राज्य को औपचारिक रूप से पक्षकार बनाए बिना उस पर कोई वित्तीय जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती: सुप्रीम कोर्ट

  • राज्य को औपचारिक रूप से पक्षकार बनाए बिना उस पर कोई वित्तीय जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य को औपचारिक रूप से पक्षकार बनाए बिना उस पर कोई वित्तीय जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती।

    जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने कहा,

    "अगर सरकारी खजाने से कोई राहत मांगी जा रही है तो संविधान के अनुच्छेद 300 के तहत राज्य को एक कानूनी इकाई (Juristic Entity) के रूप में पक्षकार बनाए बिना केवल किसी अधिकारी या विभाग को शामिल करने से याचिका में बुनियादी कमी आ जाती है।"

    बेंच ने बॉम्बे हाईकोर्ट का वह फैसला रद्द किया, जिसमें राज्य सरकार को पक्षकार बनाए बिना ही, एक 'बिना सरकारी अनुदान' (no grant-in-aid) वाले कॉलेज के लेक्चरर को किसी अन्य कॉलेज में समायोजित (Absorb) करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार पर डाल दी गई।

    प्रतिवादी नंबर 1 को 1990-91 के शैक्षणिक सत्र के दौरान एक सोसाइटी द्वारा चलाए जा रहे कॉलेज में कॉमर्स लेक्चरर के रूप में नियुक्त किया गया। यह कॉलेज पूरी तरह से "बिना सरकारी अनुदान" (no grant-in-aid) के आधार पर चलता था। पहले भी नौकरी से निकाले जाने और फिर बहाल होने की घटनाओं के बाद प्रतिवादी नंबर 1 को सस्पेंड कर दिया गया और उसके खिलाफ विभागीय जांच शुरू की गई। यूनिवर्सिटी से अनुमति लेने के बाद कॉलेज प्रबंधन ने 17 अगस्त 1999 को उसकी सेवाएं समाप्त कीं। छात्रों की कमी के कारण यूनिवर्सिटी ने कॉलेज को 1999-2000 के शैक्षणिक सत्र से अपना कॉमर्स विभाग बंद करने की भी अनुमति दे दी थी।

    प्रतिवादी नंबर 1 ने अपनी बर्खास्तगी को 'यूनिवर्सिटी एंड कॉलेज ट्रिब्यूनल' में चुनौती दी, जिसने अप्रैल 2000 में उसकी अपील खारिज की। बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी का फैसला रद्द किया और उच्च शिक्षा के संयुक्त निदेशक (Joint Director of Higher Education) को निर्देश दिया कि वे उसे अतिरिक्त (Surplus) लेक्चररों की सूची में शामिल करें और किसी दूसरे कॉलेज में समायोजित (Absorb) करें। हाई कोर्ट ने प्रबंधन को यह भी निर्देश दिया कि वे उसे बकाया राशि के बदले मुआवजे के तौर पर 10 लाख रुपये का भुगतान करें।

    महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इस समायोजन (Absorption) के निर्देश को चुनौती दी। सरकार का तर्क है कि उसे कानूनी कार्यवाही में पक्षकार बनाए बिना, इस तरह का समायोजन आदेश नहीं दिया जा सकता। सरकार के तर्क में दम पाते हुए जस्टिस दत्ता द्वारा लिखे गए फैसले में 'समावेशन' (Absorption) के निर्देश को रद्द कर दिया गया। अदालत ने कहा कि जब किसी राहत के कारण सरकार पर सीधा वित्तीय और प्रशासनिक बोझ पड़ता है, तो कोई अधिकारी 'राज्य' (सरकार) की जगह नहीं ले सकता।

    अदालत ने कहा,

    “'संयुक्त निदेशक' (Joint Director) को बाद में मामले में शामिल करने से, 'महाराष्ट्र राज्य' को पक्ष न बनाने की मूल कमी दूर नहीं हो जाती। संप्रभु या वित्तीय जिम्मेदारी तय करने के मामले में, राज्य के किसी अधिकारी या विभाग को खुद 'राज्य' के बराबर नहीं माना जा सकता। इसलिए हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता को आवश्यक पक्ष (Necessary Party) के रूप में औपचारिक रूप से शामिल किए बिना उस पर समावेशन की जिम्मेदारी डालकर गंभीर गलती की।”

    फिर भी अदालत ने गौर किया कि प्रतिवादी संख्या 1 (Respondent No.1) 1999 से ही बिना रोजगार के था और कानूनी कार्यवाही के दौरान ही 30 नवंबर, 2025 को रिटायर (Superannuation) हो गया। अदालत ने माना कि उसे बिना किसी सहारे के छोड़ देना "न्याय का उपहास" (Travesty of Justice) होगा, इसलिए राहत तय करने के लिए अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल किया गया।

    राज्य को निर्देश दिया गया कि वह उसे आठ सप्ताह के भीतर अतिरिक्त 10 लाख रुपये का भुगतान करे, जो उसके सभी दावों का पूर्ण और अंतिम निपटारा (Full and Final Settlement) होगा। कॉलेज प्रबंधन द्वारा पहले ही दिए जा चुके 10 लाख रुपये की राशि पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि यह निर्देश इस मामले के विशेष तथ्यों पर आधारित है और इसे भविष्य के लिए नजीर (Precedent) नहीं माना जाएगा।

    Case Title : STATE OF MAHARASHTRA VS. SUDHIR S/O MOTIRAMJI HIWARKAR & ORS.

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