विश्वसनीय होने पर बिना स्वतंत्र पुष्टि के भी सहयोगी गवाह की गवाही के आधार पर हो सकती है दोषसिद्धि: सुप्रीम कोर्ट

Praveen Mishra

9 Jun 2026 3:56 PM IST

  • विश्वसनीय होने पर बिना स्वतंत्र पुष्टि के भी सहयोगी गवाह की गवाही के आधार पर हो सकती है दोषसिद्धि: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि किसी सहयोगी गवाह (Approver) की गवाही विश्वसनीय, भरोसेमंद और अपराध से जुड़ी घटनाओं का पूर्ण एवं सत्य विवरण प्रस्तुत करती है, तो केवल इस आधार पर उसे खारिज नहीं किया जा सकता कि उसकी गवाही की स्वतंत्र रूप से पुष्टि (corroboration) नहीं हुई है।

    जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 133 के तहत सहयोगी गवाह की अपुष्ट गवाही भी दोषसिद्धि का आधार बन सकती है। हालांकि, अदालतों द्वारा सावधानी और न्यायिक विवेक के तौर पर आमतौर पर ऐसी गवाही की महत्वपूर्ण तथ्यों पर पुष्टि तलाश की जाती है।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुष्टि की आवश्यकता कानून का अनिवार्य नियम नहीं, बल्कि न्यायिक सावधानी का सिद्धांत है। यदि अदालत यह संतुष्ट हो जाए कि गवाही पूरी तरह विश्वसनीय है, तो वह बिना स्वतंत्र पुष्टि के भी दोषसिद्धि दर्ज कर सकती है।

    मामला वर्ष 1984 के एक दोहरे हत्याकांड से संबंधित था, जिसमें ट्रक लूटने की साजिश के तहत चालक और क्लीनर की हत्या कर दी गई थी। अभियोजन का मामला मुख्य रूप से एक आरोपी की गवाही पर आधारित था, जिसे बाद में माफी देकर सरकारी गवाह बनाया गया था।

    सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि गवाह ने स्वयं को पूरी तरह निर्दोष नहीं बताया था, बल्कि अपराध की घटनाओं में अपनी भूमिका स्वीकार की थी। साथ ही उसकी गवाही की पुष्टि चोरी हुए ट्रक की बरामदगी, फोरेंसिक साक्ष्यों और अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से भी होती थी। इसलिए अदालत ने उसकी गवाही को विश्वसनीय मानते हुए दोषसिद्धि बरकरार रखी।

    हालांकि, यह देखते हुए कि अपीलकर्ता लगभग 18 वर्ष की सजा काट चुका है, सुप्रीम कोर्ट ने उसकी आजीवन कारावास की सजा को पहले से भुगती गई सजा तक सीमित कर दिया और उसकी रिहाई का आदेश दिया।

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