यस बैंक जब चुपके से अपना कामकाज चला रहा था, तब RBI सिर्फ मूक दर्शक बना रहा: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
16 Oct 2026 10:39 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक खामियों का खामियाजा निवेशकों को भुगतने के लिए मजबूर करना "बेहद अनुचित" होगा। ऐसा तब हुआ है जब भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने कथित तौर पर यस बैंक के 'कॉमन इक्विटी टियर 1' (CET1) अनुपात को 0.6% तक गिरने दिया, जबकि बैंक के कामकाज में पहले से ही गड़बड़ियां देखी जा रही थीं।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने ₹8,415 करोड़ मूल्य के 'एडिशनल टियर 1' (AT-1) बॉन्ड को राइट-डाउन (मूल्य शून्य या कम करना) करने का फैसला रद्द करते हुए कहा,
"RBI सिर्फ एक मूक दर्शक बना रहा और उसने यस बैंक के CET1 अनुपात को 0.6% के बेहद निचले स्तर तक गिरने दिया, जबकि बैंक अपना कामकाज चुपके से चला रहा था। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यस बैंक के कामकाज में गंभीर गड़बड़ियां बहुत पहले ही पकड़ में आ गई थीं; बैंक के कर्मचारियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही भी शुरू की गई। लेकिन, प्रशासनिक खामियों का नुकसान निवेशकों पर डालना पूरी तरह से अनुचित होगा।"
कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा और कहा कि अंतिम पुनर्गठन योजना (Reconstruction Scheme) लागू होने के बाद यस बैंक के प्रशासक (Administrator) के पास बॉन्ड को राइट-डाउन करने का अधिकार नहीं है।
कोर्ट ने कहा,
"BR Act के तहत नियुक्त प्रशासक को कानून द्वारा दी गई शक्तियों के दायरे में रहकर ही काम करना होता है। वह कंपनी को कुशलतापूर्वक चलाने के लिए 'बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स' की जगह काम करता है। यदि प्रशासक अपनी शक्तियों के दायरे से बाहर जाकर कोई काम करता है तो वह पूरी तरह से अवैध और शून्य (Void) माना जाएगा।"
कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि यह नहीं कहा जा सकता कि प्रशासक ने उन शक्तियों का इस्तेमाल किया है जो असल में RBI को दी गई थीं।
यस बैंक का बॉन्ड राइट-डाउन, 'बेसल III कैपिटल रेगुलेशंस' पर RBI के मास्टर सर्कुलर के खिलाफ है।
कोर्ट ने गौर किया कि यस बैंक के कामकाज में गंभीर गड़बड़ियां बहुत पहले ही सामने आ गईं और बैंक के कर्मचारियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही भी शुरू हो चुकी थी। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक विफलताओं का खामियाजा निवेशकों को नहीं भुगतना पड़ना चाहिए। हालांकि, पुनर्निर्माण योजना के ड्राफ्ट में AT-1 बॉन्ड को स्थायी रूप से राइट-डाउन (मूल्य कम करने) का स्पष्ट प्रावधान है, लेकिन 13 मार्च 2020 को जारी अंतिम योजना से इस क्लॉज़ को हटा दिया गया। इसके बावजूद, अगले ही दिन एडमिनिस्ट्रेटर ने बॉन्ड को राइट-डाउन कर दिया, जिससे निवेशकों के दावे खत्म हो गए।
बेसल III कैपिटल रेगुलेशन पर RBI के मास्टर सर्कुलर की व्याख्या करते हुए कोर्ट ने कहा कि 'पॉइंट-ऑफ-नॉन-वायबिलिटी' ट्रिगर सक्रिय होने पर जो कन्वर्ज़न या राइट-डाउन होना था, वह पुनर्निर्माण योजना लागू होने से पहले ही हो जाना चाहिए।
