कॉर्पोरेट देनदार के खिलाफ बचाव के तौर पर 'सेट-ऑफ' का दावा किया जा सकता है, भले ही समाधान योजना भविष्य के निपटारों पर रोक लगाती हो: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
20 March 2026 7:08 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि हालांकि इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, 2016 के तहत स्वीकृत समाधान योजना में शामिल न किए गए दावे समाप्त हो जाते हैं, फिर भी मध्यस्थता की कार्यवाही में बचाव के तौर पर 'सेट-ऑफ' (दावों की आपसी भरपाई) का सीमित दावा किया जा सकता है, बशर्ते इससे कोई सकारात्मक वसूली न हो।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने वेस्ट बंगाल पावर डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड के खिलाफ उजास एनर्जी लिमिटेड द्वारा दायर अपील आंशिक रूप से स्वीकार की। इसके साथ ही खंडपीठ ने कलकत्ता हा कोर्ट की डिवीज़न बेंच के उस आदेश में संशोधन किया, जिसमें जवाबी दावे (Counterclaim) को बाहर किए बिना मध्यस्थता की कार्यवाही जारी रखने का निर्देश दिया गया था।
यह विवाद पश्चिम बंगाल में ग्रिड से जुड़े रूफटॉप सौर ऊर्जा संयंत्रों की स्थापना के लिए 2017 में हुए एक अनुबंध से जुड़ा है। उजास एनर्जी एक MSME है। उसको बाद में सितंबर 2020 में कॉर्पोरेट इन्सॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन प्रोसेस (CIRP) में शामिल किया गया। कंपनी द्वारा शुरू की गई मध्यस्थता की कार्यवाही के दौरान, प्रतिवादी PSU ने जवाबी दावा पेश किया। हालांकि, यह जवाबी दावा CIRP के दौरान रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया।
अक्टूबर, 2023 में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल द्वारा समाधान योजना को मंजूरी दिए जाने के बाद उजास एनर्जी ने यह तर्क दिया कि जो भी दावे इस योजना का हिस्सा नहीं थे, वे सभी समाप्त हो चुके हैं। मध्यस्थता ट्रिब्यूनल ने इस तर्क को स्वीकार कर लिया और एक अंतरिम निर्णय के माध्यम से जवाबी दावा खारिज किया। इस निर्णय को हाईकोर्ट के सिंगल जज ने भी सही ठहराया। हालांकि, डिवीज़न बेंच ने इस फैसले को पलट दिया और यह टिप्पणी की कि इस मुद्दे पर मुख्य दावे के साथ-साथ पूर्ण रूप से सुनवाई और निर्णय की आवश्यकता है।
अपीलकर्ता ने यह तर्क दिया कि एक बार जब निर्णायक प्राधिकरण (Adjudicating Authority) ने इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, 2016 की धारा 31(1) के तहत समाधान योजना को मंजूरी दी तो उसके बाद IBC के तहत या मध्यस्थता ट्रिब्यूनल के समक्ष कोई भी जवाबी दावा पेश करना अस्वीकार्य है।
हालांकि, प्रतिवादी ने यह तर्क दिया कि भले ही समाधान योजना की मंजूरी के बाद उसका जवाबी दावा एक स्वतंत्र दावे के रूप में कायम न रह सके, फिर भी उसे अपीलकर्ता के दावों का विरोध करने के लिए 'सेट-ऑफ' का दावा पेश करने की अनुमति दी जानी चाहिए।
