उम्रकैद के साथ सुनाई गई अन्य सज़ाएं एक साथ चलनी चाहिए, न कि एक के बाद एक: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

18 Aug 2026 10:31 PM IST

  • उम्रकैद के साथ सुनाई गई अन्य सज़ाएं एक साथ चलनी चाहिए, न कि एक के बाद एक: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (18 अगस्त) को फिर से कहा कि जिन मामलों में दोषी को हत्या के लिए उम्रकैद और कई अपराधों के लिए अन्य सज़ाएं सुनाई गईं, वहां सज़ाएं एक के बाद एक (Consecutively) नहीं, बल्कि एक साथ (Concurrently) चलनी चाहिए।

    जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने कहा,

    "...जिन मामलों में दोषी को कई अपराधों के लिए कई सज़ाएं दी जाती हैं और उनमें से एक सज़ा उम्रकैद होती है तो सज़ाएं केवल एक साथ चलनी चाहिए, न कि एक के बाद एक।"

    बेंच ने मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच के उस आदेश में बदलाव किया, जिसमें आरोपी को सुनाई गई उम्रकैद और तय समय की सज़ाओं को एक के बाद एक चलाने का आदेश दिया गया।

    कोर्ट ने मुथुरामलिंगम और अन्य बनाम राज्य (2016) मामले में संवैधानिक बेंच के फैसले का हवाला देते हुए कहा,

    "ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता को IPC की धारा 449, 302, 364 के तहत उम्रकैद और IPC की धारा 392 और 201 के तहत तय समय की सज़ा सुनाई, जिन्हें एक के बाद एक चलाने का निर्देश दिया गया। ऊपर की चर्चा को देखते हुए, हम हाई कोर्ट के निर्देश में बदलाव करना उचित समझते हैं और यह तय करते हैं कि अपीलकर्ता की सज़ाएं एक साथ चलेंगी।"

    साथ ही कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस आदेश को भी गलत माना, जिसमें उसने अपीलकर्ता की सज़ा को खुद से (suo motu) उम्रकैद से बढ़ाकर 'प्राकृतिक जीवन के शेष समय तक' (Natural Life) की उम्रकैद कर दिया था।

    जस्टिस बिश्नोई द्वारा लिखे गए फैसले में नागराजन बनाम तमिलनाडु राज्य 2025 LiveLaw (SC) 672 का हवाला देते हुए कहा गया कि हाईकोर्ट दोषी/आरोपी द्वारा दोषसिद्धि के खिलाफ दायर अपील पर विचार करते समय सज़ा बढ़ाने के लिए खुद से (suo motu) अपनी रिविजनल शक्तियों का इस्तेमाल नहीं कर सकता है।

    नागराजन मामले में कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 401 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 442) के तहत अपने रिविजनल अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल तब नहीं कर सकता, जब वह पक्ष जो रिविजन याचिका दायर कर सकता था - जैसे कि राज्य या शिकायतकर्ता - ने ऐसा न करने का फैसला किया हो।

    कोर्ट ने कहा,

    “हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता की सज़ा बढ़ाने के लिए अपनी 'सुओ मोटो' (खुद से संज्ञान लेने की) रिविज़नल अधिकार-शक्ति का गलत इस्तेमाल किया, जबकि राज्य अधिकारियों, पीड़ित या शिकायतकर्ता में से किसी ने भी सज़ा बढ़ाने के लिए कोई अपील नहीं की थी। इसके अलावा, हाई कोर्ट ने सज़ाओं को एक के बाद एक (Consecutively) चलाने का निर्देश देकर गलती की। इसलिए हम निर्देश देते हैं कि सज़ाएँ एक साथ (Concurrently) चलेंगी।”

    Cause Title: GOPI @ SAHAYA PURUNA VERSUS THE STATE

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