कोर्ट ने कहा,
"सवाल यह नहीं है कि AT-1 बॉन्ड को राइट-डाउन किया जा सकता था या किया जाना चाहिए। सवाल उस तरीके का है जिस तरह से यह किया गया - जो मास्टर सर्कुलर और इंफॉर्मेशन मेमोरंडा के नियमों के खिलाफ था... RBI, एडमिनिस्ट्रेटर और यस बैंक - इन तीनों ने मिलकर 8,514 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के बॉन्ड से जुड़े पूरे मामले को जिस तरह से संभाला, वह काफी संदिग्ध है। निवेशकों को इस तरह के अनावश्यक जोखिम में डालने से बचा जा सकता था। AT-1 बॉन्ड का मुख्य उद्देश्य बैंक को पूरी तरह से बर्बाद होने से बचाना है; यह एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। अगर RBI और यस बैंक ने मास्टर सर्कुलर की शर्तों के अनुसार काम किया होता, तो यह उद्देश्य पूरा हो सकता था।"
व्यक्तिगत निवेशकों को हाई-रिस्क AT-1 बॉन्ड बेचने पर सवाल
जस्टिस दत्ता द्वारा लिखे गए फैसले में यस बैंक द्वारा व्यक्तिगत निवेशकों को AT-1 बॉन्ड बेचने की प्रथा पर भी चिंता जताई गई। RBI के रेगुलेटरी फ्रेमवर्क के अनुसार, इस तरह के हाई-रिस्क वाले फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट केवल इंस्टीट्यूशनल (संस्थागत) निवेशकों को ही बेचे जाने चाहिए।
कोर्ट ने कहा,
"हमने पाया कि यस बैंक ने न केवल इसकी अनुमति दी, बल्कि मास्टर सर्कुलर का उल्लंघन करते हुए खुद सक्रिय रूप से व्यक्तिगत निवेशकों को ये बॉन्ड बेचे।"
कोर्ट ने गौर किया कि भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने अपने हलफनामे में कहा था कि BSE और NSE प्लेटफॉर्म पर ट्रेड होने वाले बॉन्ड, SEBI के नियमों का पालन करते हैं। SEBI ने एक प्राइवेट वेल्थ मैनेजमेंट फर्म और यस बैंक के तत्कालीन मैनेजिंग डायरेक्टर पर जुर्माना भी लगाया, क्योंकि उन्होंने व्यक्तिगत निवेशकों को ये बॉन्ड बेचने में मदद की थी। हालांकि, कोर्ट ने बताया कि यस बैंक द्वारा व्यक्तिगत निवेशकों को सीधे तौर पर बेचे गए बॉन्ड, सेबी (SEBI) के नियमों के दायरे में नहीं आते हैं।
कोर्ट ने 28 दिसंबर 2016 के एक ईमेल का भी जिक्र किया, जिसे मामले से जुड़े एक व्यक्ति (Party-in-Person) ने रिकॉर्ड पर रखा था। ऐसा लगता है कि यह ईमेल चेन्नई में यस बैंक के सीनियर मैनेजर–फाइनेंशियल एडवाइजर द्वारा भेजा गया था, जिसमें व्यक्तिगत निवेशकों को बॉन्ड खरीदने का प्रस्ताव दिया गया।
यह देखते हुए कि बैंकों को पहले भी व्यक्तिगत निवेशकों को बिना पर्याप्त जोखिम बताए (Risk Disclosures के बिना) ऐसे वित्तीय साधन बेचने के लिए रेगुलेटरी कार्रवाई का सामना करना पड़ा है, कोर्ट ने कहा:
“व्यक्तिगत निवेशकों को इतनी अधिक जोखिम वाली प्रतिभूतियों (Securities) की ओर आकर्षित करने से पहले, कहीं अधिक सख्ती से जांच-पड़ताल की जानी चाहिए थी।”
उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए, अपील खारिज कर दी गई।
Case Title : YES BANK LIMITED & ANR.VERSUS AXIS TRUSTEE SERVICES LIMITED & ORS. (with connected cases)

