22 साल जेल में रहा निर्दोष, न्याय व्यवस्था की सामूहिक विफलता पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
Praveen Mishra
5 Aug 2026 4:36 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने एक हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति को बरी करते हुए कहा कि यह मामला आपराधिक न्याय प्रणाली की सामूहिक विफलता का उदाहरण है। अदालत ने कहा कि केवल संदेह के आधार पर व्यक्ति को हिरासत में लिया गया, उससे थर्ड डिग्री यातना देकर स्वीकारोक्ति कराई गई, ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया और हाईकोर्ट भी "मूकदर्शक" बना रहा। इन सबके कारण एक व्यक्ति ने 22 वर्ष जेल में बिताए, जबकि उसके खिलाफ विश्वसनीय साक्ष्य नहीं थे।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने उड़ीसा हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि तीन महिलाओं की हत्या हुई, लेकिन केवल संदेह के आधार पर गिरफ्तार व्यक्ति से अवैध तरीके से स्वीकारोक्ति ली गई और कमजोर साक्ष्यों के आधार पर उसे दोषी ठहरा दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि उड़ीसा हाईकोर्ट ने 3157 दिनों की देरी के आधार पर जेल अपील खारिज कर दी, जबकि उस समय तक आरोपी 12 वर्ष जेल में रह चुका था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में संवैधानिक अदालतों को देरी माफ करने के प्रति उदार ही नहीं, बल्कि सक्रिय (pro-active) दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, क्योंकि यह व्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा प्रश्न है।
मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए अदालत ने पाया कि दोषसिद्धि केवल एक प्रत्यक्षदर्शी के बयान पर आधारित थी, जिसका बयान कई विरोधाभासों और असंगतियों से भरा था तथा अन्य साक्ष्यों से उसका समर्थन नहीं होता था। अदालत ने कहा कि ऐसे अविश्वसनीय साक्ष्य के आधार पर दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को बरी करते हुए ओडिशा के कोरापुट जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) को उसके पुनर्वास की दिशा में आवश्यक कदम उठाने का निर्देश दिया।


