पुणे पोर्शे केस | नाबालिग चालक के पिता की जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस
Praveen Mishra
26 Feb 2026 2:17 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने आज पुणे के 19 मई 2024 के पोर्शे कार हादसे से जुड़े मामले में नाबालिग चालक के पिता विशाल अग्रवाल की जमानत याचिका पर नोटिस जारी किया। इस हादसे में दो लोगों की मौत हुई थी। विशाल अग्रवाल पर आरोप है कि उन्होंने रक्त नमूनों की अदला-बदली कर साजिश रची, ताकि कार में सवार लोगों की शराब जांच रिपोर्ट “शून्य (Nil Alcohol)” दिखाई जा सके।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई 3 मार्च 2026 के लिए निर्धारित की। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने बताया कि विशाल अग्रवाल पिछले 21 महीनों से हिरासत में हैं और अंतरिम जमानत की मांग की, लेकिन अदालत ने आज अंतरिम जमानत देने से इनकार कर दिया।
पृष्ठभूमि
यह याचिका बॉम्बे हाईकोर्ट के 16 दिसंबर 2025 के उस निर्णय को चुनौती देती है, जिसमें उनकी और अन्य सह-आरोपियों की जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। यह मामला पुणे के येरवडा पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर से संबंधित है।
अभियोजन के अनुसार 19 मई 2024 को तड़के करीब 2:10 बजे नाबालिग आरोपी एयरपोर्ट रोड स्थित कल्याणी नगर क्षेत्र में पोर्शे कार चला रहा था, जिसने पीछे से एक मोटरसाइकिल को टक्कर मार दी। मोटरसाइकिल सवार अनिस आवधिया और अश्विनी कोष्ठा की मौके पर ही मौत हो गई।
प्रारंभिक एफआईआर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 304A, 279, 337, 338 और 427 तथा मोटर वाहन अधिनियम के प्रावधानों के तहत दर्ज की गई थी। बाद में IPC की धारा 304 सहित अन्य गंभीर धाराएं भी जोड़ी गईं।
साक्ष्य से छेड़छाड़ की साजिश का आरोप
अभियोजन का आरोप है कि हादसे के तुरंत बाद सबूत मिटाने और नाबालिग तथा उसके दोस्तों को बचाने के लिए “शून्य अल्कोहल” रिपोर्ट हासिल करने की साजिश रची गई। बताया गया कि ससून अस्पताल में नाबालिग और अन्य व्यक्तियों के रक्त नमूने बदलकर शिवानी अग्रवाल, आशीष मित्तल और आदित्य सूद के नमूनों से बदल दिए गए तथा मेडिकल रिकॉर्ड में गलत प्रविष्टियां की गईं।
इसके आधार पर IPC की धाराएं 304, 120-B (आपराधिक साजिश), 201 (सबूत नष्ट करना), 213, 214, 466, 467, 468, 471, 109 तथा धारा 34 के साथ-साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराएं 7, 7-A, 8, 12 और 13 तथा मोटर वाहन अधिनियम के प्रावधान लागू किए गए।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा था कि विशाल अग्रवाल स्वयं दुर्घटना के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराए जा सकते, क्योंकि हादसा उनकी अनुपस्थिति में हुआ और उन्हें यह भी जानकारी नहीं थी कि नाबालिग ने वाहन कैसे चलाया।
हालांकि अदालत ने यह भी पाया कि प्रथम दृष्टया यह मजबूत मामला है कि उन्होंने अन्य आरोपियों के साथ मिलकर साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने, मेडिकल रिकॉर्ड फर्जी बनाने और दस्तावेजों में हेरफेर कर नाबालिग को IPC की धारा 304 के तहत संभावित दंड से बचाने की साजिश रची। अदालत ने यह भी माना कि आरोपियों की आर्थिक स्थिति और प्रभाव के कारण गवाहों को प्रभावित करने की आशंका है, इसलिए जमानत देने से इनकार किया गया।
सह-आरोपियों को जमानत
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में तीन सह-आरोपियों — आशीष सतीश मित्तल, आदित्य अविनाश सूद और अमर संतोष गायकवाड़ — को जमानत दी थी। अदालत ने नोट किया कि वे लगभग 18 महीनों से जेल में थे। इन पर आरोप है कि उन्होंने कार में पीछे बैठे नाबालिगों के रक्त नमूनों को अपने नमूनों से बदल दिया था। उनके खिलाफ जालसाजी, सबूत से छेड़छाड़ और रिश्वत से संबंधित धाराएं लगाई गई हैं।
जमानत देते समय जस्टीस नागरत्ना ने अभिभावकों की जिम्मेदारी को लेकर कड़ी मौखिक टिप्पणियां भी की थीं।

