RP Act | चुनाव याचिका याचिकाकर्ता को खुद पेश करनी चाहिए, वकील को नहीं: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
7 Oct 2026 7:39 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (7 अक्टूबर) को कहा कि 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951' (RP Act) के तहत दायर चुनाव याचिका खुद चुनाव याचिकाकर्ता को ही पेश करनी चाहिए। इस ज़रूरी नियम का पालन न करने पर याचिका खारिज की जा सकती है।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच ने मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें DMK विधायक एस. रेगुपथी के चुनाव को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी गई थी। रेगुपथी ने 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में तिरुमयम विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीता था। हाईकोर्ट ने पाया कि चुनाव याचिका याचिकाकर्ता ने नहीं, बल्कि उनके वकील ने दायर की थी।
कोर्ट ने जी.वी. श्रीरामा रेड्डी और अन्य बनाम रिटर्निंग ऑफिसर और अन्य मामले में 2009 के अपने फैसले का हवाला देते हुए कहा,
"...चुनाव याचिका एक गंभीर प्रक्रिया है, जिससे चुनावी प्रक्रिया रद्द हो सकती है, इसलिए चुनाव कानून में बताई गई प्रक्रिया का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता 'द्वारा' याचिका पेश करने की शर्त हाई कोर्ट को याचिका पेश करने के चरण में ही शुरुआती जांच करने में मदद करती है, ताकि यह पक्का किया जा सके कि कार्यवाही बेकार या परेशान करने वाली तो नहीं है।"
याचिकाकर्ता वी. पोन. पनीरसेल्वम, जो तिरुमयम सीट से उम्मीदवार थे, ने चुनाव को चुनौती दी थी। उन्होंने आरोप लगाया कि कानूनी 'फॉर्म 26' हलफनामे में अपनी पत्नी की संपत्ति और आय को छिपाने और गलत जानकारी देने के कारण अनुचित प्रभाव डालने जैसी भ्रष्ट प्रथा अपनाई गई।
मद्रास हाईकोर्ट ने चुनाव याचिका खारिज की थी, क्योंकि यह पाया गया कि इसे याचिकाकर्ता ने खुद पेश करने के बजाय उनके वकील ने पेश किया था। याचिकाकर्ता ने इस खारिज आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
विवादित निष्कर्षों में दखल देने से इनकार करते हुए जस्टिस मिश्रा द्वारा लिखे गए फैसले में RP Act की धारा 81 और 86 की जांच की गई। ये धाराएं क्रमशः चुनाव याचिका पेश करने की शर्तों और नियमों का पालन न करने के नतीजों के बारे में बताती हैं।
जीवी श्रीराम रेड्डी बनाम रिटर्निंग ऑफिसर मामले में अपने फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि धारा 81(1) में पाँच खास शर्तें हैं: याचिकाकर्ता को उम्मीदवार या वोटर होना चाहिए; याचिका खुद याचिकाकर्ता द्वारा पेश की जानी चाहिए; यह तय कानूनी आधारों पर आधारित होनी चाहिए; इसे हाई कोर्ट के सामने पेश किया जाना चाहिए; और इसे तय 45 दिनों की अवधि के भीतर दाखिल किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने ज़ोर दिया कि ये शर्तें सिर्फ़ प्रक्रिया से जुड़ी नहीं हैं।
कोर्ट ने कहा,
"इन शर्तों का महत्व RP Act, 1951 की धारा 86(1) से और भी साफ़ होता है, जिसमें यह ज़रूरी है कि हाईकोर्ट ऐसी किसी भी चुनाव याचिका को खारिज कर दे, जो एक्ट की धारा 81 के प्रावधानों का पालन नहीं करती। इसलिए धारा 81 के तहत याचिका पेश करने की शर्त को कानूनी प्रक्रिया से अलग कोई मामूली औपचारिकता नहीं माना जा सकता, क्योंकि इसका पालन चुनाव याचिका के स्वीकार्य होने से सीधे जुड़ा है और अगर इसमें कोई कमी रह जाती है, तो उसे ठीक नहीं किया जा सकेगा।"
कोर्ट ने धारा 81 के विधायी इतिहास पर भी ध्यान दिया, जहां शुरू में धारा 81(2) में साफ़ तौर पर इजाज़त थी कि चुनाव याचिका या तो याचिकाकर्ता खुद पेश करे या याचिकाकर्ता द्वारा लिखित रूप में अधिकृत कोई व्यक्ति पेश करे, साथ ही रजिस्टर्ड पोस्ट के ज़रिए भी इसे पेश किया जा सकता था।
हालांकि, रिप्रेजेंटेशन ऑफ़ द पीपल (संशोधन) एक्ट, 1966 द्वारा उस प्रावधान को हटा दिया गया, जिसमें अधिकृत व्यक्ति के ज़रिए याचिका पेश करने की कोई व्यवस्था नहीं थी।
कोर्ट ने कहा,
"जबकि पहले की धारा 81(2) में चुनाव याचिकाकर्ता द्वारा लिखित रूप में अधिकृत व्यक्ति और रजिस्टर्ड पोस्ट के ज़रिए याचिका पेश करने को साफ़ तौर पर मान्यता दी गई, लेकिन मौजूदा प्रावधान में याचिका पेश करने के ऐसे किसी भी तरीके को मान्यता नहीं दी गई।"
कोर्ट ने शिव सदन सिंह बनाम मोहन लाल गौतम (1969) के अपने पुराने फ़ैसले से भी अंतर स्पष्ट किया, जिसमें वकील के क्लर्क द्वारा याचिका पेश करने को नियमों का पर्याप्त पालन माना गया, क्योंकि याचिकाकर्ता खुद याचिका पेश करते समय क्लर्क के साथ मौजूद था।
हालांकि, मौजूदा याचिकाकर्ता ने यह दावा नहीं किया कि चुनाव याचिका पेश करते समय वह अपने वकील के साथ मौजूद था। इसके अनुसार, कोर्ट ने माना कि धारा 81 के तहत ज़रूरी शर्त पूरी नहीं की गई।
नतीजतन, याचिका खारिज कर दी गई।
Case Title : V. PON. PANEERSELVAM VERSUS S. REGUPATHY AND OTHERS

