गंभीर अपराधों में केवल इसलिए सजा निलंबित नहीं की जा सकती कि अपील पर जल्द सुनवाई होने की संभावना कम है: सुप्रीम कोर्ट

  • गंभीर अपराधों में केवल इसलिए सजा निलंबित नहीं की जा सकती कि अपील पर जल्द सुनवाई होने की संभावना कम है: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों को चेतावनी दी कि वे गंभीर अपराधों के दोषियों की सजा को केवल इसलिए निलंबित न करें क्योंकि उनकी अपीलें लंबित हैं और निकट भविष्य में उन पर सुनवाई होने की संभावना बहुत कम है।

    जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया, जिसमें हत्या के एक दोषी की सजा को अपील लंबित रहने तक निलंबित कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने ऐसा अपील के लंबित होने और निकट भविष्य में सुनवाई की कम संभावना का हवाला देते हुए किया।

    गंभीर अपराधों के दोषियों को अपील लंबित होने या सुनवाई में देरी के आधार पर रिहा करने की प्रथा की कड़ी आलोचना करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया पेश किए गए सबूतों और दोषी द्वारा अब तक काटी गई वास्तविक सजा पर उचित ध्यान दिए बिना ऐसी रिहाई देना, आपराधिक न्याय प्रणाली की कमियों को उजागर करता है।

    कोर्ट ने कहा,

    "मामलों के लंबित रहने का कारण चाहे जो भी हो, अदालतें लापरवाह नहीं हो सकतीं और गंभीर अपराधों के दोषियों को रिहा नहीं कर सकतीं, खासकर तब जब उन्होंने सजा का एक बड़ा हिस्सा भी न काटा हो। ऐसा करना आम समाज के जीवन को खतरे में डालता है और हमारी न्याय प्रणाली की कमियों को सामने लाता है। इन कमियों को हम छिपा नहीं सकते, बल्कि इन्हें दूर करने का निरंतर प्रयास करना चाहिए।"

    शिकायतकर्ता (मृतक के पिता) ने हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिसमें मुख्य दोषी (A1) - जो इस अपराध का मास्टरमाइंड था - और अन्य आरोपियों की सजा को निलंबित कर दिया गया। यह मामला स्थानीय सरपंच चुनाव की रंजिश के चलते A1 द्वारा की गई हत्या से जुड़ा था।

    सजा को निलंबित करने का मुख्य कारण यह था कि हाईकोर्ट में कई आपराधिक अपीलें लंबित थीं और निकट भविष्य में इस मामले का निपटारा होना असंभव लग रहा था।

    अपील स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने सजा को निलंबित करके गलती की। हाईकोर्ट ने उन सबूतों को नजरअंदाज किया, जिनके आधार पर A1 को दोषी ठहराया गया। अदालत ने कहा कि सजा पर रोक (सजा निलंबन) की याचिकाओं पर फैसला करते समय अदालतों को किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का ध्यान रखने के साथ-साथ 'पीड़ितों के परिवारों की भावनाओं के प्रति भी संवेदनशील' होना चाहिए। खासकर तब, जब आरोपी को अदालत द्वारा दोषी ठहराया जा चुका हो—जैसा कि इस मामले में है—और अब उसे 'निर्दोष मानने' (Presumption of Innocence) का लाभ नहीं मिल सकता।

    जघन्य अपराधों में सजा पर रोक लगाने का फैसला बहुत सावधानी से लिया जाना चाहिए।

    अदालत ने कहा कि अपीलों का लंबे समय तक लंबित रहना एक सच्चाई है। यह तब महत्वपूर्ण हो सकता है जब दोषी ने पहले ही कुछ समय जेल में बिता लिया हो। लेकिन, अगर अपराध जघन्य है और दोषी ने बहुत कम समय ही जेल में बिताया है, तो केवल अपील लंबित होने के आधार पर उसे जमानत नहीं दी जा सकती।

    अदालत ने कहा,

    "हमारा मतलब यह है कि जघन्य अपराधों के दोषियों को जमानत देते समय बहुत सावधानी बरतनी चाहिए। इसके लिए पेश किए गए सबूतों की शुरुआती जांच (Prima Facie Examination) की जानी चाहिए। अगर सबूत ठोस लगते हैं, तो आरोपी द्वारा जेल में बिताए गए समय और अदालत में अपीलों के लंबे समय तक लंबित रहने की वास्तविकता—दोनों को ध्यान में रखकर फैसला लेना चाहिए। यह केवल अपील लंबित होने की वजह से लिया गया कोई जल्दबाजी भरा फैसला नहीं होना चाहिए, क्योंकि अपील लंबित रहने का बोझ अदालतों की तुलना में आम नागरिकों पर अधिक पड़ता है।"

    अदालत ने पाया कि पहले आरोपी (A1) ने जेल में केवल चार महीने बिताए हैं। उसके द्वारा किए गए अपराध की गंभीरता को देखते हुए, और यह तथ्य भी कि पर्याप्त सबूतों के आधार पर दोषी ठहराए जाने के बाद अब उसे 'निर्दोष' नहीं माना जा सकता, अदालत ने पिछले आदेश में दखल दिया और उसे दी गई जमानत रद्द की।

    अदालत ने स्पष्ट किया,

    "हम यह साफ कर देना चाहते हैं कि पहले आरोपी (A1) के अपराध को लेकर हमारी ये टिप्पणियां केवल शुरुआती (Prima Facie) हैं। इसी तरह, अन्य लोगों के खिलाफ सबूतों पर हमारी टिप्पणियां भी केवल शुरुआती हैं। इनका असर मुख्य अपील की सुनवाई पर नहीं पड़ेगा।"

    Case Title : Hanuman Prasad @ Hanuta Ram VERSUS State of Rajasthan & Ors.

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