4 भारतीय मिशनों में कॉन्सुलर सर्विस को आउटसोर्स करने के लिए MEA का टेंडर रद्द करने का फैसला सही: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

20 July 2026 3:53 PM IST

  • 4 भारतीय मिशनों में कॉन्सुलर सर्विस को आउटसोर्स करने के लिए MEA का टेंडर रद्द करने का फैसला सही: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार की याचिका खारिज की, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने अपने उक्त आदेश के तहत अबू धाबी, कुवैत, सिंगापुर और कैनबरा में भारतीय मिशनों में कॉन्सुलर, पासपोर्ट और वीज़ा (CPV) सेवाओं को आउटसोर्स करने के टेंडर रद्द कर दिए गए थे। हालांकि, कोर्ट ने विदेश मंत्रालय (MEA) और इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड (EIL) को अंतरिम व्यवस्था करने की अनुमति दी ताकि नई टेंडर प्रक्रिया पूरी होने तक सेवाएं बिना किसी रुकावट के जारी रह सकें।

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और निजी पक्षों की ओर से सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल, ए.एम. सिंघवी और श्याम दीवान की दलीलें सुनने के बाद यह आदेश पारित किया।

    सुनवाई के दौरान, सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट ने टेंडर प्रक्रिया रद्द करने में गलती की थी और तर्क दिया कि मूल्यांकन के मानदंड हर बोली लगाने वाले की व्यक्तिगत क्षमता के आधार पर लागू किए गए।

    सरकार के रुख पर सवाल उठाते हुए चीफ जस्टिस ने कहा,

    "लेकिन आपने कारण न बताकर हाई कोर्ट के आदेश को खुद ही आमंत्रित किया।"

    सॉलिसिटर जनरल ने तर्क दिया कि अलग-अलग टेंडरों में मार्किंग सिस्टम की व्याख्या व्यावहारिक तरीके से की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर टेंडर की शर्तों को शब्दशः पढ़ा जाए तो बोलियों की जांच के क्रम के आधार पर मनमाने नतीजे निकल सकते हैं।

    हालांकि, जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि हाईकोर्ट ने ठीक यही चिंता जताई।

    जस्टिस बागची ने कहा,

    "हाईकोर्ट का कहना है कि बोलियों के मूल्यांकन को नियंत्रित करने वाली शर्तें स्पष्ट रूप से नहीं बताई गईं और उनसे ऐसी स्थिति पैदा हुई, जिस पर काम करना मुश्किल था। अगर ऐसा है तो इस कोर्ट द्वारा तय कानून के अनुसार, टेंडर प्रक्रिया शुरू होने के बाद आप टेंडर डॉक्यूमेंट की शर्तों को नहीं बदल सकते।"

    सॉलिसिटर जनरल ने आगे कहा कि टेंडर प्रक्रिया के मूल रिकॉर्ड सीलबंद लिफाफे में हाईकोर्ट के सामने पेश किए गए, लेकिन कथित तौर पर उनकी जांच नहीं की गई। उन्होंने कहा कि सरकार अभी भी उन रिकॉर्ड्स को कोर्ट के सामने पेश करने को तैयार है।

    बेंच ने यह भी पूछा कि सबसे कम (L-1) बोली स्वीकार किए जाने के बाद अभी कौन सेवाएं दे रहा है, जिस पर मेहता ने जवाब दिया कि मौजूदा सफल बोलीदाताओं को पहले ही काम सौंप दिया गया। सुनवाई के आखिर में सॉलिसिटर जनरल ने टेंडर के मूल्यांकन के समर्थन में अतिरिक्त कारणों के साथ फिर से हाईकोर्ट जाने की इजाज़त मांगी।

    हालांकि, कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फ़ैसले में दखल देने से इनकार कर दिया और स्पेशल लीव पिटिशन को खारिज किया।

    विदेशों में भारतीय मिशनों में पासपोर्ट और वीज़ा सेवाओं में रुकावट से बचने की ज़रूरत को समझते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के निर्देशों में बदलाव किया ताकि नए टेंडर की प्रक्रिया पूरी होने तक अस्थायी इंतज़ाम किए जा सकें।

    कोर्ट ने निर्देश दिया कि EIL और MEA मौजूदा L-1 कॉन्ट्रैक्टरों को काम पर रख सकते हैं, अगर उनका काम संतोषजनक रहा हो, या अंतरिम अवधि के लिए किसी अन्य एजेंसी को नियुक्त कर सकते हैं जिसे उचित समझा जाए। कोर्ट ने साफ़ किया कि ऐसा इंतज़ाम पूरी तरह से अस्थायी होगा, इससे किसी भी पक्ष के पक्ष में कोई विशेष अधिकार नहीं बनेगा, और यह नए 'रिक्वेस्ट फॉर प्रपोज़ल' (RFP) प्रोसेस के नतीजे पर निर्भर करेगा।

    बेंच ने विदेश मंत्रालय को यह भी निर्देश दिया कि वह नए टेंडर की प्रक्रिया को जल्द-से-जल्द, हो सके तो तीन महीने के भीतर पूरा करे। साथ ही दिल्ली हाईकोर्ट के पहले के निर्देशों का पालन भी सुनिश्चित करे। कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि अंतरिम इंतज़ाम सभी पक्षों के अधिकारों और दावों पर कोई असर नहीं डालेगा।

    Case : UNION OF INDIA AND ANR v. E TRAV TECH LIMITED AND ANR.| SLP(C) No. 24271-24277/2026

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