'अनुबंध के पालन के मुकदमे में वादी को सबसे पहले संदिग्ध हालात को स्पष्ट करना होगा: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
8 Sept 2026 3:08 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि जब कोई वादी बिक्री के किसी ऐसे समझौते के 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' (अनुबंध के पालन) की मांग करता है, जिसकी असलियत पर संदिग्ध हालात के कारण शक हो, तो सबूत पेश करने की जिम्मेदारी प्रतिवादी पर आने से पहले वादी को उन हालात को संतोषजनक ढंग से समझाना होगा।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट और फर्स्ट अपीलेट कोर्ट के उन फैसलों को रद्द किया, जिन्होंने ट्रायल कोर्ट द्वारा प्रतिवादी-वादी के 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' के मुकदमे को खारिज करने के फैसले को पलट दिया था।
एक लोन के लेन-देन को बिक्री समझौते का रूप दिया गया। अपीलकर्ता के खाली कागज पर लिए गए हस्ताक्षर का इस्तेमाल उसकी जमीन को प्रतिवादी को बेचने का समझौता बनाने के लिए किया गया। प्रतिवादी के पिता को दी गई लोन की रकम को बयाना (Earnest Money) के तौर पर दिखाया गया, और बाकी रकम एग्रीमेंट पूरा होने पर दी जानी थी।
प्रतिवादी ने 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' के लिए मुकदमा दायर किया। उसका आरोप था कि अपीलकर्ता ने बिक्री विलेख (sale deed) को पूरा नहीं किया, जबकि अपीलकर्ता के अनुरोध पर इसे पूरा करने की समय-सीमा एक साल के लिए बढ़ाई भी गई।
ट्रायल कोर्ट ने मुकदमा खारिज किया, क्योंकि अपीलकर्ता-प्रतिवादी के हस्ताक्षर वाले दस्तावेज के मामले में कुछ संदिग्ध हालात पाए गए, जिन्हें वादी ने स्पष्ट नहीं किया।
फर्स्ट अपीलेट कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया और बिक्री समझौते पर अपीलकर्ता के अंगूठे के निशान को असली माना, साथ ही एग्रीमेंट पूरा करने की समय-सीमा भी बढ़ा दी। फर्स्ट अपीलेट कोर्ट के फैसले को सही ठहराने वाले हाई कोर्ट के फैसले से असंतुष्ट होकर प्रतिवादी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
अपील स्वीकार करते हुए कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट और फर्स्ट अपीलेट कोर्ट दोनों ने ट्रायल कोर्ट के ठोस आधार वाले फैसले को रद्द करने में गलती की। उन्होंने बिक्री समझौते के फर्जी होने को साबित करने का बोझ अपीलकर्ता-प्रतिवादी पर डाल दिया, जबकि इसे वादी को स्पष्ट करना चाहिए था।
कोर्ट ने कहा,
“हम ट्रायल कोर्ट के उस तर्क पर ज़ोर दिए बिना नहीं रह सकते, जिसे पहली और दूसरी अपीलीय अदालतों ने बिना सोचे-समझे पलट दिया। ट्रायल कोर्ट ने केस खारिज करते समय जिन संदिग्ध हालात की ओर इशारा किया, उन्हें यह कहकर नज़रअंदाज़ कर दिया गया कि प्रतिवादी यह साबित नहीं कर पाया कि दस्तावेज़ जाली था। हालांकि, ट्रायल कोर्ट द्वारा बताए गए संदिग्ध हालात पर ध्यान तो दिया गया, लेकिन सबूत का बोझ प्रतिवादी पर डालने से पहले उन्हें ठीक से गलत साबित किया जाना चाहिए था।”
कोर्ट ने आगे कहा कि चूंकि अपीलकर्ता-प्रतिवादी ने कभी यह दावा नहीं किया कि कथित समझौता जाली था, इसलिए उसे इसके उलट साबित करने का बोझ डालना गलत था; उसने केवल यह दावा किया कि खाली कागज़ों पर ज़बरदस्ती हस्ताक्षर करवाकर उसकी जानकारी के बिना बिक्री का समझौता तैयार किया गया।
कोर्ट ने कहा,
“यह भी ध्यान देने वाली बात है कि प्रतिवादी ने दस्तावेज़ पर अपने निशान पर कोई आपत्ति नहीं जताई; उसका तर्क यह था कि खाली कागज़ों पर उसकी जानकारी के बिना बिक्री का समझौता तैयार किया गया और उससे ज़बरदस्ती हस्ताक्षर करवाए गए, न कि कोई जाली दस्तावेज़ बनाया गया; यह तर्क दस्तावेज़ में हेराफेरी (Fabrication) से थोड़ा अलग है। समय-सीमा बढ़ाने (Extension) वाले हिस्से में छेड़छाड़ पाई गई, लेकिन इसे महज़ इस अंदाज़े पर नज़रअंदाज़ किया गया कि एक पक्ष लिखी गई तारीख से सहमत नहीं रहा होगा, जिसके कारण सुधार किया गया; जबकि इस बारे में कोई मौखिक गवाही भी नहीं थी।”
नतीजतन, अपील मंज़ूर कर ली गई और 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' (अनुबंध के पालन) के लिए केस खारिज करने का ट्रायल कोर्ट का फ़ैसला बहाल कर दिया गया।
Cause Title: Bohar Singh & Anr. Versus Sardara Singh & Ors.


