सेंट्रल इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल में नियुक्त रिटायर्ड जज दूसरे ट्रिब्यूनल सदस्यों के बराबर वेतन की मांग नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

13 Aug 2026 4:30 PM IST

  • सेंट्रल इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल में नियुक्त रिटायर्ड जज दूसरे ट्रिब्यूनल सदस्यों के बराबर वेतन की मांग नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (12 अगस्त) को पूर्व न्यायिक अधिकारियों की रिट याचिका खारिज की। इन अधिकारियों को केंद्र सरकार के इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल-सह-लेबर कोर्ट में पीठासीन अधिकारी (Presiding Officers) के तौर पर फिर से नौकरी पर रखा गया था। उन्होंने छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के तहत अन्य राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल के अधिकारियों के बराबर वेतनमान की मांग की थी।

    जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने जस्टिस ई. पद्मनाभन कमेटी के अनुसार याचिकाकर्ताओं के लिए जिला न्यायपालिका के अधिकारियों का बराबर वेतनमान सही ठहराया।

    कोर्ट ने कहा,

    "फिर से नौकरी पर रखे गए वर्ग को वेतनमान लागू करने के मकसद से उचित और तर्कसंगत रूप से अलग श्रेणी में रखा जा सकता है, जो अन्य वर्गों के बराबर या एक ही स्तर पर न हो।"

    कोर्ट ने आगे कहा,

    "फिर से नौकरी पर रखे जाने के बाद, ये अधिकारी/व्यक्ति सरकार की सेवा में नियमित अधिकारियों के वर्ग के समान नहीं रह जाते हैं।"

    याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि CGIT-सह-LC (सेंट्रल गवर्नमेंट इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल-सह-लेबर कोर्ट) अन्य केंद्रीय ट्रिब्यूनल, जैसे सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल और इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल के समान स्तर पर हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ने ऐसे कई ट्रिब्यूनल के अधिकारियों के लिए छठे वेतन आयोग की सिफारिशें मान ली थीं, लेकिन CGIT के पीठासीन अधिकारियों को जिला जजों से जुड़े वेतनमान में रखा गया। उनके अनुसार, यह असमान वर्गों के साथ समान व्यवहार करने जैसा था और समानता की संवैधानिक गारंटी का उल्लंघन है।

    केंद्र सरकार ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता रिटायरमेंट के बाद फिर से नौकरी कर रहे है और उनके वेतन का निर्धारण 'सेंट्रल सिविल सर्विसेज (फिक्सेशन ऑफ पे ऑफ री-एम्प्लॉयड पेंशनर्स) ऑर्डर्स, 1986' के तहत किया गया। सरकार ने यह भी कहा कि CGIT पीठासीन अधिकारियों के वेतन ढांचे में न्यायिक वेतन आयोग की सिफारिशों - जिसमें शेट्टी कमीशन और जस्टिस E. पद्मनाभन कमेटी की सिफारिशें शामिल हैं - के आधार पर बदलाव किया गया।

    सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि वेतन निर्धारण और पदों का वर्गीकरण मुख्य रूप से एग्जीक्यूटिव (कार्यपालिका) और एक्सपर्ट बॉडीज़ (विशेषज्ञ निकायों) का काम है, और ऐसे मामलों में न्यायिक दखल सीमित है। बेंच ने आगे कहा कि रिटायरमेंट के बाद फिर से नौकरी पाने वाले अधिकारी नियमित सरकारी कर्मचारियों के समान वर्ग का हिस्सा नहीं रहते हैं।

    कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की उस चुनौती को भी खारिज किया, जिसमें CGIT-cum-LC के पीठासीन अधिकारियों (Presiding Officers) के वेतन को जिला न्यायपालिका (District Judiciary) के बराबर करने के फैसले पर सवाल उठाया गया था। हालांकि, इसमें मुंबई और कोलकाता में काम करने वाले नेशनल ट्रिब्यूनल के पीठासीन अधिकारियों को शामिल नहीं किया गया।

    कोर्ट ने इस वर्गीकरण को उचित माना और कहा कि यह वेतन-समानता शेट्टी कमीशन और जस्टिस ई. पद्मनाभन कमेटी जैसी विशेषज्ञ संस्थाओं की सिफारिशों पर आधारित है।

    नतीजतन, याचिका खारिज की गई।

    Cause Title: R.K. YADAV & ANR. VERSUS UNION OF INDIA AND OTHERS

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