सार्वजनिक जगह पर किसी व्यक्ति की निजता की उचित अपेक्षा क्या है? विरोध स्थलों पर Facial Recognition Surveillance को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस

  • सार्वजनिक जगह पर किसी व्यक्ति की निजता की उचित अपेक्षा क्या है? विरोध स्थलों पर Facial Recognition Surveillance को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस

    सुप्रीम कोर्ट ने 3 नवंबर को निर्धारित विरोध प्रदर्शन स्थलों पर Facial Recognition Technology (FRT) और अन्य निगरानी उपकरणों के इस्तेमाल को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया।

    चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की खंडपीठ Software Freedom Law Centre (SFLC) की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में आरोप लगाया गया कि विरोध प्रदर्शन स्थलों पर चेहरे की पहचान और निगरानी तकनीक का इस्तेमाल प्रदर्शनकारियों के निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है।

    सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने निजता के अधिकार से जुड़े एक महत्वपूर्ण सवाल पर विचार किया। उन्होंने पूछा कि जब कोई व्यक्ति सार्वजनिक स्थान पर मौजूद होता है, तो उसकी निजता की उचित अपेक्षा (Reasonable Expectation of Privacy) क्या होगी?

    याचिकाकर्ता की ओर से पेश एडवोकेट प्रशांत भूषण ने दलील दी कि अधिकारियों को यह बताना चाहिए कि किस तरह की निगरानी की जा रही है और इसके लिए कौन-सा कानूनी ढांचा लागू है।

    'सार्वजनिक स्थान पर निजता का अधिकार कैसा?'

    केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि विरोध प्रदर्शन स्थलों पर CCTV कैमरे किसी अप्रिय घटना को रोकने और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए लगाए गए हैं।

    उन्होंने सवाल किया कि यदि याचिकाकर्ता की दलील स्वीकार की जाती है, तो क्या महिलाओं की सुरक्षा के लिए लगाए गए CCTV कैमरों को भी हटाना पड़ेगा?

    इस पर जस्टिस बागची ने इस तर्क को 'बेहद सरल' बताते हुए कहा कि किसी चेहरे की पहचान को किसी व्यक्ति से जोड़ना और निगरानी के दौरान एकत्र किए गए डेटा का आगे इस्तेमाल करना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।

    जस्टिस बागची ने पहचानकर्ता अधिनियम (Identification of Prisoners Act) में किए गए संशोधन का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस विधायी बदलाव के तहत राज्य को अपराध का पता लगाने के लिए आईरिस पहचान (Iris Identification) का इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई है।

    इस पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि प्रदर्शनकारी कैदी नहीं हैं और सवाल किया कि जब 500-600 सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर खुद विरोध प्रदर्शनों की लाइव रिकॉर्डिंग कर रहे हैं, तो सरकारी CCTV निगरानी पर आपत्ति क्यों है?

    'सार्वजनिक स्थान पर खड़े होने से निजता की अपेक्षा खत्म हो जाती है?'

    सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने सवाल किया कि क्या किसी व्यक्ति के सार्वजनिक स्थान पर मौजूद होने मात्र से उसकी निजता की उचित अपेक्षा कम हो जाती है?

    उन्होंने पूछा, "यह उचित निजता की अपेक्षा का सवाल है। जब मैं किसी सार्वजनिक स्थान पर खड़ा हूं, तो मेरी निजता की उचित अपेक्षा क्या होगी?”

    जस्टिस बागची ने यह भी सवाल उठाया कि क्या अधिकारियों द्वारा निगरानी के फुटेज उपलब्ध होना और डेटा एकत्र करना अपने आप में राज्य के वैध हित (Legitimate State Interest) को साबित करने के लिए पर्याप्त है?

    इसके जवाब में सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि राज्य का वैध हित निजता के अधिकार के अपवाद के रूप में काम करता है।

    याचिका में दिल्ली पुलिस की AI आधारित निगरानी प्रणाली पर सवाल

    याचिका में आरोप लगाया गया है कि दिल्ली पुलिस और अन्य अधिकारियों ने 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन में शामिल होने वाले या उसमें शामिल होने की योजना बना रहे लोगों की पहचान करने और उनकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए व्यापक निगरानी तंत्र तैनात किया था।

    याचिकाकर्ता ने निगरानी कार्यक्रमों से संबंधित रिकॉर्ड, उनके संचालन के कानूनी आधार और व्यक्तिगत डेटा के दुरुपयोग को रोकने के लिए मौजूद सुरक्षा उपायों का खुलासा करने की मांग की है।

    इसके अलावा, नागरिकों की व्यक्तिगत जानकारी के संग्रह, प्रसंस्करण और प्रसार को नियंत्रित करने के लिए बाध्यकारी दिशा-निर्देश बनाने की भी मांग की गई है।

    याचिका में दिल्ली पुलिस की DP-Drishti और Ikshana निगरानी वैन का भी उल्लेख किया गया है। आरोप है कि इन वैन में AI आधारित Facial Recognition Technology का इस्तेमाल करके लाइव CCTV फुटेज को स्कैन किया जाता है।

    Facial Recognition Technology की सटीकता पर भी उठाए सवाल

    याचिकाकर्ता ने जुलाई 2026 में जंतर-मंतर पर हुए पिछले विरोध प्रदर्शनों के दौरान इस्तेमाल की गई Facial Recognition Technology की सटीकता को लेकर The Indian Express की एक जांच रिपोर्ट का भी हवाला दिया है।

    याचिका के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने Facial Recognition System के माध्यम से 2,873 लोगों की पहचान करने का दावा किया था।

    रिपोर्ट में कथित तौर पर गंभीर आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे 205 लोगों की जांच की गई, जिनमें हत्या, हत्या के प्रयास और दुष्कर्म जैसे अपराधों के आरोपी शामिल थे। इनमें से 25 लोग ऐसे पाए गए, जो उस समय पहले से ही जेल में बंद थे, जबकि सिस्टम ने कथित तौर पर उन्हें प्रदर्शन स्थल पर मौजूद बताया था।

    याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि प्रदर्शन के आयोजकों और कार्यकर्ताओं के आवासीय पते, मोबाइल नंबर और सोशल मीडिया अकाउंट जैसी व्यक्तिगत जानकारियां एकत्र कर पुलिस टीमों के साथ साझा की गईं।

    इसके अलावा, सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों को आयोजकों के घरों, होटलों और गेस्ट हाउस के बाहर तैनात किए जाने का भी आरोप लगाया गया है, ताकि उनकी गतिविधियों पर नजर रखी जा सके और उन्हें प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने से रोका जा सके।

    PUCL फैसले का भी दिया हवाला

    याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के People's Union for Civil Liberties v. Union of India (1997) फैसले का भी हवाला दिया है, जिसमें फोन टैपिंग के संबंध में सुरक्षा उपाय निर्धारित किए गए थे।

    याचिका में तर्क दिया गया है कि डिजिटल युग में निगरानी तकनीकों के बढ़ते इस्तेमाल को देखते हुए निजता के मौलिक अधिकार की सुरक्षा के लिए एक व्यापक संवैधानिक ढांचा जरूरी है।

    गौरतलब है कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट राज्यसभा सांसद एए रहीम की ओर से दाखिल इसी तरह की याचिका पर भी केंद्र सरकार से जवाब मांग चुका है।

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    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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