Shiv Sena Row | स्पीकर का अयोग्य न ठहराने का फ़ैसला गलत निकलता है तो ECI के चुनाव-चिह्न आवंटन पर फिर से विचार करना पड़ सकता है: सुप्रीम कोर्ट

  • Shiv Sena Row | स्पीकर का अयोग्य न ठहराने का फ़ैसला गलत निकलता है तो ECI के चुनाव-चिह्न आवंटन पर फिर से विचार करना पड़ सकता है: सुप्रीम कोर्ट

    शिवसेना मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कल इस बात पर विचार किया कि क्या चुनाव आयोग (ECI) के उस फ़ैसले पर फिर से विचार करना होगा, जिसमें उसने एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना माना और पार्टी का आरक्षित चुनाव चिह्न उन्हें दिया। यह विचार तब करना पड़ सकता है अगर कोर्ट यह पाए कि महाराष्ट्र के स्पीकर ने उस गुट के विधायकों के खिलाफ अयोग्यता याचिकाओं को गलत तरीके से खारिज कर दिया था।

    जस्टिस जॉयमालिया बागची ने पूछा,

    "मान लीजिए कि इस कोर्ट द्वारा अयोग्यता का फ़ैसला पलट दिया जाता है। तो चुनाव चिह्न वाले आदेश पर इसका क्या असर होगा? अगर फ़ैसला गलत पाया जाता है तो क्या इसका मतलब यह नहीं होगा कि चुनाव आयोग ने किसी ऐसे व्यक्ति को चुनाव चिह्न आवंटित कर दिया, जिसे कानून का सही ढंग से पालन होने पर अयोग्य ठहराया जाना चाहिए?"

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमालिया बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच उद्धव ठाकरे द्वारा चुनाव आयोग के उस फ़ैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें आयोग ने एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना माना था और उन्हें 'धनुष-बाण' चिह्न का इस्तेमाल करने की अनुमति दी थी।

    स्पीकर ने जनवरी 2024 में दोनों गुटों द्वारा विरोधी गुट के सदस्यों के खिलाफ दायर अयोग्यता याचिकाओं को खारिज कर दिया था।

    जस्टिस बागची ने यह काल्पनिक सवाल तब उठाया जब शिंदे गुट की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट नीरज किशन कौल अपनी दलीलें रख रहे थे।

    कौल, चुनाव चिह्न आदेश के पैरा 15 के तहत चुनाव आयोग के सामने चल रही कार्यवाही और दसवीं अनुसूची के तहत स्पीकर के सामने चल रही अयोग्यता कार्यवाही के बीच संबंध पर दलीलें दे रहे थे।

    कौल ने 'सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र के राज्यपाल के प्रधान सचिव' मामले में संविधान पीठ के फ़ैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि पैरा 15 के तहत ECI का फ़ैसला और दसवीं अनुसूची के तहत स्पीकर का फ़ैसला अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते हैं और उनका असर भविष्य के लिए होता है।

    उन्होंने उस फ़ैसले का भी ज़िक्र किया जिसमें ऐसी स्थिति पर भी विचार किया गया, जब चुनाव चिह्न पाने वाले गुट के सदस्य बाद में अयोग्य ठहरा दिए जाते हैं। फ़ैसले में कहा गया कि ऐसी स्थिति में सदन में बचे सदस्यों को चुनाव चिह्न आवंटन के लिए चुनाव चिह्न आदेश और अन्य लागू कानूनों के तहत प्रक्रिया का पालन करना होगा।

    हालांकि, जस्टिस बागची ने उसी फ़ैसले के एक और पैराग्राफ़ की ओर ध्यान दिलाया, जिसमें कहा गया है कि अगर सदन में बहुमत रखने वाले किसी गुट को राजनीतिक पार्टी माना जाता है। बाद में उसे अयोग्य घोषित कर दिया जाता है तो अयोग्यता के नतीजों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता; क्योंकि राजनीतिक पार्टी होने का उसका दावा ही तब ख़त्म हो जाएगा।

    इसके बाद उन्होंने पूछा कि अगर सुप्रीम कोर्ट स्पीकर के फ़ैसले को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई करते हुए यह पाता है कि स्पीकर को विधायकों को अयोग्य घोषित कर देना चाहिए था, तो क्या होगा? उन्होंने सवाल किया कि अगर ECI ने पहले ही उस गुट को राजनीतिक पार्टी के तौर पर मान्यता दे दी थी और उसे आरक्षित चुनाव चिह्न दे दिया था तो क्या उस घोषणा पर फिर से विचार करना होगा?

