दोबारा नौकरी पर रखे गए अधिकारियों को रेगुलर अधिकारियों से अलग माना जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

15 Aug 2026 10:59 AM IST

  • दोबारा नौकरी पर रखे गए अधिकारियों को रेगुलर अधिकारियों से अलग माना जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिटायरमेंट के बाद दोबारा नौकरी पर रखे गए सरकारी अधिकारियों को वेतन तय करने के मकसद से रेगुलर सरकारी कर्मचारियों से अलग श्रेणी (णlass) माना जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि ऐसा वर्गीकरण संविधान के आर्टिकल 14 और 16 के तहत समानता की गारंटी का उल्लंघन नहीं करता।

    जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने सेंट्रल गवर्नमेंट इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल-कम-लेबर कोर्ट (CGIT-कम-LCs) के पीठासीन अधिकारियों (Presiding Officers) की याचिका खारिज करते हुए यह बात कही। इन अधिकारियों ने छठे केंद्रीय वेतन आयोग (6th Central Pay Commission) के वेतनमान का लाभ मांगा।

    कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि रिटायरमेंट के बाद सरकारी सेवा में लौटने वाला अधिकारी रेगुलर सरकारी कर्मचारी वाली एक जैसी श्रेणी (Homogeneous Class) का हिस्सा नहीं रहता है। फैसले के मुताबिक, दोबारा नौकरी पर रखे गए अधिकारियों और रेगुलर सरकारी अधिकारियों के बीच "काफी अंतर" होता है, जिससे सरकार उनके वेतन और सेवा की शर्तें तय करते समय उन्हें अलग श्रेणी में रख सकती है।

    कोर्ट ने कहा,

    "दोबारा नौकरी पर रखे गए लोगों की श्रेणी को वेतनमान लागू करने के मकसद से उचित और तर्कसंगत रूप से अलग श्रेणी में रखा जा सकता है, जो दूसरी श्रेणियों के बराबर या एक ही स्तर पर नहीं हो सकते हैं।"

    कोर्ट ने कहा,

    "दोबारा नौकरी मिलने पर, ये अधिकारी/लोग सरकार की सेवा में मौजूद रेगुलर अधिकारियों की श्रेणी के समान नहीं रह जाते हैं। रिटायरमेंट के बाद दोबारा नौकरी पर रखे गए अधिकारी/लोग एक अलग श्रेणी में आते हैं। छठे वेतन आयोग के वेतनमान का लाभ पाने का उनका दावा मौलिक अधिकारों या किसी अन्य आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता है। उन्हें रेगुलर काम करने वालों से अलग श्रेणी में रखना और जिला न्यायपालिका (District Judiciary) के बराबर मानना ​​संविधान के आर्टिकल 14 के सिद्धांतों या आर्टिकल 16 की ज़रूरतों का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता है।"

    यह फैसला CGIT-कम-LCs के दो पीठासीन अधिकारियों की चुनौती के बाद आया। उन्होंने तर्क दिया कि उन्हें छठे वेतन आयोग के वे लाभ नहीं दिए गए जो अन्य केंद्रीय ट्रिब्यूनल के अधिकारियों को दिए गए। इसके बजाय शेट्टी आयोग और जस्टिस ई. पद्मनाभन समिति की सिफारिशों के बाद उनके वेतन को जिला न्यायपालिका पर लागू वेतनमान से जोड़ दिया गया।

    याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि दूसरे ट्रिब्यूनल के अधिकारियों की तुलना में उनके साथ अलग व्यवहार करना मनमाना भेदभाव है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है। हालांकि, केंद्र सरकार ने बताया कि याचिकाकर्ता रिटायरमेंट के बाद दोबारा नौकरी (री-एम्प्लॉयमेंट) कर रहे थे और उनकी सैलरी तय करने का काम 'सेंट्रल सिविल सर्विसेज (री-एम्प्लॉयड पेंशनर्स की सैलरी तय करने के आदेश) 1986' के तहत होता है।

    सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के इस अंतर को माना। कोर्ट ने कहा कि दोबारा नौकरी करने वाले पेंशनभोगियों की सैलरी तय करने के नियम एक खास स्कीम के तहत आते हैं। इन नियमों के अनुसार, दोबारा नौकरी करने वाले पेंशनभोगी उस पद की तय सैलरी पाते हैं जिस पर उन्हें दोबारा नियुक्त किया गया है, न कि उस पद की सैलरी जो वे रिटायरमेंट से पहले पाते थे।

    बेंच ने यह भी दोहराया कि सैलरी तय करना मुख्य रूप से एग्जीक्यूटिव (कार्यपालिका) का काम है। पदों के वर्गीकरण और सैलरी स्केल तय करने के फैसलों में दखल देने का कोर्ट के पास सीमित अधिकार है, खासकर तब जब सरकार ने एक्सपर्ट कमेटियों की सलाह ली हो और कोई साफ गड़बड़ी या मनमानी न दिख रही हो।

    इन सिद्धांतों को लागू करते हुए कोर्ट ने कहा कि नियमित रूप से काम करने वाले अधिकारियों से अलग, दोबारा नौकरी करने वाले अधिकारियों का वर्गीकरण एक तार्किक और समझ में आने वाले अंतर पर आधारित था। इस वर्गीकरण से अलग-अलग सैलरी स्ट्रक्चर बनने का मतलब यह नहीं है कि यह व्यवस्था असंवैधानिक है।

    कोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज किया कि CGIT के पीठासीन अधिकारियों (Presiding Officers) की तुलना गलत तरीके से जिला न्यायपालिका से की गई। कोर्ट ने इस व्यवस्था को उचित माना और कहा कि सैलरी स्केल एक्सपर्ट कमेटियों - जिनमें शेट्टी कमीशन और जस्टिस ई. पद्मनाभन कमेटी शामिल हैं - की सिफारिशों के आधार पर तय किए गए।

    फैसले से यह साफ हो गया कि समानता की संवैधानिक गारंटी का मतलब यह नहीं है कि काफी अलग-अलग पदों पर काम करने वाले लोगों के साथ एक जैसा व्यवहार किया जाए। कोर्ट ने कहा कि दोबारा नौकरी करने वाले अधिकारी एक अलग कैटेगरी में आते हैं, क्योंकि उनका स्टेटस और उनकी नियुक्ति व सैलरी से जुड़े नियम नियमित सरकारी कर्मचारियों से अलग होते हैं।

    यह मानते हुए कि याचिकाकर्ताओं के पास मौलिक अधिकार के तौर पर छठे वेतन आयोग के स्केल की मांग करने का कोई आधार नहीं था, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को बिना किसी ठोस आधार के खारिज किया।

    Cause Title: R.K. YADAV & ANR. VERSUS UNION OF INDIA AND OTHERS

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