'रीच स्टैकर' MV Act के तहत 'मोटर वाहन' नहीं, दुर्घटना का शिकार व्यक्ति MACT में नहीं जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

30 July 2026 7:59 PM IST

  • रीच स्टैकर MV Act के तहत मोटर वाहन नहीं, दुर्घटना का शिकार व्यक्ति MACT में नहीं जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 'रीच स्टैकर' - जो इनलैंड कंटेनर डिपो (ICD) के अंदर कंटेनर संभालने वाली एक भारी मशीन है - मोटर वाहन अधिनियम, 1988 (MV Act) के तहत "मोटर वाहन" नहीं है। इसलिए ऐसी मशीन से जुड़ी दुर्घटना के मामले में मुआवज़े का दावा मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) के समक्ष नहीं किया जा सकता।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कंटेनर कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड (CONCOR) की अपील मंज़ूरी की और MACT के उस आदेश को बहाल किया, जिसमें दुर्घटना के शिकार व्यक्ति द्वारा दायर मुआवज़े के दावे को खारिज कर दिया गया था।

    यह मामला नई दिल्ली के तुगलकाबाद स्थित इनलैंड कंटेनर डिपो में हुई दुर्घटना से जुड़ा है, जहां सितंबर 2013 में एक रीच स्टैकर ने दावा करने वाले व्यक्ति को कुचल दिया, जिससे उसे गंभीर चोटें आईं और उसका दाहिना पैर काटना पड़ा। उसने मोटर वाहन अधिनियम की धारा 166 के तहत ₹75 लाख के मुआवज़े की मांग की। जहां MACT ने माना कि दावा स्वीकार्य नहीं है, वहीं दिल्ली हाईकोर्ट ने उस फैसले को पलटते हुए कहा कि रीच स्टैकर एक मोटर वाहन है। अब सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया।

    कोर्ट ने इस बात की जांच की कि क्या रीच स्टैकर मोटर वाहन अधिनियम की धारा 2(28) के तहत "मोटर वाहन" की परिभाषा में आता है या नहीं। कोर्ट ने पाया कि हालांकि यह मशीन यांत्रिक रूप से चलती है और पहियों पर चलती है, लेकिन अधिनियम स्पष्ट रूप से "किसी फैक्ट्री या किसी अन्य बंद परिसर में उपयोग के लिए विशेष रूप से बनाए गए वाहन" को इससे बाहर रखता है।

    बेंच ने माना कि ICD एक बंद कस्टम-बॉन्डेड क्षेत्र है, जहां केवल अधिकृत व्यक्तियों की ही पहुँच होती है। इसलिए यह अधिनियम की धारा 2(34) के तहत "सार्वजनिक स्थान" की श्रेणी में नहीं आता है।

    कोर्ट ने कहा,

    "चूंकि ICD एक कस्टम-बॉन्डेड क्षेत्र है... यहां केवल सक्षम प्राधिकारी द्वारा विधिवत अधिकृत व्यक्तियों की ही पहुंच होती है... ICD के भीतर की सड़कें... MVA की धारा 2(34) के तहत परिभाषित 'सार्वजनिक स्थान' नहीं हैं।"

    कोर्ट ने यह भी पाया कि रीच स्टैकर को विशेष रूप से ऐसी बंद सुविधाओं के भीतर कंटेनर संभालने के लिए डिज़ाइन किया गया और इसे सामान्य सड़क उपयोग के लिए नहीं बनाया गया। कोर्ट ने गौर किया कि बिना सामान के भी इस मशीन का वज़न 70 टन से ज़्यादा है, यह सार्वजनिक सड़कों के लिए तय अधिकतम वज़न सीमा से ज़्यादा है, इसे अलग-अलग हिस्सों में ले जाया जाता है और इसमें आम सड़क वाहनों के लिए ज़रूरी सुरक्षा फ़ीचर नहीं होते हैं।

    इस तर्क को खारिज करते हुए कि सिर्फ़ रबर के टायर होने से ही मशीन सड़क पर इस्तेमाल के लायक हो जाती है, कोर्ट ने कहा:

    "सिर्फ़ इसलिए कि किसी वाहन में रबर के टायर हैं और वह चेसिस पर है, उसे सार्वजनिक सड़कों के लिए उपयुक्त मान लेना पूरी स्थिति को बहुत सरलता से देखने जैसा होगा।"

    बेंच ने यह भी कहा कि ICD के अंदर खास तौर पर मज़बूत आंतरिक सड़कें 'रीच स्टैकर्स' का वज़न सहने के लिए बनाई जाती हैं, जिससे यह बात और पुख्ता होती है कि ऐसी मशीनें सिर्फ़ बंद परिसर के अंदर इस्तेमाल के लिए होती हैं।

    कोर्ट ने 'अल्ट्राटेक सीमेंट लिमिटेड बनाम गुजरात राज्य 2026 LiveLaw (SC) 27' मामले में अपने हालिया फ़ैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि खास मक़सद वाले निर्माण उपकरण जो सिर्फ़ बंद परिसर के अंदर इस्तेमाल होते हैं, वे धारा 2(28) के अपवाद वाले हिस्से में आते हैं, भले ही उनमें मोटर वाहन की खूबियां हों।

    फ़ैसले में हैदराबाद के क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकरण (RTA) द्वारा जारी नोटिफ़िकेशन का भी ज़िक्र किया गया, जिसमें कहा गया कि 'रीच स्टैकर्स' मोटर वाहन नहीं हैं, इसलिए उन्हें मोटर वाहन अधिनियम की धारा 39 के तहत रजिस्ट्रेशन की ज़रूरत नहीं है।

    अपने फ़ैसले का दायरा स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने कहा कि ICD को "सार्वजनिक स्थान" न मानने के उसके निष्कर्ष का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि ICD के अंदर चलने वाले आम सड़क वाहनों से होने वाली दुर्घटनाओं में पीड़ितों को मुआवज़ा न मिले।

    बेंच ने कहा,

    "हालांकि, अगर ICD की चारदीवारी के अंदर किसी 'सामान्य' वाहन (जो आम तौर पर सड़कों पर चलता है) के साथ कोई अप्रिय घटना होती है तो इससे MVA के तहत मुआवज़ा मांगने के दावेदार के अधिकार पर कोई रोक नहीं लगनी चाहिए।"

    इसके अनुसार, कोर्ट ने मुआवज़े का दावा खारिज करने वाला MACT का आदेश बहाल कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने निर्देश दिया कि दावेदार को पहले से दी गई कोई भी रकम वापस नहीं ली जानी चाहिए।

    Case : Container Corporation of India Ltd v Rishi Ranjan Mishra

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