    कौल ने जवाब दिया कि अयोग्यता भविष्य के लिए लागू होती है और अयोग्य घोषित विधायक राजनीतिक पार्टी का सदस्य बना रहता है, भले ही उसकी सदन की सदस्यता चली जाए। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति के बाद में अयोग्य घोषित होने से पहले से डाले गए वोट रद्द नहीं होते।

    जस्टिस बागची ने बताया कि चुनाव चिह्न का इस्तेमाल एक लगातार चलने वाला अधिकार है और उन्होंने फिर सवाल किया कि क्या बाद में अदालत के किसी फ़ैसले के आधार पर 'सिंबल ऑर्डर' के तहत ECI की घोषणा पर फिर से विचार करने की ज़रूरत पड़ सकती है।

    उन्होंने पूछा,

    "चुनाव चिह्न का इस्तेमाल एक लगातार चलने वाला अधिकार है। इसलिए जब फ़ैसला ग़लत लगता है और उसे भविष्य के लिए लागू माना जाता है, तो क्या उस ग़लत घोषणा के आधार पर 'सिंबल ऑर्डर' पर फिर से विचार करना एक अहम बात नहीं होगी?"

    कौल ने कहा कि अगर 'सिंबल ऑर्डर' (चुनाव चिह्न से जुड़े आदेश) पर दोबारा विचार किया गया तो यह कभी न खत्म होने वाली प्रक्रिया बन जाएगी। उन्होंने कहा कि स्पीकर और ECI के फैसले स्वतंत्र हैं और अलग-अलग मकसद पूरे करते हैं।

    जस्टिस बागची ने सुभाष देसाई मामले के फैसले में अलग-अलग टिप्पणियों से पैदा होने वाली मुश्किल की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि अगर स्पीकर का अयोग्यता खारिज करने का फैसला सही माना जाता है, तो कोई और मुद्दा नहीं बचता। लेकिन अगर सुप्रीम कोर्ट उस फैसले को गलत मानता है तो सवाल यह उठता है कि क्या इस दावे पर दोबारा विचार करने की ज़रूरत होगी कि उस गुट ने ही असली राजनीतिक पार्टी बनाई थी?

    उन्होंने कहा,

    "अगर इस घोषणा का असर स्पीकर द्वारा अयोग्यता खारिज करने पर मुहर लगाना है तो बात यहीं खत्म हो जाती है। लेकिन अगर ऐसा नहीं है, तो असली राजनीतिक पार्टी होने के दावे पर दोबारा विचार करना होगा। कम से कम पैरा 154 को देखें तो। लेकिन मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूं कि इसे समग्र रूप से देखा जाना चाहिए, क्योंकि इसमें ऐसी टिप्पणियां भी हैं, जो शायद पूरी तरह मेल न खाती हों; क्योंकि होता यह है कि भले ही कोई अयोग्य हो जाए, वह राजनीतिक पार्टी बना रहता है। इसमें कहा गया कि अयोग्य सदस्य चले जाते हैं। बाकी बचे सदस्यों को अलग चुनाव चिह्न मिलता है। अब आप सादिक अली मामले का ज़िक्र करने वाले हैं। चुनाव चिह्न का नियम उन लोगों पर लागू होगा, जिन्होंने संवैधानिक गलती की है या उन लोगों पर जिन्होंने संवैधानिक गलती की शिकायत की है? इस पर चुनाव आयोग को नए सिरे से विचार करना होगा।"

    जस्टिस बागची ने यह मुद्दा तब उठाया जब कौल अपनी बात रख रहे थे कि सुभाष देसाई मामले में ECI को इस बात से नहीं रोका गया कि वह यह तय करते समय कि कौन सा विरोधी गुट असली राजनीतिक पार्टी है, विधायी बहुमत (legislative majority) को आधार बनाए।

    कौल ने कहा कि पैराग्राफ 15 में असली राजनीतिक पार्टी तय करने के लिए कोई खास टेस्ट नहीं बताया गया। ECI तथ्यों के हिसाब से कोई टेस्ट तय कर सकता है, चाहे वह एक टेस्ट हो या कई टेस्ट।

