कंपनी के खिलाफ आपराधिक मामला सिर्फ इसलिए रद्द नहीं होगा कि किसी निदेशक या कर्मचारी को आरोपी नहीं बनाया गया: सुप्रीम कोर्ट

  • कंपनी के खिलाफ आपराधिक मामला सिर्फ इसलिए रद्द नहीं होगा कि किसी निदेशक या कर्मचारी को आरोपी नहीं बनाया गया: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कंपनियों की आपराधिक जिम्मेदारी को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि किसी कंपनी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को सिर्फ इस आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता कि कंपनी की ओर से काम करने वाले किसी निदेशक, अधिकारी या कर्मचारी को अलग से आरोपी नहीं बनाया गया है।

    जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की खंडपीठ ने यह फैसला एक दवा कंपनी की याचिका पर सुनाया। कंपनी के खिलाफ भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) के लिए दवाओं की खरीद में कथित अनियमितताओं को लेकर भ्रष्टाचार और आपराधिक साजिश का मामला दर्ज था।

    कंपनी की क्या दलील थी?

    कंपनी ने कहा कि जिन अपराधों में आपराधिक मंशा (Mens Rea) साबित करना जरूरी है, उनमें उस व्यक्ति की पहचान और उसे आरोपी बनाया जाना आवश्यक है, जिसने कंपनी की ओर से कथित अपराध किया।

    लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

    कोर्ट ने तय किया तीन चरणों की व्यवस्था

    किसी व्यक्ति की आपराधिक मंशा को कंपनी से जोड़ने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने तीन चरण तय किए—

    पहला चरण: कंपनी के ज्ञापन और अंतर्नियमों से यह देखा जाएगा कि संबंधित कार्य करने की शक्ति किसके पास थी।

    दूसरा चरण: यदि दस्तावेजों से स्थिति स्पष्ट न हो, तो यह देखा जाएगा कि संबंधित व्यक्ति को वह शक्ति प्रत्यायोजन या अभिकरण के माध्यम से दी गई थी या नहीं।

    तीसरा चरण: यदि पहले दोनों चरणों से भी स्थिति स्पष्ट न हो, तो संबंधित कानून के उद्देश्य को देखते हुए विशेष जिम्मेदारी निर्धारित करने का सिद्धांत लागू किया जा सकता है।

    कोर्ट ने कहा कि ये तीनों चरण क्रमिक और एक-दूसरे के बाद लागू होने वाली प्रक्रिया हैं।

    सिर्फ कर्मचारी को आरोपी न बनाने से कंपनी को राहत नहीं

    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की पहचान न होना या उसे आरोपी न बनाया जाना, अपने-आप में कंपनी के खिलाफ कार्यवाही रद्द करने का आधार नहीं है।

    हालांकि, आरोप-पत्र में प्रथम दृष्टया यह सामने आना चाहिए कि—

    किसी व्यक्ति ने कंपनी की ओर से काम किया;

    उसका काम संबंधित अपराध से जुड़ा था; और

    परिस्थितियों से आपराधिक मंशा की संभावना पूरी तरह असंभव नहीं थी।

    कंपनी की अपील खारिज

    कोर्ट ने पाया कि इस मामले में आरोप-पत्र और उपलब्ध सामग्री से ये शर्तें प्रथम दृष्टया पूरी होती हैं।

    इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कंपनी की अपील खारिज कर दी।

    हालांकि, कंपनी वास्तव में आपराधिक रूप से जिम्मेदार है या नहीं, इसका अंतिम फैसला विचारण के दौरान साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा।

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    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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