्रक्रिया में हस्तक्षेप से इनकार किया गया था।
मामला HUDA, अर्बन एस्टेट एवं टाउन एंड कंट्री प्लानिंग एम्प्लॉइज वेलफेयर ऑर्गनाइजेशन (HEWO) की एक योजना से संबंधित था, जिसमें दो सुपर डीलक्स फ्लैट पूर्व सदस्यों की सदस्यता रद्द होने के बाद खाली हुए थे। नियमों के अनुसार इनका आवंटन पारदर्शी लॉटरी प्रक्रिया से होना चाहिए था, लेकिन गवर्निंग बॉडी ने प्राथमिकता के आधार पर आवंटन का निर्णय लिया। एक फ्लैट एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्वयं को आवंटित कर लिया, जबकि कट-ऑफ तिथि पर वह पात्र ही नहीं था; दूसरा फ्लैट उसके अधीनस्थ को दिया गया, जिसकी आवेदन प्रक्रिया अधूरी थी और वह निर्धारित वेतनमान मानदंड भी पूरा नहीं करता था।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि जिस अधिकारी को फ्लैट दिया गया, वह आवेदन की अंतिम तिथि (18 जून 2021) तक न तो HUDA का कर्मचारी था और न ही सोसाइटी की गवर्निंग बॉडी का सदस्य। उसने समय पर आवेदन या अग्रिम राशि भी जमा नहीं की थी, फिर भी उसके पद ग्रहण करने के बाद उसे प्राथमिकता के आधार पर फ्लैट दे दिया गया। अदालत ने इसे “स्पष्ट पक्षपात” और “स्वार्थ सिद्धि” का उदाहरण बताया।
दूसरे फ्लैट के मामले में भी कोर्ट ने पाया कि लाभार्थी कर्मचारी निर्धारित वेतनमान के भीतर नहीं था और उसका आवेदन भी अधूरा था। अदालत ने कहा कि वरिष्ठ अधिकारी की नियुक्ति के बाद उसने न केवल स्वयं को बल्कि अपने अधीनस्थ को भी अनुचित लाभ दिलाया, जिससे पूरी प्रक्रिया “नकली और अपारदर्शी” बन गई।
इन परिस्थितियों में सुप्रीम कोर्ट ने दोनों आवंटन रद्द करते हुए संबंधित अधिकारियों के आचरण को “स्पष्ट पक्षपात का प्रदर्शन” बताया। कोर्ट ने सोसाइटी पर ₹1 लाख, स्वयं को फ्लैट आवंटित कराने वाले अधिकारी पर ₹50,000 और अधीनस्थ लाभार्थी पर ₹25,000 का जुर्माना लगाया। साथ ही, लाभार्थियों को राशि वापसी के बाद फ्लैट खाली करने और सोसाइटी को पात्र आवेदकों के बीच नई लॉटरी प्रक्रिया से पुनः आवंटन करने का निर्देश दिया।

