प्रक्रिया का उल्लंघन ज़ब्ती को अमान्य नहीं करेगा, लेकिन सबूत की अहमियत पर असर डाल सकता है: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
8 Oct 2026 8:32 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (8 अक्टूबर) को कहा कि आरोपी द्वारा अपनी जगह से की गई ज़ब्ती के बारे में कोई स्पष्टीकरण न दे पाना उसके खिलाफ दोषी होने का सबूत नहीं माना जा सकता, और ज़ब्ती के सही होने का सबूत देने की ज़िम्मेदारी अभियोजन पक्ष की ही रहती है।
जस्टिस उज्ज्वल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने उस मामले की सुनवाई की, जिसमें बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने आपराधिक विश्वासघात (IPC की धारा 409 के तहत) के कथित अपराध में आरोपी के बरी होने का फैसला पलट दिया था। हाईकोर्ट ने उसके घर से ज़ब्त किए गए दस्तावेज़ों को सही माना, जबकि ये ज़ब्ती CrPC की धारा 100 का उल्लंघन करके की गई- खासकर इसलिए क्योंकि अभियोजन पक्ष ने ज़ब्त की गई चीज़ों की सूची आरोपी को नहीं दी थी और पंच गवाह अपने बयान से मुकर गए।
शुरुआत में, ट्रायल कोर्ट ने पाया कि तलाशी और ज़ब्ती के दौरान CrPC की धारा 100(7) में बताई गई प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। हालांकि, हाईकोर्ट ने ज़ब्ती को सही मानने के लिए बिना किसी अतिरिक्त पुष्टि के जांच अधिकारी (IO) के बयान पर भरोसा किया। इसके अलावा, हाईकोर्ट ने कहा कि ज़ब्ती पंचनामा पर अपीलकर्ता के हस्ताक्षर न होना कोई बड़ी बात नहीं है और IO के बयान पर भरोसा किया। कोर्ट ने तर्क दिया कि पुलिस अधिकारी के पास ज़ब्ती के बारे में झूठा बयान देने का कोई कारण नहीं था।
हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए जस्टिस चंदुरकर द्वारा लिखे गए फैसले में ज़ब्ती की प्रक्रिया को सही मानने से इनकार कर दिया गया। इसमें कहा गया कि "कोड की धारा 100(4) और 100(7) की ज़रूरतों का पालन न करने के कारण उनका उल्लंघन हुआ था।"
कोर्ट ने कहा,
"ऐसी स्थिति में केवल IO के बयान के आधार पर, बिना किसी अतिरिक्त पुष्टि के, ज़ब्ती को सही साबित नहीं माना जा सकता। IO ने इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया कि अपीलकर्ता के घर से ज़ब्त की गई चीज़ों की सूची उसे क्यों नहीं दी गई।"
कोर्ट ने खास तौर पर हाईकोर्ट का वह नज़रिए खारिज कर दिया, जिसमें ज़ब्त किए गए दस्तावेज़ों को दोषी ठहराने वाला सबूत माना गया और अपील करने वाले से उनके बारे में सफाई मांगी गई।
कोर्ट ने कहा,
"इसलिए हमें लगता है कि हाईकोर्ट ने उन चीज़ों की ज़ब्ती पर भरोसा करके और यह मानकर गलती की कि यह अपील करने वाले के खिलाफ दोषी ठहराने वाला सबूत था, जिसके लिए उसने कोई सफाई नहीं दी थी। चीज़ों की सही ज़ब्ती साबित करने की ज़िम्मेदारी अभियोजन पक्ष की थी, लेकिन वह कानून के मुताबिक इसे साबित करने में नाकाम रहा।"
कोर्ट ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट ने कथित ज़ब्ती पर भरोसा करके और फिर दस्तावेज़ों के बारे में सफाई न दे पाने पर अपील करने वाले के खिलाफ़ नतीजा निकालकर गलती की।
CrPC की धारा 100 का पालन न करना अपने आप में ज़ब्ती रद्द नहीं करता, लेकिन सबूत की अहमियत पर असर डाल सकता है।
फिर भी कोर्ट ने साफ किया कि CrPC की धारा 100 के हर उल्लंघन से तलाशी या ज़ब्ती अपने आप अमान्य नहीं हो जाती।
कोर्ट ने कहा,
"कोड की धारा 100 की ज़रूरतों का पालन न करने से ज़ब्ती अपने आप रद्द नहीं होगी और इसे जांच में एक अनियमितता माना जाएगा।"
कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि इस उल्लंघन पर उन दूसरे कारकों के साथ मिलकर विचार किया जाना चाहिए, जो अभियोजन पक्ष के मामले पर शक पैदा करते हैं; ऐसा करने पर यह अपील करने वाले के पक्ष में जाएगा।
चूंकि ज़ब्ती के दो गवाहों ने अभियोजन पक्ष का समर्थन नहीं किया, खुद जांच अधिकारी (IO) ने कई कमियां मानीं और अभियोजन पक्ष के दस्तावेज़ी मामले में भी कई गंभीर कमियां थीं, इसलिए कोर्ट ने ज़ब्ती के आधार पर सज़ा को बरकरार रखने से इनकार कर दिया।
कोर्ट ने कहा,
"यह सच है कि कोड की धारा 100 की ज़रूरतों का पालन न करने से ज़ब्ती अपने आप रद्द नहीं होगी और इसे जांच में एक अनियमितता माना जाएगा। हालांकि, जब इस कारक पर उन दूसरे कारकों के साथ मिलकर विचार किया जाता है, जो अभियोजन पक्ष के मामले पर शक पैदा करते हैं, तो यह अपील करने वाले के पक्ष में जाता है, खासकर बरी किए जाने के खिलाफ़ अपील में।"
यह देखते हुए कि अभियोजन पक्ष संपत्ति सौंपे जाने और बेईमानी की नीयत - जो IPC की धारा 409 के तहत अपराध के लिए ज़रूरी तत्व थे - दोनों को साबित करने में नाकाम रहा, कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के बरी करने के फैसले को बहाल कर दिया। नतीजतन, अपील मंज़ूर कर ली गई।
Case Title : RAMKRUSHNA PRAHLLAD DONGARDIVE VERSUS THE STATE OF MAHARASHTRA

