सुप्रीम कोर्ट ने ग्रेटर नोएडा के 20 साल पुराने हाउसिंग प्रोजेक्ट के समाधान के लिए पूर्व हाईकोर्ट जज की अध्यक्षता में समिति गठित की

Praveen Mishra

8 Nov 2025 12:32 PM IST

  • सुप्रीम कोर्ट ने ग्रेटर नोएडा के 20 साल पुराने हाउसिंग प्रोजेक्ट के समाधान के लिए पूर्व हाईकोर्ट जज की अध्यक्षता में समिति गठित की

    सुप्रीम कोर्ट ने ग्रेटर नोएडा स्थित शिव कला चार्म्स प्रोजेक्ट से जुड़े लंबे समय से लंबित आवासीय विवाद की स्वतंत्र जांच के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस पंकज नकवी (सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता में एक एक-सदस्यीय समिति (One-Member Committee) गठित करने का निर्देश दिया है। यह मामला लगभग दो दशकों से लंबित है और इसमें सैकड़ों ऐसे घर खरीदार शामिल हैं जिन्हें गोल्फ कोर्स सहकारी आवास समिति (GCSAS) और शिव कला डेवलपर्स प्रा. लि. द्वारा विकसित इस प्रोजेक्ट में निवेश के बाद ठगा गया था।

    जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने यह आदेश इलाहाबाद हाईकोर्ट के वर्ष 2016 के फैसले के खिलाफ दायर अपीलों पर सुनवाई के दौरान दिया, जिसमें हाईकोर्ट ने प्रभावित आवंटियों को कोई ठोस राहत देने से इनकार कर दिया था।

    मामले की पृष्ठभूमि:

    यह प्रोजेक्ट वर्ष 2004 में शुरू हुआ था, जब ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण (GNIDA) ने सेक्टर PI-2 में 10,000 वर्ग मीटर जमीन गोल्फ कोर्स सहकारी आवास समिति को ग्रुप हाउसिंग प्रोजेक्ट के लिए आवंटित की थी। इसके बाद समिति ने शिव कला डेवलपर्स प्रा. लि. के साथ साझेदारी की और “शिव कला चार्म्स” नाम से आवासीय परियोजना लॉन्च की।

    कुछ समय बाद आरोप लगे कि समिति पदाधिकारियों और डेवलपर्स ने खरीदारों से जमा की गई राशि का दुरुपयोग (misuse of funds) किया। इस कारण GNIDA ने सितंबर 2011 में लीज़ डीड रद्द कर दी, क्योंकि भुगतान बकाया था। इसके बाद दिल्ली आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने डेवलपर और समिति पदाधिकारियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 409, 420, 467, 468, 472 और 120B के तहत आपराधिक मामला दर्ज किया।

    सुप्रीम कोर्ट की दखलअंदाजी

    2021 से सुप्रीम कोर्ट इस मामले की निगरानी कर रहा है।

    अदालत ने उत्तर प्रदेश के सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार को वास्तविक आवंटियों की पुष्टि करने और GNIDA को प्रोजेक्ट की लीज़ पुनर्स्थापना की संभावना पर विचार करने का निर्देश दिया था। कई घर खरीदारों ने आगे आकर अपने संसाधन मिलाकर निर्माण पूरा करने की इच्छा जताई थी।

    संरचनात्मक ऑडिट रिपोर्टों में पाया गया कि टावर-1 (Tower-1) को सुदृढ़ीकरण के बाद रहने योग्य बनाया जा सकता है। अदालत ने सोचा कि वास्तविक खरीदारों को खुद प्रोजेक्ट पुनर्जीवित करने की अनुमति दी जा सकती है, लेकिन GNIDA के सहयोग की कमी और असली दावेदारों की पहचान में जटिलताओं के कारण अदालत ने माना कि अब स्वतंत्र निगरानी की आवश्यकता है।

    अदालत की टिप्पणियाँ:

    खंडपीठ ने कहा कि घर खरीदार पिछले लगभग 20 वर्षों से संघर्ष कर रहे हैं, और उन्हें डेवलपर्स की धोखाधड़ी तथा प्रशासनिक निष्क्रियता के कारण भारी आर्थिक और मानसिक कष्ट झेलना पड़ा है। बार-बार आदेश देने के बावजूद GNIDA ने प्रोजेक्ट को पुनर्जीवित करने की कोई ठोस योजना नहीं दी।

    अदालत ने स्थिति को “प्रशासनिक गतिरोध (administrative log-jam)” बताते हुए कहा कि लीज़ बहाली, आवंटियों की पहचान, भूमि बकाया की गणना और निर्माण पूर्णता जैसे मुद्दों पर एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और व्यवस्थित जांच की जरूरत है।

    जस्टिस नकवी समिति की जिम्मेदारियाँ

    सुप्रीम कोर्ट ने इसलिए न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) पंकज नकवी की अध्यक्षता में एक-सदस्यीय समिति गठित की है, जो निम्न कार्य करेगी —

    1. परियोजना से संबंधित सभी रिकॉर्ड की जांच कर वास्तविक आवंटियों (genuine allottees) की पहचान करेगी।

    2. ऐसे खरीदारों की सूची तैयार करेगी जो मिलकर शेष टावरों का निर्माण पूरा करना चाहते हैं।

    3. GNIDA से परामर्श कर 2011 में रद्द की गई लीज़ डीड की आंशिक बहाली की संभावना पर विचार करेगी।

    4. सत्यापित आवंटियों के बीच GNIDA के बकाया देयों का उचित बंटवारा तय करेगी।

    5. निर्धारित समय सीमा में प्रोजेक्ट पूरा करने की विस्तृत योजना तैयार करेगी।

    6. यदि आवश्यक हो, तो टावर-3 और टावर-4 के अवांछित या अप्रमाणित फ्लैटों की नीलामी का विकल्प तलाशेगी ताकि निर्माण और भूमि लागत की वसूली की जा सके।

    समिति को अपना काम शुरू करने के चार महीने के भीतर सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट पेश करनी होगी। यह समिति नई दिल्ली या नोएडा में काम करेगी और उत्तर प्रदेश सरकार व GNIDA उसे सभी आवश्यक सहयोग और संसाधन उपलब्ध कराएंगे।

    समिति के खर्च का बोझ आवंटियों और राज्य सरकार के बीच समान रूप से बांटा जाएगा।

    जस्टिस नकवी को ₹15 लाख का मानदेय (honorarium) दिया जाएगा, जिसे तीन किस्तों में भुगतान किया जाएगा।

    आगे की प्रक्रिया

    सुप्रीम कोर्ट ने GNIDA और उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि वे अंग्रेज़ी और हिंदी अखबारों में सार्वजनिक नोटिस जारी करें ताकि वे सभी आवंटी — विशेष रूप से वे जो अभी तक अदालत नहीं पहुंचे हैं — इस समिति और उसके उद्देश्य की जानकारी प्राप्त कर सकें।

    अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 24 मार्च 2026 को तय की है, जब समिति की रिपोर्ट पर विचार किया जाएगा और परियोजना पुनर्स्थापन व प्रभावित खरीदारों के पुनर्वास पर आगे के निर्देश जारी किए जाएंगे।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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