मान्यता खोने के बाद दूसरे प्राइवेट कॉलेजों में ट्रांसफर हुए स्टूडेंट सरकारी फीस का दावा नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
15 May 2026 10:53 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि ओडिशा के बंद हो चुके सरदार राजास मेडिकल कॉलेज और अस्पताल (SRMCH) से दूसरे प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में ट्रांसफर हुए स्टूडेंट, जिनकी मूल संस्था की मान्यता खत्म हो गई, सिर्फ़ रियायती सरकारी मेडिकल कॉलेज फीस देकर "अचानक मिलने वाले फ़ायदे" (Windfall) का दावा नहीं कर सकते। कोर्ट ने SRMCH में लागू फीस दरों पर उनसे बकाया फीस वसूलने की अनुमति दी।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने निर्देश दिया कि SRMCH का प्रबंधन करने वाले सेल्वम एजुकेशनल एंड चैरिटेबल ट्रस्ट से मिली लगभग ₹14 करोड़ की राशि उन तीन प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों को जारी की जाए, जिन्होंने ट्रांसफर हुए स्टूडेंट्स को दाखिला दिया था। इसमें मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया/नेशनल मेडिकल कमीशन को दी गई ₹10 करोड़ की बैंक गारंटी और सुप्रीम कोर्ट में जमा की गई ₹2 करोड़ की राशि, साथ ही उस पर मिला ब्याज शामिल है।
यह मामला SRMCH की मान्यता रद्द होने के बाद सामने आया। मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया के निरीक्षण में पाया गया कि कॉलेज के इंफ्रास्ट्रक्चर, फैकल्टी और नियमों के पालन में गंभीर कमियां थीं, जिससे 2013-14 और 2014-15 बैच में दाखिला लेने वाले MBBS स्टूडेंट्स का शैक्षणिक भविष्य खतरे में पड़ गया था। स्टूडेंट्स का एक शैक्षणिक वर्ष बर्बाद होने से बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पहले एक राज्य-निगरानी वाली काउंसलिंग प्रक्रिया के ज़रिए ओडिशा के कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज, IMS & SUM हॉस्पिटल और हाई-टेक मेडिकल कॉलेज में उनके ट्रांसफर की सुविधा दी थी।
कुल 124 स्टूडेंट प्रभावित हुए, जिनमें से 122 स्टूडेंट्स को आखिरकार इन तीन ट्रांसफर कॉलेजों में भेज दिया गया। इन संस्थानों ने बाद में कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और दावा किया कि उन्होंने छात्रों को कई सालों तक शिक्षा और वजीफ़ा दिया, जबकि उन्हें कोर्ट के अंतरिम आदेशों के तहत सिर्फ़ नाममात्र की सरकारी दर वाली फीस मिली, जो कि असल प्राइवेट कॉलेज फीस संरचना से कहीं कम थी।
सरकारी कॉलेज की फीस दर पर फीस देना "अनुचित लाभ" (Unjust Enrichment) माना जाएगा
स्टूडेंट्स को इस रियायती व्यवस्था का लाभ अनिश्चित काल तक मिलता रहना चाहिए, इस तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि ऐसा नतीजा "अनुचित लाभ" माना जाएगा।
कोर्ट ने फैसला सुनाया कि हालांकि स्टूडेंट्स को मुश्किल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा और इसमें उनकी कोई गलती नहीं थी, फिर भी वे हमेशा के लिए सरकारी दर वाली फीस का लाभ नहीं लेते रह सकते।
कोर्ट के अनुसार, स्टूडेंट्स ने मूल रूप से एक ऐसे प्राइवेट मेडिकल संस्थान में दाखिला लिया था, जिसकी फीस संरचना काफी ज़्यादा थी। इसलिए वे सरकारी कॉलेज की फीस के लाभ के हकदार नहीं हैं, क्योंकि ऐसा करना अनुचित लाभ (unjust enrichment) के बराबर होगा।
अदालत ने टिप्पणी की,
“हमारी राय में यह इन स्थानांतरित स्टूडेंट्स के लिए अनुचित लाभ के बराबर होगा, भले ही हम इस तथ्य से अवगत हैं कि उन्हें सत्र के बीच में ही अलग-अलग मेडिकल कॉलेजों में स्थानांतरित होने जैसी अराजक स्थिति का सामना करना पड़ा।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि स्टूडेंट्स को फीस का भुगतान उन दरों पर करना होगा, जो उनके मूल संस्थान, SRMCH पर लागू थीं, न कि उन काफी ऊंची दरों पर जो स्थानांतरित कॉलेजों द्वारा ली जाती हैं।
पीठ ने गौर किया कि स्टूडेंट्स ने मूल रूप से एक निजी मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया था, जिसकी फीस संरचना ऊंची थी और वे केवल अंतरिम न्यायिक व्यवस्थाओं के आधार पर सरकारी मेडिकल कॉलेज की फीस के लाभ का वैध रूप से दावा नहीं कर सकते।
अदालत ने कहा,
“साथ ही,” “गलती करने वाले संस्थान को अपनी ही गलतियों का लाभ उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”
अदालत ने कानूनी सिद्धांत 'commodum ex injuria sua nemo habere debet' (किसी को भी अपनी गलती से लाभ नहीं उठाना चाहिए) का हवाला देते हुए यह फैसला सुनाया कि इस स्थिति से उत्पन्न होने वाला प्राथमिक वित्तीय बोझ सेल्वम ट्रस्ट को ही उठाना होगा।
अदालत ने पाया कि SRMCH मेडिकल शिक्षा के लिए अनिवार्य मानकों को बनाए रखने में विफल रहा था। यह भी गौर किया कि ट्रस्ट पहले दिए गए निर्देशों के बावजूद स्टूडेंट्स से ली गई अतिरिक्त फीस वापस करने में भी विफल रहा था।
भुगतान के मुद्दे पर अदालत ने दर्ज किया कि तीनों स्थानांतरित कॉलेज अपने स्वयं की ऊंची दरों के बजाय SRMCH में प्रचलित फीस संरचना के आधार पर गणना की गई प्रतिपूर्ति (Reimbursement) स्वीकार करने को तैयार थे। उस आधार पर भी कुल बकाया राशि लगभग ₹16.2 करोड़ बनती थी, और ₹14 करोड़ जारी किए जाने के बावजूद अभी भी कुछ कमी (Shortfall) बनी हुई थी।
तदनुसार, अदालत ने कॉलेजों को अनुमति दी कि वे व्यक्तिगत स्टूडेंट्स से वसूल की जाने वाली बकाया राशि के विवरण के साथ राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) से संपर्क करें। अदालत ने NMC को निर्देश दिया कि वह उन राशियों को हिसाब में लेने के बाद, जो स्टूडेंट्स ने SRMCH में दाखिले के समय पहले ही चुका दी थीं, शेष बकाया राशि की वसूली के लिए उचित समाधान प्रदान करे।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जो स्टूडेंट इस फैसले के तहत निर्धारित फीस संबंधी दायित्वों का पालन करेंगे, वे बिना किसी देरी के अपने शैक्षणिक प्रमाण पत्र और पाठ्यक्रम-पूर्णता के दस्तावेज प्राप्त करने के हकदार होंगे।
तदनुसार, इन अपीलों का निपटारा किया गया।
Cause Title: SOUMYA RANJAN PANDA & ORS. VERSUS SUBHALAXMI DASH & ORS.

