रिश्वत मांगने के मामले में PC Act की धारा 17A लागू नहीं होती, क्योंकि इसका सरकारी कर्तव्यों से कोई लेना-देना नहीं: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
20 Oct 2026 11:55 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम' (Prevention of Corruption Act), 1988 की धारा 17A, जिसके तहत सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ किसी जांच या पूछताछ से पहले पूर्व अनुमति लेना जरूरी होता है, वह रिश्वत मांगने के मामलों में लागू नहीं होगी। ऐसा इसलिए है, क्योंकि रिश्वत मांगना सरकारी कर्तव्यों के पालन से जुड़ा हुआ काम नहीं है।
जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने कहा कि यह प्रावधान केवल तब लागू होता है, जब कथित अपराध किसी सरकारी कर्मचारी द्वारा अपने आधिकारिक कार्यों या कर्तव्यों का पालन करते समय दी गई सिफारिश या लिए गए निर्णय से जुड़ा हो।
कोर्ट ने कहा,
"रिश्वत मांगना पूरी तरह से एक आपराधिक कृत्य है। इसका सरकारी कार्यों से कोई संबंध नहीं है, और न ही यह उस सरकारी कर्मचारी द्वारा अपनी आधिकारिक हैसियत से दी गई किसी सिफारिश या लिए गए निर्णय से जुड़ा है।"
जस्टिस अंजारिया द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया:
"PC Act की धारा 17A लागू होने के लिए, उस सरकारी कर्मचारी द्वारा कोई 'निर्णय' लिया गया होना चाहिए या कोई 'सिफारिश' की गई होनी चाहिए, जिसके खिलाफ जांच या पूछताछ शुरू की जा रही है। यह 'निर्णय' या 'सिफारिश' उस सरकारी कर्मचारी द्वारा अपने आधिकारिक कार्यों या कर्तव्यों का पालन करते समय की गई होनी चाहिए। दूसरे शब्दों में, सरकारी कर्मचारी पर लगे आरोप का संबंध उसके द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्यों का पालन करते समय दी गई किसी सिफारिश या लिए गए निर्णय से होना चाहिए। मौजूदा मामले में ये मुख्य और जरूरी बातें मौजूद नहीं हैं, इसलिए यहां PC Act की धारा 17A लागू नहीं होती। यहां आरोप यह है कि अपीलकर्ता ने अवैध रूप से रिश्वत मांगी है, जो कि पूरी तरह से एक आपराधिक कृत्य है और इसका सरकारी कार्यों या कर्तव्यों के पालन से कोई लेना-देना नहीं है।"
कोर्ट ने यह टिप्पणी राजस्थान पुलिस के कांस्टेबल तेजाराम द्वारा दायर अपील खारिज करते हुए की। कांस्टेबल ने 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम' की धारा 7 के तहत अपने खिलाफ आरोप तय किए जाने को चुनौती दी थी।
कांस्टेबल ने दलील दी थी कि उसके खिलाफ चल रही कानूनी कार्यवाही गलत है, क्योंकि जांच शुरू करने से पहले धारा 17A के तहत पूर्व अनुमति नहीं ली गई। इस दलील को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि इस मामले में धारा 17A लागू होने के लिए जरूरी शर्तें मौजूद नहीं थीं।
कोर्ट ने कहा,
"इस मामले में अपीलकर्ता पर PC Act की धारा 17A लागू नहीं होती। इस धारा के तहत कार्रवाई शुरू करने के लिए जरूरी शर्तों में से कोई भी शर्त पूरी नहीं होती।"
यह मामला इस आरोप से जुड़ा है कि अपीलकर्ता ने पुलिस अधीक्षक (SP) की ओर से 1.5 लाख रुपये की रिश्वत मांगी थी। जून 2021 में उसके खिलाफ FIR दर्ज की गई। दिसंबर 2023 में इस एक्ट की धारा 19 के तहत मुकदमा चलाने की मंजूरी (Sanction) दी गई। इसके बाद चार्जशीट दाखिल की गई, और सितंबर 2024 में पाली स्थित एंटी-करप्शन ब्यूरो के स्पेशल जज ने उस पर इस एक्ट की धारा 7 के तहत आरोप तय किए।