अदालत ने अपीलकर्ता के इस तर्क से सहमति जताई कि समाधान योजना में शामिल न किया गया कोई भी दावा, IBC की धारा 31 के तहत योजना को मंजूरी मिलते ही समाप्त हो जाता है। Ghanashyam Mishra & Sons बनाम Edelweiss Asset Reconstruction Co Ltd मामले में अपने पहले के फैसले पर भरोसा करते हुए बेंच ने दोहराया कि ऐसे खत्म हो चुके दावों के संबंध में कोई भी कार्यवाही जारी नहीं रखी जा सकती।
हालांकि, कोर्ट ने किसी दावे को आगे बढ़ाने और उसका बचाव के तौर पर इस्तेमाल करने के बीच एक अंतर किया। कोर्ट ने कहा कि रिज़ॉल्यूशन प्लान उन दावों की वसूली या निपटारे पर रोक लगाता है, जो उसमें शामिल नहीं हैं, जिसमें जवाबी दावे भी शामिल हैं। हालांकि, यह ऐसे दावों का इस्तेमाल बचाव के तौर पर सेट-ऑफ (Set-Off) के रूप में करने पर साफ़ तौर पर रोक नहीं लगाता।
इस बात पर ध्यान देते हुए कि प्रतिवादी ने रिज़ॉल्यूशन प्लान मंज़ूर होने से पहले ही अपना जवाबी दावा उठाया और रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल को इसकी जानकारी थी, कोर्ट ने फैसला दिया कि सीमित न्यायसंगत विचार ज़रूरी था।
प्रतिवादी की दलील को स्वीकार करते हुए जस्टिस दत्ता द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि हालांकि प्रतिवादी का जवाबी दावा सुनवाई योग्य नहीं था। फिर भी वह अपीलकर्ता के दावे का विरोध करने के लिए बचाव के तौर पर सेट-ऑफ का इस्तेमाल कर सकता था, क्योंकि रिज़ॉल्यूशन प्लान ऐसी दलील पर रोक नहीं लगाता था।
कोर्ट ने कहा,
“हम फैसला देते हैं कि प्रतिवादी, हालांकि रिज़ॉल्यूशन प्लान मंज़ूर होने के बाद जवाबी दावे के ज़रिए स्वतंत्र रूप से अपना दावा आगे बढ़ाने का हकदार नहीं है, फिर भी उसे कम से कम बचाव के तौर पर सेट-ऑफ की दलील उठाने की अनुमति दी जानी चाहिए। तदनुसार आदेश दिया जाता है।”
कोर्ट ने आगे यह भी कहा,
“...रिज़ॉल्यूशन प्लान साफ़ तौर पर या यहां तक कि परोक्ष रूप से भी बचाव के तौर पर सेट-ऑफ की दलील को बाहर नहीं करता है; यह केवल भुगतान या निपटारे के उद्देश्य से किसी भी दावे पर रोक लगाता है।”
तदनुसार, कोर्ट ने प्रतिवादी को मध्यस्थता में पूरी तरह से बचाव के तौर पर सेट-ऑफ की दलील उठाने की अनुमति दी। कोर्ट ने साफ़ किया कि ऐसी दलील के आधार पर कोई भी सकारात्मक राहत या वसूली नहीं दी जा सकती। यदि प्रतिवादी का दावा अपीलकर्ता को दी गई राशि से अधिक है तो अतिरिक्त राशि की वसूली नहीं की जा सकती। इसके विपरीत, यदि समायोजन के बाद अपीलकर्ता को कोई राशि देय रहती है, तो उसे दिया जा सकता है।
कोर्ट ने आगे फैसला दिया कि यदि मध्यस्थता की कार्यवाही वापस ले ली जाती है तो जवाबी दावा भी खत्म हो जाएगा, क्योंकि उसका अस्तित्व केवल बचाव के उद्देश्यों के लिए है।
यह साफ़ करते हुए कि उसका फैसला इस मामले में रिज़ॉल्यूशन प्लान की विशिष्ट शर्तों तक ही सीमित है, कोर्ट ने Bharti Airtel Ltd. बनाम Aircel Ltd. मामले में अपने पहले के फैसले से इसे अलग बताया और कहा कि वहां का मुद्दा CIRP के दौरान सेट-ऑफ से संबंधित था, जबकि यह मामला रिज़ॉल्यूशन प्लान मंज़ूर होने से पहले उठाए गए दावे से संबंधित है।
Cause Title: UJAAS ENERGY LTD. VS. WEST BENGAL POWER DEVELOPMENT CORPORATION LTD.

