निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस सरकारी कॉलेजों के बराबर नहीं की जा सकती: सुप्रीम कोर्ट

Praveen Mishra

25 Jun 2026 1:15 AM IST

  • निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस सरकारी कॉलेजों के बराबर नहीं की जा सकती: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के एक अभ्यर्थी की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस को सरकारी मेडिकल कॉलेजों के बराबर निर्धारित करने की मांग की गई थी।

    जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि स्व-वित्तपोषित (Self-Financing) संस्थानों को सरकारी कॉलेजों जैसी फीस संरचना अपनाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

    याचिकाकर्ता, राजस्थान का एक EWS श्रेणी का NEET-UG 2025 अभ्यर्थी, निजी मेडिकल कॉलेजों की 18.9 लाख से 25 लाख रुपये वार्षिक फीस वहन करने में असमर्थ होने के कारण वहां प्रवेश नहीं ले सका। उसने तर्क दिया कि जब EWS आय सीमा 8 लाख रुपये सालाना है, तब इतनी ऊंची फीस मनमानी है।

    इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “जिनके पास संसाधन हैं, वे फीस देंगे। कोई एक व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि निजी संस्थानों की फीस अधिक है, इसलिए उसे सरकारी कॉलेजों के बराबर कर दिया जाए।” अदालत ने यह भी कहा कि फीस वहन न कर पाने वाले छात्र छात्रवृत्ति, सबवेंशन या सरकारी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश का विकल्प चुन सकते हैं।

    याचिकाकर्ता ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) के 2022 के एक कार्यालय ज्ञापन का हवाला दिया, जिसमें निजी मेडिकल कॉलेजों की 50 प्रतिशत सीटों की फीस सरकारी कॉलेजों के समान रखने की सिफारिश की गई थी। हालांकि, अदालत ने संकेत दिया कि राजस्थान सरकार ने इस ज्ञापन को अपनाया नहीं है।

    सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि यदि निजी और सरकारी मेडिकल कॉलेजों की फीस में समानता लागू कर दी जाए तो निजी मेडिकल कॉलेजों का संचालन प्रभावित हो सकता है। अदालत ने टिप्पणी की कि देश को अधिक डॉक्टरों की आवश्यकता है और निजी संस्थान चिकित्सा शिक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

    Praveen Mishra

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    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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