राजस्थान हाईकोर्ट ने आरोप तय किए जाने को चुनौती देने वाली उसकी रिवीजन याचिका खारिज की, जिसके बाद वह सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट के सामने अपीलकर्ता ने दलील दी कि धारा 17A के तहत पहले से मंजूरी लेना अनिवार्य है। अगर ऐसा नहीं किया गया तो बाद में इसे ठीक नहीं किया जा सकता। उसने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए यह भी बताया कि धारा 17A की वैधता का मामला अभी एक बड़ी बेंच के पास विचाराधीन है।
दूसरी ओर, राज्य सरकार ने तर्क दिया कि यह प्रावधान सरकारी कर्मचारियों को पूरी छूट (Blanket Immunity) नहीं देता। यह उनके आधिकारिक कार्यों से अलग किसी आपराधिक आचरण के मामले में उन्हें सुरक्षा नहीं दे सकता।
धारा 17A हर मामले में लागू नहीं होती
सुप्रीम कोर्ट ने 'CBI बनाम संतोष करनानी (2023)' मामले में दिए गए अपने फैसले का जिक्र किया। उस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि धारा 17A वहां लागू नहीं होगी, जहां आरोप किसी सरकारी कर्मचारी द्वारा अपनी आधिकारिक हैसियत से की गई सिफारिश या लिए गए फैसले से जुड़ा न हो।
कोर्ट ने गौर किया कि मौजूदा मामले में आरोप रिश्वत मांगने से जुड़ा है, न कि अपीलकर्ता द्वारा अपनी प्रशासनिक या अर्ध-न्यायिक (Quasi-Judicial) हैसियत से की गई किसी सिफारिश या लिए गए किसी फैसले से।
इसमें 'अनिल दैमा बनाम राजस्थान राज्य (2026)' मामले में हाल ही में लिए गए अपने फैसले का भी जिक्र किया गया, जिसमें यह माना गया कि धारा 17A को उन मामलों में लागू नहीं किया जा सकता, जिनमें अवैध रिश्वत की मांग शामिल हो।
अदालत ने 'शंकर भट बनाम केरल राज्य' मामले में केरल हाईकोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया। इसमें कहा गया कि रिश्वत लेने जैसे आपराधिक कृत्य, जिनका आधिकारिक कर्तव्यों से कोई लेना-देना नहीं है, वे धारा 17A के सुरक्षा दायरे में नहीं आते हैं।
इस प्रावधान के सीमित दायरे पर जोर देते हुए अदालत ने कहा कि हालांकि धारा 17A को कुछ खास परिस्थितियों में लोक सेवकों को कानूनी कार्रवाई से बचाने के लिए बनाया गया, लेकिन यह सुरक्षा तभी मिल सकती है जब कानूनी शर्तें पूरी हों।
अदालत ने टिप्पणी की,
"इस धारा को ऐसा नहीं माना जा सकता कि यह हर मामले पर लागू होती है।"
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि धारा 17A की वैधता से जुड़ा मामला बड़ी पीठ के पास भेजे जाने के बावजूद, वह इस अपील पर फैसला ले सकती है, क्योंकि इस मामले के तथ्यों पर यह प्रावधान लागू ही नहीं होता है।
खंडपीठ ने कहा,
"इस तरह धारा 17A की स्पष्ट भाषा से यह साफ है कि यह प्रावधान केवल उन स्थितियों में लागू होता है, जहां कोई लोक सेवक अपने आधिकारिक कर्तव्यों का पालन करते हुए कोई सिफारिश करता है या कोई निर्णय लेता है। इस मामले में अपीलकर्ता पर एक आपराधिक कृत्य का आरोप है—यानी उसने 1.5 लाख रुपये की अवैध रिश्वत की मांग की। अपीलकर्ता के इस आचरण को किसी भी तरह से उसके आधिकारिक कर्तव्यों के पालन का हिस्सा नहीं माना जा सकता। इसका उसके आधिकारिक कर्तव्यों के तहत की गई किसी सिफारिश या निर्णय से कोई संबंध नहीं था; बल्कि यह उसके आधिकारिक कर्तव्यों से पूरी तरह अलग एक कृत्य था।"
अदालत ने धारा 19 के तहत मंजूरी (सैंक्शन) मिलने के समय को लेकर की गई चुनौती को भी खारिज किया। अदालत ने कहा कि मामले का संज्ञान लेने से पहले ही मंजूरी मिल गई। अगर इस प्रक्रिया में कोई छोटी-मोटी कमी भी रह गई हो, तो भी इससे आपराधिक कार्यवाही अमान्य नहीं हो जाती।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि धारा 17A के तहत पूर्व मंजूरी न होने से पूरी कानूनी कार्यवाही अमान्य नहीं हो जाती। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा और अपील खारिज की।
Case Title : Tejaram v. State of Rajasthan

