S. 106 Evidence Act | ससुराल में महिला की अप्राकृतिक मौत होने पर वहां मौजूद लोगों को स्पष्टीकरण देना होगा: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
3 Nov 2026 11:12 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (2 नवंबर) को एक व्यक्ति को अपनी पत्नी की हत्या का दोषी ठहराए जाने के फैसले को बरकरार रखा। महिला को दहेज की मांग को लेकर लगातार परेशान किया जाता था।
आरोपी ने बचाव में दलील दी थी कि उसकी पत्नी की मौत एक दुखद दुर्घटना थी; उसने कहा कि शारीरिक संबंध बनाते समय पत्नी को अचानक मिर्गी का दौरा पड़ा, जिससे उसकी मौत हो गई।
जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय की बेंच ने इस दलील को खारिज किया। कोर्ट ने कहा कि एविडेंस एक्ट की धारा 106 (भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 109) के तहत पति कोई ठोस स्पष्टीकरण नहीं दे सका। इसके अलावा, उसने पत्नी की मौत को लेकर मिर्गी के दौरे वाली एक मनगढ़ंत कहानी गढ़ी। चूंकि घटना के समय महिला अपने पति के साथ ससुराल में अकेली थी, इसलिए ये बातें उसके खिलाफ सबूतों की कड़ी को और मजबूत करती हैं।
कोर्ट ने कहा,
"...यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि ससुराल में अप्राकृतिक मौत के समय मृतका विमलबाई अपने पति रामकिशन के साथ अकेली थी। एविडेंस एक्ट की धारा 106 के तहत पति रामकिशन पर यह कानूनी जिम्मेदारी थी कि वह अपनी पत्नी की मौत के हालात के बारे में कोई ठोस, विश्वसनीय और संतोषजनक स्पष्टीकरण दे। उस समय पत्नी उसी की देखरेख में और उसके साथ ससुराल में मौजूद थी। इस कानूनी जिम्मेदारी को निभाने के बजाय, रामकिशन ने एक झूठी और मनगढ़ंत कहानी गढ़ी। उसने दावा किया कि शारीरिक संबंध बनाते समय विमलबाई को मिर्गी का दौरा पड़ा और चक्कर आ गए। हालांकि, मेडिकल सबूतों और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से यह दावा पूरी तरह से गलत साबित हो गया।"
अदालत ने 'त्रिमुख मारोती किरकान बनाम महाराष्ट्र राज्य (2006)' के अपने पिछले फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया:
“साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) की धारा 106 को देखते हुए, घर में मौजूद लोगों पर यह जिम्मेदारी होगी कि वे ठोस स्पष्टीकरण दें कि अपराध कैसे हुआ। घर में मौजूद लोग केवल चुप रहकर या कोई स्पष्टीकरण न देकर यह कहकर नहीं बच सकते कि अपना पक्ष साबित करने की पूरी जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष (Prosecution) की है और आरोपी का कोई स्पष्टीकरण देने का कोई कर्तव्य नहीं है।”
अदालत ने आगे कहा,
“अपीलकर्ता रामकिशन का कोई ठोस स्पष्टीकरण न दे पाना और साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 के तहत उस पर डाली गई जिम्मेदारी को पूरा न कर पाना, साथ ही एक झूठा बचाव (False Defence) पेश करना—ये सब मिलकर एक अतिरिक्त दोषी साबित करने वाली कड़ी (Incriminating Link) बनाते हैं। इससे परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (Circumstantial Evidence) की श्रृंखला पूरी हो जाती है, और इस तरह IPC की धारा 302 के तहत हत्या के अपराध के लिए उसका दोष साबित हो जाता है।”
अपीलकर्ता एविडेंस एक्ट की धारा 113B के तहत बनी कानूनी धारणा (Presumption) को गलत साबित करने में विफल रहे।
अदालत ने कहा,
“शिकायतकर्ता नारायण (PW-2) ने स्पष्ट शब्दों में गवाही दी कि दहेज की गैर-कानूनी मांगों को लेकर मृतक विमलबाई को लगातार परेशान किया जाता था और उसके साथ क्रूरता की जाती थी। उन्होंने बताया कि जब विमलबाई अपने मायके आती थी, तो वह बताती थी कि आरोपी उसे पीटते हैं, मानसिक रूप से प्रताड़ित करते हैं और भूखा रखते हैं। उसने एक बेहद डरावनी घटना का भी जिक्र किया, जिसमें आरोपियों ने उसे रस्सी से बांधकर एक कुएं में लटका दिया था और धमकी दी थी कि अगर उनकी मांगें पूरी नहीं की गईं, तो वे उसे मार डालेंगे। PW-2 के इस बयान की पुष्टि कई अन्य लोगों ने भी की है: शादी कराने वाले मध्यस्थ संभाजी तुरतवाड (PW-3); मृतक विमलबाई के पिता रामराव (PW-4), जिन्होंने लगातार की जा रही मांगों और शारीरिक दुर्व्यवहार की पुष्टि की; और विमलबाई के मायके के दो पड़ोसी, वैजनाथ संभाजी मरपतवार (PW-5) तथा महाजन मुंजाजी येम्बलवाड (PW-6)। इन पड़ोसियों ने भी अभियोजन पक्ष की इस बात का समर्थन किया कि दहेज की गैर-कानूनी मांगें पूरी न होने के कारण विमलबाई को लगातार परेशान किया जा रहा था। इसलिए, हमारी पक्की राय है कि आरोपी-अपीलकर्ता एविडेंस एक्ट की धारा 113-B के तहत बनी कानूनी धारणा को गलत साबित करने में विफल रहे हैं, और निचली अदालतों ने उन्हें सही तरीके से दोषी ठहराया।”
उपरोक्त के आधार पर अपील खारिज की गई, जिससे आरोपियों की दोषसिद्धि और उन्हें सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा बरकरार रही।
Case Title : RAMKISHAN DIGAMBAR JADHAV VERSUS THE STATE OF MAHARASHTRA

