S. 92 CPC | पब्लिक ट्रस्ट के खिलाफ़ केस करने की इजाज़त वाली अर्ज़ी पेंडिंग होने पर सिविल कोर्ट अंतरिम आदेश नहीं दे सकता: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
19 Sept 2026 10:14 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (18 सितंबर) को कहा कि जब तक 'कोड ऑफ़ सिविल प्रोसीजर, 1908' (CPC) की धारा 92 के तहत केस करने की इजाज़त मांगने वाली अर्ज़ी पेंडिंग है, तब तक सिविल कोर्ट सुरक्षा या बचाव से जुड़े अंतरिम आदेश नहीं दे सकता।
चूंकि CPC की धारा 92 के तहत लोगों के समूह की ओर से केस (रिप्रेजेंटेटिव सूट) करने के लिए कोर्ट से पहले इजाज़त लेना ज़रूरी है, इसलिए जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने कहा कि धारा 92 CPC के तहत इजाज़त मिलना केस शुरू करने के लिए एक ज़रूरी शर्त है। जब तक ऐसी इजाज़त नहीं मिल जाती, तब तक सिविल कोर्ट के सामने कोई ऐसा केस या मामला पेंडिंग नहीं होता जिस पर अंतरिम या सप्लीमेंट्री शक्तियों का इस्तेमाल किया जा सके।
कोर्ट ने इस सवाल का जवाब देते हुए कहा,
"...अगर सिविल कोर्ट के पास CPC, 1908 ('कोड') की धारा 92 के तहत दायर शिकायत (प्लेंट) और केस करने की इजाज़त मांगने वाली अर्ज़ी है तो वह इजाज़त वाली अर्ज़ी के निपटारे तक सुरक्षा या बचाव से जुड़े अंतरिम आदेश नहीं दे सकता।"
यह सवाल इस तरह तैयार किया गया:
"...क्या सिविल कोर्ट, जिसके पास CPC, 1908 ('कोड') की धारा 92 के तहत दायर शिकायत और केस करने की इजाज़त मांगने वाली अर्ज़ी है, उसे इजाज़त वाली अर्ज़ी के पेंडिंग रहने के दौरान सुरक्षा या बचाव से जुड़े अंतरिम आदेश देने की शक्ति है?"
कोर्ट ने साफ़ किया कि जब तक इजाज़त वाली अर्ज़ी पर फ़ैसला नहीं हो जाता, तब तक CPC की धारा 151 के तहत मिली इनहेरेंट शक्तियों (अंतर्निहित शक्तियों) का भी इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा,
"...यह तय कानून है कि 'जनरैलिया स्पेशैलिबस नॉन डेरोगेंट्स' (सामान्य नियम विशेष नियम को रद्द नहीं करते) के सिद्धांत के अनुसार, कोड की धारा 151 के तहत सुरक्षित इनहेरेंट शक्ति, धारा 92 में दिए गए विशेष प्रावधान से ऊपर नहीं हो सकती। विशेष प्रावधान को सामान्य प्रावधान पर प्राथमिकता मिलनी चाहिए और कोई भी अंतरिम आदेश देने से पहले धारा 92 में दिए गए सुरक्षा उपायों का पालन किया जाना चाहिए।"
अपील करने वालों ने 'पीपल्स एजुकेशन ट्रस्ट' के खिलाफ़ CPC की धारा 92 के तहत कार्यवाही शुरू की थी और साथ ही केस करने की इजाज़त मांगने वाली अर्ज़ी भी दायर की थी। जब छुट्टी (अनुमति) के लिए आवेदन लंबित था, तब सिविल कोर्ट ने CPC के ऑर्डर XL नियम 1(a) के तहत एक आदेश पारित किया। इस आदेश के ज़रिए ट्रस्ट के रोज़मर्रा के कामकाज को संभालने के लिए मौजूदा ट्रस्टियों की एक एड-हॉक (तदर्थ) समिति बनाई गई।
इसके बाद कर्नाटक हाईकोर्ट ने सिविल कोर्ट का आदेश रद्द किया। कोर्ट ने कहा कि अनुमति के बिना धारा 92 के तहत दायर मुकदमा "शुरुआत से ही अमान्य" (Stillborn) होता है। ऐसी अनुमति मिलने से पहले कोर्ट को अंतरिम आदेश पारित करने का अधिकार नहीं है।
हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ वादी-अपीलकर्ता सुप्रीम कोर्ट गए।
अपील खारिज करते हुए जस्टिस मनमोहन द्वारा लिखे गए फैसले में विवादित निष्कर्ष को सही ठहराया गया। साथ ही, इस मुद्दे पर हाईकोर्ट के अलग-अलग विचारों की भी समीक्षा की गई कि क्या धारा 92 के तहत अनुमति के आवेदन के लंबित रहने के दौरान सुरक्षात्मक आदेश पारित किए जा सकते हैं।
जहां इलाहाबाद, बॉम्बे, केरल और मद्रास हाईकोर्ट ने उचित मामलों में सुरक्षात्मक अधिकार क्षेत्र की संभावना को स्वीकार किया, वहीं उड़ीसा और कर्नाटक हाई कोर्ट का यह मानना था कि अनुमति मिलने से पहले ऐसा अधिकार क्षेत्र उपलब्ध नहीं होता है।
कोर्ट ने बाद वाले विचार के पक्ष में इस मतभेद को सुलझाया। कोर्ट ने अपीलकर्ता की इस दलील को खारिज कर दिया कि अनुमति का आवेदन 'मूल कार्यवाही' (Substantive Proceeding) है, जो सिविल कोर्ट को अनुमति के आवेदन पर फैसला होने से पहले भी अंतरिम आदेश पारित करने की शक्ति देता है।
इसके बजाय, कोर्ट प्रतिवादियों की इस बात से सहमत हुआ कि धारा 92 के तहत अनुमति का आवेदन केवल इसलिए 'मूल कार्यवाही' नहीं बन जाता, क्योंकि इसे कर्नाटक सिविल रूल्स ऑफ़ प्रैक्टिस के नियम 16-A के तहत एक अलग याचिका के रूप में दर्ज करना ज़रूरी है; क्योंकि अनुमति पर विचार करना एक 'शुरुआती कार्यवाही' (Threshold Proceeding) है।
कोर्ट ने कहा,
"असल में, धारा 92 के तहत कार्यवाही मुकदमे की प्रकृति की मूल कार्यवाही होती है और अंतरिम आदेश केवल अनुमति मिलने के बाद ही पारित किए जा सकते हैं... इसलिए, धारा 92 के तहत अनुमति मिलना एक ज़रूरी और अनिवार्य पूर्व-शर्त है, जिसके बिना कोई ऐसी लंबित कार्यवाही नहीं होती जिसमें अंतरिम आवेदनों पर विचार किया जा सके।"
मामले के तथ्यों पर कानून लागू करते हुए कोर्ट ने हाईकोर्ट के दखल को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि पब्लिक ट्रस्ट के लिए रिसीवर की नियुक्ति सिर्फ़ संपत्ति की सुरक्षा के लिए नहीं होती, क्योंकि इससे ट्रस्ट का मौजूदा मैनेजमेंट हट सकता है।
कोर्ट के अनुसार, ऐसे आदेश से धारा 92 के तहत मंज़ूरी लेने की ज़रूरत का मकसद ही खत्म हो जाएगा।
ज़रूरी मामलों में एकतरफ़ा मंज़ूरी संभव
हालांकि, कोर्ट ने साफ़ किया कि उसके फ़ैसले से कोर्ट को सचमुच ज़रूरी हालात से निपटने से नहीं रोका जाएगा।
कोर्ट ने माना कि अगर मज़बूत वजहें हों, तो धारा 92 के तहत मंज़ूरी देने से पहले नोटिस देने की ज़रूरत को हटाया जा सकता है।
कोर्ट ने कहा,
"हालांकि, अगर लिखित में दर्ज करने लायक मज़बूत वजहें हों - जैसे कि तथ्यों से तुरंत राहत की ज़रूरत पता चले - तो मंज़ूरी देने से पहले नोटिस देने की ज़रूरत को हटाया जा सकता है।"
नतीजतन, अपील खारिज कर दी गई।
Cause Title: S. PANCHALINGU & ORS. VERSUS PEOPLE'S EDUCATION TRUST (R) & OTHERS ETC.

