मकान मालिक-किरायेदार के बीच Agreement to Sell से किरायेदारी अपने आप खत्म नहीं होती: सुप्रीम कोर्ट
Praveen Mishra
14 Aug 2026 4:16 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मकान मालिक और किरायेदार के बीच Agreement to Sell होने मात्र से मौजूदा किरायेदारी अपने आप समाप्त नहीं होती। किरायेदारी खत्म हुई या नहीं, यह Agreement to Sell की शर्तों या पक्षकारों के स्पष्ट आचरण से तय होगा।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की खंडपीठ ने कहा कि केवल Agreement to Sell पर हस्ताक्षर हो जाने से किरायेदारी समाप्त नहीं मानी जा सकती।
कोर्ट ने तय किए महत्वपूर्ण सिद्धांत
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि—
केवल Agreement to Sell से मौजूदा किरायेदारी समाप्त नहीं होती।
Agreement की शर्तों या पक्षकारों के स्पष्ट आचरण से यदि किरायेदारी छोड़ने (surrender) का संकेत मिले, तभी इसे समाप्त माना जा सकता है।
Agreement के बाद किरायेदार का लगातार संपत्ति पर कब्जा बने रहना अपने आप में TP Act की धारा 53A के तहत part performance नहीं माना जाएगा।
Agreement to Sell, जब तक वह पंजीकृत conveyance deed नहीं है, अपने आप संपत्ति में कोई टाइटल या हित पैदा नहीं करता।
किराया देना बंद नहीं हुआ था
मामले में किरायेदार ने तर्क दिया था कि Agreement to Sell होने के बाद मकान मालिक-किरायेदार का संबंध समाप्त हो गया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि Agreement में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था जिससे यह पता चले कि इसके बाद कब्जा Agreement के आधार पर था या किराया देने की जिम्मेदारी समाप्त हो गई थी।
कोर्ट ने कहा कि Agreement में न तो किरायेदारी खत्म होने का कोई स्पष्ट प्रावधान था और न ही पक्षकारों के आचरण से ऐसा कोई संकेत मिलता था।
धारा 53A का भी नहीं मिलेगा लाभ
किरायेदार ने यह भी दावा किया कि Agreement के बाद उसका लगातार कब्जा धारा 53A, Transfer of Property Act के तहत part performance के कारण सुरक्षित है।
कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि जो व्यक्ति पहले से किरायेदार के रूप में कब्जे में है, उसका Agreement के बाद भी उसी तरह कब्जे में बने रहना अपने आप Agreement के part performance का सबूत नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने D.S. Parvathamma v. A. Srinivasan के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि किरायेदार को केवल Agreement to Sell के आधार पर यह कहने की अनुमति नहीं दी जा सकती कि उसका कब्जा अब किरायेदार के रूप में नहीं बल्कि संभावित खरीदार के रूप में है।
किरायेदार की अपील खारिज
मामले में कुल ₹1.90 लाख की बिक्री राशि में से ₹40,000 का भुगतान किया गया था, जबकि शेष ₹1.50 लाख तीन महीने में भुगतान किया जाना था। भुगतान नहीं होने पर निचली अदालत ने किरायेदार को संपत्ति खाली करने का आदेश दिया था, जिसे बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि Agreement to Sell और पक्षकारों के आचरण से किरायेदारी समाप्त होने का कोई आधार नहीं मिलता। इसलिए किरायेदार की अपील खारिज करते हुए संपत्ति का कब्जा मकान मालिक को सौंपने का आदेश बरकरार रखा गया।


