PC Act | मुकदमा चलाने की मंज़ूरी न देने के फ़ैसले की समीक्षा उन्हीं सबूतों के आधार पर नहीं की जा सकती: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
30 July 2026 5:33 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988' (PC Act) के तहत किसी सरकारी कर्मचारी पर मुकदमा चलाने की मंज़ूरी न देने वाले आदेश की समीक्षा सक्षम अधिकारी द्वारा तब तक नहीं की जा सकती, जब तक कि कोई नई जानकारी या सबूत सामने न आए जो पहले उपलब्ध नहीं थे।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा,
"सिर्फ़ उन्हीं सबूतों के आधार पर राय बदलने से मंज़ूरी न देने वाले पुराने आदेश की समीक्षा या उस पर पुनर्विचार का आधार नहीं बनाया जा सकता।"
बेंच ने प्रतिवादी डॉक्टर के ख़िलाफ़ मंज़ूरी देने वाला आदेश रद्द करने का राजस्थान हाईकोर्ट का फ़ैसला सही ठहराया।
कोर्ट ने कई पुराने मामलों का हवाला दिया, जिनमें 'स्टेट ऑफ़ पंजाब बनाम मो. इक़बाल भट्टी (2009) 17 SCC 92' का मामला भी शामिल है। इसमें कहा गया कि "जब सक्षम अधिकारी मंज़ूरी न देने का फ़ैसला करता है, तो उन्हीं सबूतों के आधार पर उस आदेश की समीक्षा करना उचित या जायज़ नहीं होगा।"
यह मामला 2017 में ACB द्वारा प्रतिवादी डॉ. देव कांत मीणा के ख़िलाफ़ बिछाए गए जाल (ट्रैप) से जुड़ा है। उन पर घुटने की सर्जरी के लिए मरीज़ के रिश्तेदार से रिश्वत मांगने का आरोप था। ट्रैप के दौरान, उनके सरकारी आवास पर एक बंद दराज से कथित तौर पर ₹2,000 बरामद किए गए।
रिकॉर्ड की जांच के बाद मार्च 2018 में कार्मिक विभाग (Department of Personnel) को रिश्वत मांगने या लेने का कोई स्पष्ट सबूत नहीं मिला और विभाग ने मंज़ूरी न देने की सिफ़ारिश की, जिसे प्रधान सचिव और मुख्य सचिव ने मंज़ूरी दी। हालांकि, बाद में मई 2018 में मुख्यमंत्री कार्यालय के कहने पर बिना किसी नई जानकारी के मामले को फिर से खोला गया, जिसके बाद मंज़ूरी दी गई।
राजस्थान हाईकोर्ट ने मंज़ूरी रद्द की और कहा कि पुनर्विचार की प्रक्रिया कानूनी रूप से सही नहीं थी। इसके बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
राज्य की अपील खारिज करते हुए जस्टिस चंद्रन द्वारा लिखे गए फ़ैसले में मुख्यमंत्री के संयुक्त सचिव की भूमिका की आलोचना की गई। उन्होंने उस मामले को फिर से खुलवाया था, जिसमें सक्षम अधिकारियों द्वारा पहले ही मंज़ूरी देने से इनकार कर दिया गया।
कोर्ट ने कहा कि जब मंज़ूरी न देने की सिफ़ारिश को प्रधान सचिव ने मंज़ूरी दी और बाद में मुख्य सचिव ने भी उसे स्वीकार कर लिया, जिसके परिणामस्वरूप मंज़ूरी नहीं दी गई, तो संयुक्त सचिव के लिए ऐसा करना जायज़ नहीं था। बिना किसी नए सबूत के मुख्यमंत्री ने उन्हीं तथ्यों पर अलग राय ज़ाहिर की और मामले पर फिर से विचार करने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने कहा,
"हमें यह कहना पड़ रहा है कि मुख्यमंत्री कार्यालय के कहने पर शुरू की गई समीक्षा प्रक्रिया के कारण याचिकाकर्ता को बेवजह हाईकोर्ट तक घसीटा गया।"
कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि प्रतिवादी को मुख्यमंत्री कार्यालय ने बेवजह परेशान किया; उन्होंने मंज़ूरी न देने के पिछले आदेश की समीक्षा तब की, जब ऐसा करने के लिए कोई नई जानकारी या सबूत मौजूद नहीं था।
कोर्ट ने कहा,
"तथ्यों से साफ़ पता चलता है कि दूसरी बार विचार करते समय दिमाग का सही इस्तेमाल नहीं किया गया, जबकि विचार के लिए वही सामग्री उपलब्ध थी जिसके आधार पर अधिकारी ने पहले मंज़ूरी देने से इनकार किया।"
कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया,
"...जब दो राय संभव हों, खासकर किसी सरकारी कर्मचारी के ख़िलाफ़ आपराधिक मुक़दमा चलाने के मामले में, तो अधिकारी को बरी करने वाली राय को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, क्योंकि आपराधिक मुक़दमे में दोषी तभी ठहराया जा सकता है जब अपराध बिना किसी उचित संदेह के साबित हो जाए।"
नतीजतन, अपील खारिज की गई और राज्य पर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में 50,000-50,000 रुपये जमा करने का जुर्माना लगाया गया।
कोर्ट ने आदेश दिया,
"इसलिए हम ऊपर बताई गई बातों के साथ स्पेशल लीव पिटिशन (विशेष अनुमति याचिका) खारिज करते हैं और राज्य को निर्देश देते हैं कि वह हाईकोर्ट और इस कोर्ट में 50,000-50,000 रुपये का जुर्माना जमा करे।"
Cause Title: State of Rajasthan & Ors. Versus Dev Kant Meena


