पेंशन के फ़ायदों के लिए रेगुलर होने से पहले की सर्विस को भी गिना जाना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

9 Sept 2026 9:30 AM IST

  • पेंशन के फ़ायदों के लिए रेगुलर होने से पहले की सर्विस को भी गिना जाना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रेगुलर होने से पहले कॉन्ट्रैक्ट, एड-हॉक, डेली-वेज़ या वर्क-चार्ज के आधार पर कर्मचारियों द्वारा की गई सर्विस को रिटायरमेंट और पेंशन के फ़ायदों के लिए 'क्वालिफ़ाइंग सर्विस' (पात्र सेवा) के तौर पर गिना जाना चाहिए। ऐसा तब और भी ज़रूरी है जब सर्विस में आया गैप सिर्फ़ कागज़ी या बनावटी हो, या प्रशासनिक हालात या कोर्ट के आदेशों की वजह से हुआ हो।

    जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच ने पंजाब स्कूल एजुकेशन बोर्ड (PSEB) की अपील खारिज करते हुए पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट का फ़ैसला सही ठहराया। हाईकोर्ट ने राज्य को उन कर्मचारियों को पेंशन के फ़ायदे देने का निर्देश दिया, जिन्होंने 1990 के दशक में नौकरी शुरू की थी और अगस्त 2004 में रेगुलर हुए। कोर्ट ने कहा कि राज्य उन्हें सिर्फ़ इसलिए नई भर्ती नहीं मान सकता, क्योंकि उनके अपॉइंटमेंट लेटर में "अपॉइंटमेंट" शब्द का इस्तेमाल किया गया। कोर्ट ने पाया कि असल में उनकी नियुक्ति रेगुलर ही थी।

    कोर्ट ने कहा,

    "...सिंगल जज और डिवीज़न बेंच ने सही कहा कि रेगुलर होने से पहले कॉन्ट्रैक्ट/एड-हॉक/डेली-वेज़ के आधार पर कर्मचारियों द्वारा की गई सर्विस को रिटायरमेंट और पेंशन के फ़ायदों के लिए क्वालिफ़ाइंग सर्विस के तौर पर गिना जाना चाहिए।"

    इन कर्मचारियों को PSEB ने शुरू में 1993 और 1996 के बीच क्लर्क और चपरासी के तौर पर कॉन्ट्रैक्ट, एड-हॉक, डेली-वेज़ और वर्क-चार्ज व्यवस्था के तहत रखा था, जो आम तौर पर 89 दिनों के लिए होती थी। बाद में कुछ लोगों को जूनियर और सीनियर असिस्टेंट के तौर पर प्रमोशन भी मिला।

    उनकी सर्विस कई बार कानूनी विवादों और रुकावटों से गुज़री। 1995 में 224 एड-हॉक क्लर्कों की सर्विस खत्म कर दी गई, जिसके बाद 184 कर्मचारियों को कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर फिर से काम पर रखा गया।

    इसके बाद PSEB ने भर्ती प्रक्रिया शुरू की, लेकिन कर्मचारी अपनी नौकरी जारी रखने और रेगुलर होने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ते रहे। रेगुलर करने के लिए सरकारी पॉलिसी 23 जनवरी 2001 को जारी की गई।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने पहले कहा कि PSEB एक स्वायत्त संस्था होने के नाते सरकार की रेगुलर करने की पॉलिसी से अपने-आप बाध्य नहीं है, लेकिन बोर्ड ने आखिरकार जुलाई 2004 में इस पॉलिसी को अपनाने का फ़ैसला किया। बोर्ड के फ़ैसले के बाद 18 जुलाई 2004 को एक सार्वजनिक सूचना जारी की गई और उसके बाद अगस्त 2004 में कर्मचारियों को नियुक्ति पत्र दिए गए।

    विवाद इसलिए पैदा हुआ, क्योंकि 1 जनवरी 2004 से 'डिफ़ाइंड कंट्रीब्यूटरी पेंशन स्कीम' (नई स्कीम) लागू की गई। प्रतिवादी-कर्मचारियों का दावा कि उनकी सेवा कट-ऑफ तारीख से पहले शुरू हुई मानी जानी चाहिए, इसलिए उन्हें पुरानी पेंशन स्कीम का लाभ मिलना चाहिए।

