S. 197 CrPC | सरकारी कंपनियों के कर्मचारियों को अपने आप 'मंजूरी सुरक्षा' का अधिकार नहीं मिलता: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
3 Nov 2026 3:49 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकारी कंपनियों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) के कर्मचारी केवल इसलिए CrPC की धारा 197 के तहत सुरक्षा का दावा नहीं कर सकते, क्योंकि उन्हें 'लोक सेवक' (Public Servant) माना जाता है।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच ने दोहराया कि सरकारी संस्थानों के कर्मचारी अपने आप 'सरकारी सेवक' नहीं बन जाते, जिन्हें मुकदमा चलाने से पहले पूर्व मंजूरी (Sanction) की सुरक्षा प्राप्त हो।
कोर्ट ने कहा,
"किसी सरकारी संस्थान का कर्मचारी केवल इसलिए 'सरकारी सेवक' नहीं बन जाता कि वह 'लोक सेवक' है। इस आधार पर वह CrPC की धारा 197 के तहत सुरक्षा का हकदार नहीं हो जाता।"
कोर्ट ने राजस्थान हाईाकोर्ट का वह आदेश रद्द किया, जिसमें जोधपुर डिस्कॉम (Jodhpur Discoms) के तीन कर्मचारियों को 'इलेक्ट्रिसिटी एक्ट, 2003' के तहत लगे आरोपों से बरी कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने यह फैसला इस आधार पर दिया था कि CrPC की धारा 197 के तहत पूर्व मंजूरी नहीं ली गई।
यह मामला इन आरोपों से जुड़ा है कि कर्मचारियों ने मीटर से छेड़छाड़ करके 'बालिम स्टील प्राइवेट लिमिटेड' (Balim Steel Pvt. Ltd.) को बिजली चोरी करने में मदद की थी। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि कंपनी ने इस चोरी के जरिए लगभग 12.99 करोड़ रुपये कमाए, जिसमें से 8.15 करोड़ रुपये का भुगतान नहीं किया गया।
जांच के बाद चार्जशीट दाखिल की गई, आरोप तय किए गए और अपराध का संज्ञान (Cognizance) लिया गया। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में रिवीजन याचिका दायर की गई, जिसे हाई कोर्ट ने स्वीकार कर लिया और संज्ञान लेने वाला आदेश रद्द किया।
हाईकोर्ट के इस आदेश को चुनौती देते हुए जोधपुर डिस्कॉम्स ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
अपील स्वीकार करते हुए कोर्ट ने कहा कि भले ही ये तीनों कर्मचारी 'इलेक्ट्रिसिटी एक्ट' की धारा 169 के तहत 'लोक सेवक' थे, लेकिन वे जोधपुर डिस्कॉम्स के कर्मचारी थे। न तो उनकी नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा की गई और न ही राज्य सरकार उन्हें नौकरी से निकाल सकती थी।
मोहम्मद हादी राजा बनाम बिहार राज्य (1998) और पंजाब स्टेट वेयरहाउसिंग कॉर्पोरेशन बनाम भूषण चंदर (2016) के मामलों में कोर्ट ने फिर से स्पष्ट किया कि सरकारी कंपनियों और सार्वजनिक उपक्रमों के अधिकारी केवल इसलिए CrPC की धारा 197 के तहत सुरक्षा पाने के हकदार नहीं हो जाते कि उनके संगठन संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत 'राज्य' (State) की परिभाषा में आते हैं।
कोर्ट ने कहा,
"...प्रतिवादियों के पक्ष में हाई कोर्ट द्वारा दिया गया फैसला - जिसके तहत उन्हें CrPC की धारा 197 के तहत सुरक्षा दी गई थी - पूरी तरह से गलत है, क्योंकि यह इस कोर्ट के पहले से तय न्यायिक नज़ीरों (Judicial Precedents) के खिलाफ है।"
इसके अनुसार, हाईकोर्ट के उन आदेशों को रद्द किया गया, जिनके तहत एग्जीक्यूटिव इंजीनियर, असिस्टेंट इंजीनियर और जूनियर इंजीनियर को आरोप मुक्त (Discharge) किया गया। उनकी रिवीजन याचिकाओं को वापस हाईकोर्ट के पास भेज दिया गया, ताकि हाई कोर्ट उनके गुण-दोषों (Merits) पर फिर से विचार कर सके। इसमें यह भी देखा जाएगा कि क्या चार्जशीट में मौजूद सामग्री उनके खिलाफ आरोप तय करने के लिए पर्याप्त है या नहीं।
Case Title : JODHPUR DISCOMS VERSUS LALIT SONI & ANR. ETC.