    उन्होंने तर्क दिया कि सुभाष देसाई मामले में विधायी बहुमत को "कमज़ोर" या संभावित रूप से "बेकार" बताए जाने का मतलब यह नहीं था कि इस टेस्ट पर रोक लगाई गई; और शिवसेना विवाद में ECI ने अलग-अलग संभावित टेस्ट पर विचार किया और फिर बताया कि उन हालात में विधायी बहुमत ही सही टेस्ट क्यों था। कौल ने सुभाष देसाई मामले के फ़ैसले के उन पैराग्राफ़ का हवाला दिया, जिनमें पैराग्राफ़ 15 के तहत किसी तय टेस्ट के न होने की बात कही गई और यह माना गया कि ECI ने पहले भी विधायी और संगठनात्मक बहुमत को आधार माना है।

    उन्होंने सुभाष देसाई मामले के फ़ैसले के उस पैराग्राफ़ को भी अलग संदर्भ में पेश किया, जिसमें कहा गया कि दसवीं अनुसूची के तहत व्हिप नियुक्त करने के अधिकार के मामले में राजनीतिक दल और विधायी दल को एक नहीं माना जा सकता।

    कौल ने 'सादिक अली बनाम भारत निर्वाचन आयोग' मामले में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फ़ैसले का भी ज़िक्र किया। उस मामले में कोर्ट ने 'सिंबल ऑर्डर' के मक़सद से यह तय करने के लिए ECI द्वारा विधायी और संगठनात्मक विंग में संख्या बल को आधार मानने के फ़ैसले को सही ठहराया था।

    उन्होंने बताया कि सादिक अली मामले में बहुमत और संख्या बल को उस मामले की परिस्थितियों में "बहुत अहम और प्रासंगिक टेस्ट" बताया गया।

    कौल ने समझाया कि सुभाष देसाई मामले में राजनीतिक दल और विधायी दल के बीच फ़र्क क्यों किया गया। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा तब उठा था जब कोर्ट इस बात पर विचार कर रहा था कि दसवीं अनुसूची के मक़सद से व्हिप नियुक्त करने का अधिकार किसके पास है। एक पक्ष ने तर्क दिया कि विधायी दल और राजनीतिक दल असल में एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

    कोर्ट ने दसवीं अनुसूची के संदर्भ में इस तर्क को खारिज किया और कहा कि व्हिप की नियुक्ति राजनीतिक दल या उसके द्वारा अधिकृत व्यक्ति को ही करनी चाहिए।

    कौल ने तर्क दिया कि इस बात को ऐसे नहीं समझा जा सकता कि 'सिंबल ऑर्डर' के पैराग्राफ 15 के तहत विधायी ताकत (legislative strength) बेमानी है।

    उन्होंने कहा कि 'सुभाष देसाई' मामले के पैराग्राफ 109.2 में राजनीतिक दल और विधायी दल के बीच अंतर पर चर्चा की गई। यह चर्चा इस खास संदर्भ में की गई कि क्या कोई विधायी दल 'व्हिप' नियुक्त कर सकता है या नहीं; इसका मकसद चुनाव चिह्न से जुड़े विवादों के लिए 'विधायी बहुमत' की कसौटी को खत्म करना नहीं है।

    कौल ने आगे तर्क दिया कि संविधान में ऐसा कोई क्रम तय नहीं है, जिसके तहत ECI को पैराग्राफ 15 के विवाद पर फैसला लेने से पहले स्पीकर द्वारा अयोग्यता की कार्यवाही पर अंतिम निर्णय का इंतजार करना पड़े।

    कौल ने आरक्षित चुनाव चिह्न के महत्व पर जोर देने के लिए 'सादिक अली' मामले के फैसले का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि हालांकि चुनाव चिह्न को किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं माना जा सकता, लेकिन यह एक मूल्यवान राजनीतिक संपत्ति है क्योंकि मतदाता राजनीतिक दल को उसके चुनाव चिह्न से जोड़कर देखते हैं।

    उन्होंने तर्क दिया कि पैराग्राफ 15 का मकसद सिर्फ यह तय करना नहीं है कि चुनाव के लिए कोई खास चित्र वाला चिह्न किसे मिलेगा। उन्होंने कहा कि ECI को यह तय करना होगा कि कौन सा गुट असल में राजनीतिक दल है, और आरक्षित चुनाव चिह्न का आवंटन उसी फैसले के आधार पर होगा।

    उन्होंने ECI के उन आदेशों का भी जिक्र किया जिनमें पार्टी के भीतर लोकतंत्र और पार्टी के संविधान का पालन करने पर जोर दिया गया। उन्होंने तर्क दिया कि संगठन के ढांचे पर आयोग का विचार-विमर्श कोई ऐसा तरीका नहीं था जिसे खास तौर पर शिवसेना विवाद के लिए ही अपनाया गया हो।

    Case Title : Sunil Prabhu v. Eknath Shinde

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