    हाईकोर्ट की सिंगल बेंच और डिवीज़न बेंच ने प्रतिवादी-कर्मचारियों के पक्ष में फ़ैसला सुनाया, जिसके बाद राज्य शिक्षा बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

    सुप्रीम कोर्ट के सामने, अपीलकर्ता-बोर्ड ने तर्क दिया कि एक स्वायत्त निकाय (ऑटोनॉमस बॉडी) होने के नाते, वह सेवा से जुड़े मामलों में पंजाब सरकार की नीतियों से अपने-आप बाध्य नहीं था।

    बोर्ड का तर्क खारिज करते हुए जस्टिस मिश्रा द्वारा लिखे गए फ़ैसले में कहा गया कि हाईकोर्ट ने पहले ही सरकार की नियमितीकरण नीति को अपनाने या न अपनाने की बोर्ड की स्वतंत्रता को मान्यता दी थी। बाद में नीति को अपनाने का फ़ैसला करने के बाद बोर्ड उस फ़ैसले के नतीजों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता।

    कोर्ट ने कहा,

    "यह तथ्य कि अपीलकर्ता-बोर्ड एक स्वायत्त निकाय है, उसे बचा नहीं सकता; वास्तव में, हाईकोर्ट ने 14.12.2001 को यह माना कि वह 23.01.2001 की सरकारी नीति को अपनाने या न अपनाने के लिए स्वतंत्र था, भले ही इसे पंजाब राज्य में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, निगमों, बोर्डों, स्थानीय प्राधिकरणों और अन्य स्वायत्त निकायों पर स्पष्ट रूप से लागू किया गया। इसके बाद अपीलकर्ता-बोर्ड ने स्वेच्छा से इस नीति को आवश्यक बदलावों के साथ (mutatis mutandis) अपनाया।"

    इसके अलावा, कोर्ट ने 'हरबंस लाल बनाम पंजाब राज्य (2010)' मामले में अपने पहले के फ़ैसले पर हाईकोर्ट के भरोसे को भी सही ठहराया। उस मामले में एक कर्मचारी 1988 से डेली-वेज़ (रोज़ाना मज़दूरी) पर पंप ऑपरेटर के तौर पर काम कर रहा था और 2005 में उसे रेगुलर किया गया। कोर्ट ने कहा था कि रेगुलर होने से पहले की उसकी डेली-वेज़ सर्विस को पेंशन के लिए गिना जाना चाहिए और बाद में रेगुलर होने से वह लागू पेंशन सिस्टम के हिसाब से नया कर्मचारी नहीं बन जाता।

    उसी सिद्धांत को लागू करते हुए कोर्ट ने कहा कि रेगुलर होने से पहले रेस्पॉन्डेंट्स की सर्विस को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

    साथ ही 'डी.एस. नकारा बनाम भारत संघ (1982 INSC 103)' मामले में कॉन्स्टिट्यूशन बेंच के फ़ैसले का भी ज़िक्र किया गया, जिसमें पेंशन को सर्विस के ज़रिए हासिल होने वाले सोशल-वेलफ़ेयर बेनिफिट (सामाजिक कल्याण लाभ) के तौर पर बताया गया। कोर्ट ने पाया कि जिन कर्मचारियों ने सालों तक लगातार सर्विस की है, उन्हें सिर्फ़ इसलिए पेंशन से जुड़े फ़ायदे न देना कि उन्हें बाद में रेगुलर किया गया, सर्विस के असल रिश्ते के बजाय तकनीकी बातों को ज़्यादा अहमियत देना होगा।

    कोर्ट ने कहा,

    "जब किसी कर्मचारी ने लंबी और लगातार सर्विस की हो और अंत में उसे रेगुलर कर दिया गया हो तो तकनीकी या बनावटी वजहों से पेंशन से जुड़े फ़ायदे न देना आम तौर पर गलत है।"

    इन बातों को ध्यान में रखते हुए अपील खारिज कर दी गई।

    Cause Title: PUNJAB SCHOOL EDUCATION BOARD AND ANOTHER VERSUS SATNAM SINGH AND OTHERS

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